अध्यात्म और न्याय

क्या न्याय (जैन) के बिना अध्यात्म की गति हो सकती है?

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मैंने कई बार सुना है कि न्याय अध्यात्म का प्रवेश द्वार है…।
यह बात युक्ति संगत भी प्रतीत होती है क्यूंकि अध्यात्म मे मूल प्रयोजन स्व-पर का भेदज्ञान कराना है और वह युक्ति के अवलंबन पूर्वक ही होगा।
प्रमाण-नय को ही युक्ति कहते हैं जो न्याय की मूलभूत विषयवस्तु है। और उनके सहारे ही तत्वज्ञान सम्भव है।

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आत्मानुभूति में न्याय-शास्त्र के ज्ञान की उपयोगिता

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धन्यवाद दोनो मनीषी विद्वानों का…

उपर्युक्त बातों से ये तो ध्यान आगया कि बिना न्याय के अध्यात्म कार्यकारी नही है, या उसकी गति नही बनेगी।


लेकिन क्या ऐसा है?, कि बिना अध्यात्म के न्याय सम्भव ना हो, (अंतिम प्रयोजन अथवा लक्ष्य को गौण करें),

क्या बिना अध्यात्म के न्याय सम्भव है, यथार्थ है?
@jinesh ji…आदि सभी🙏

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