ज्ञान का विपरीतपना और हीनपना

ज्ञान का परिणमन हमेशा ही हीन कहते है। श्रद्धा और चारित्र का जैसे विपरीत परिणमन होता है वैसे ज्ञान का विपरीत परिणमन नहीं हीन परिणमन कहते है। ज्ञान का मिथ्यापना श्रद्धा की अपेक्षा ही कहा जाता है।

प्रश्न है कि ज्ञान में संशय, विपर्यय, अनध्यवसाय पाए जाते है (बिना इन तीनो के ज्ञान सम्यक् हो जाता है)।

अब संशय और अनध्यवसाय ज्ञान का हीन पना कह सकते है। लेकिन ज्ञान की विपर्यय अवस्था हीन कैसे हुई? वह विपरीत ही नहीं कही जाएगी?

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