अनेकांत अनेकांतवाद

:pray:t2: जय जिनेंद्र!

अनेकांत, अनेकांतवाद इन विषय का प्ररूपण करने वाले संस्कृत, प्राकृत भाषाओं के आगम सूत्र कौन कौन से है?.. सूत्र/श्लोकों के साथ उन आगम शास्त्रों के नाम, उन सूत्रों के क्रमांक आदि जानकारी भी कोई साझा कर सके तो बहुत मदत होगी … आभार! :pray:t2:

अनेकांत और अनेकांतवाद में क्या अंतर है?

अनेकांत और अनेकान्तवाद के साधारण जीवों के जीवन में उदाहरण कौन से है? … How to implement Anekant / Anekantvad in day to day life?

क्या आगम विपरीत मत, विचार को (जैसे कुछ लोग कहते/मानते है आत्मा नहीं होती) ओके आप भी सही ऐसा कहकर स्वीकार करना और move on करना उचित है?


~~~ जय जिनेंद्र, उत्तम क्षमा!
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अनेकांत के बारे में यह सबसे बड़ा भ्रम रहता है की प्रत्येक पक्ष को “उसके नज़रिए से ठीक है” करके मान लिया जाए। अनेकांत ऐसा नहीं है।

अनेकांत यद्यपि काफ़ी विषय है लेकिन अगर सही से समझा जाए तो काफ़ी सरल भी है। आप डॉक्टर भरिल्ल रचित “अनेकांत स्याद्वाद” पुस्तक पढ़िए, उसमें यह विषय बहुत ही सहजता से समझ आएगा।

http://ptst.in/snatak/admin/download/files_suchipatra/134.Anekant%20Syadwad.pdf

:pray:t2: आभार … जय जिनेंद्र! :pray:t2:

:point_up: अनेकानेक जगह यहाँ भी बहुत कुछ जानने को मिल सकता है। :point_up:


Jain kosh also having some great perspectives…
:point_down::point_down:

https://www.jainkosh.org/wiki/अनेकांत


This video is also very helpful for beginners…

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:pray:t2: Gr8 help Thanks a Ton … :pray:t2:

:pray:t2: तत्वार्थ सूत्र जी अध्याय 5 सूत्र 32 में अनेकांत कैसे घटित होता है कृपया कोई बता सके तो मदत होगी। … :pray:t2:

जैन न्याय जगत में बहु-प्रचलित सूत्रग्रन्थ, तत्त्वार्थसूत्र के पाँचवें अध्याय के 32 न• के सूत्र में अनेकांत के बीज बोये गए।

सूत्र है/-
अर्पितानर्पित सिद्धे

• उसकी टीका सर्वार्थसिद्धि के ही मूल अंश को पढ़कर समझ आ जायेगा।

20201002_145750

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:pray:t2: Thank U! … :pray:t2:

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I had discussed this concept with someone. I’m copy pasting that conversation here.

However, one place where I feel you misunderstood was in your understanding of Anekantvaad. According to your article, you mentioned that “The Jains would simply say, in line with the Anekanta-vada philosophy, different people have different truths in different times and different places, as per the level of their psychological evolution.”

I would, humbly, like to correct the definition of Ankeaantvaad. Anekaantvaad has come into picture because language is not capable enough to describe anything in full.

Siddh Jeev (i.e. those who have attained Keval Gyan) can view any and every object/thing/concept in full. But when you put ideas into words, you cannot always represent it in full because of the limitation of language.

Hence Anekaantvaad comes into picture – and while talking about any concept, it uses a “context” or a “frame of reference”.

For example, Dravya is both permanent and temporary. This is a self contradicting statement (how can something be both permanent AND temporary?) But when talked in terms of “context” – it clarifies the notion.

Dravya is permanent in terms of its composition - i.e. the collection of qualities (गुण) that it has. But it is temporary in terms of its state (पर्याय). Because its पर्याय keeps changing every single sub-second.

Anekaantvaad is putting a “context” or a “frame of reference” when talking about a concept. It is not about “different truths” from the viewpoints of “different people” in “different times and places”. It is about “context” in which a sentence/concept is being talked about. That’s it.

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अनेकान्त = सिद्धान्त
स्याद्वाद (अनेकान्तवाद) = प्रस्तुतिकरण

इसे आप जितना विस्तारित कर लें उतना उपयोगी होगा।

जैसे -

  1. आत्मा नित्यनित्यात्मक है। (अनेकान्त)
    आत्मा नित्य भी है और अनित्य भी है। (स्याद्वाद)
  2. सिद्धान्त (अनेकान्त)
    कथन शैली (स्याद्वाद)
  3. मोक्ष (अनेकान्त)
    निश्चय-व्यवहार (स्याद्वाद)

उदाहरण -

  1. संयम (अनेकान्त)
    भाई-बेटा-भतीजा आदि (स्याद्वाद)
  2. हाथी (अनेकान्त)
    पेट-पीठ-कान आदि (स्याद्वाद)
  3. पुस्तक (अनेकान्त)
    पृष्ठ (स्याद्वाद)
  4. सोना (अनेकान्त)
    कंगन-पायल-अँगूठी (स्याद्वाद)
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