क्या जैनदर्शन में ( जिनवाणी) किसी भी प्रकार से मांसाहार की छूट दी गई है?

अपनी शक्ती अनुसार व्रत - नियम ग्रहण करने चाहिए इस विषयके अनुसन्धान में आज संजीवजी गोधा के प्रवचनमें आया की यदि मांसाहार का त्याग न कर सको तो कौवे के मांस का त्याग करो ऐसा प्रथमानुयोग में आता हैये बात किसी भी अपेक्षा से ठीक नहीं लग रही। हो सके तो स्वाध्यायी मित्रगण कृपया इसका खुलासा करें । प्रवचन की link निचे दी गई है 27.40 मिनट से 28 .30 मिनट तक

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As per my thinking,

यदि कोई श्री गुरु से आकर पूछे - भगवन ! मेरा आत्मकल्याण कैसे हो ?

Answer - तो depend करता है की मुनि को कितना उपदेश देने का मन है और सामने वाला कितना समझ सकता है। इसलिए किसी को तो मुनि बहुत विस्तार से उपदेश देते है (eg- चामुण्डराय को) और किसी को मात्र “णमो अरिहंताणं” बोलने का ही उपदेश देते हैं (eg- सुदर्शन जी का पूर्व भव) अथवा किसी को उपदेश नहीं भी देते, पूछने पर भी मौन ही रहते है (eg- मंदोदरी के साथ आये उस व्यक्ति को अभव्य जानकर मुनि ने कुछ उपदेश नहीं दिया)।

अब यदि प्रश्न करने वाला अजैन हो तो :
यदि आप पुराणों में देखोगे तो अजैनो को मुनि ने पहले गृहीत मिथ्यात्व छोड़ने का उपदेश नहीं दिया, बल्कि ज्यादातर case में 5 अणुव्रतो का उपदेश दिया (eg- उस बालिका को मुनि ने 5 अणुव्रत दिलाये, जीवंधर जी ने भी किसान को अणुव्रत दिलवाये थे) | क्योंकि यदि हम अजैनो से गृहीत मिथ्यात्व की बात करेंगे, तो उन्हें बहुत प्रश्न खड़े होंगे, विवाद भी हो सकता है, वहां बहुत विस्तार से चर्चा करनी पड़ेगी, बहुत time लगेगा। पर यदि हम किसी को अणुव्रतो का उपदेश देंगे तो उसमे किसी भी मत वाले को कोई आपत्ति नहीं होगी, यहाँ तक की जो भगवान को नहीं मानता, वह भी अणुव्रत ग्रेहेन कर लेगा। और अणुव्रत देव गति के कारण है और भवान्तर में मोक्ष के भी। मुनि पर श्रद्धा आ जाने से गृहीत मिथ्यात्व तो अपने आप ही छूट जायेगा।

अब यदि सामने वाला और भी निम्न स्तर का हो (भील, चांडाल, मछुआरा आदि) :
तो वह सर्व अणुव्रत भी ग्रेहेन नहीं कर सकता, तब मुनि उसे मात्र एक वस्तु का ही त्याग करा देते है। (eg - 1) यदि मछुआरे से कहते की तुम मछली मारना छोड़ दो - तो वह कहता यह तो मेरी रोजी रोटी है, फिर उसे बहुत विस्तार से समझाना पड़ता। इसलिए मुनि ने short में बस इतना त्याग कराया की कल जो पहली मछली तुम्हारे जाल में फसे उसे छोड़ देना, इतने में ही वह मछुआरा पर भव में इतना बड़ा राजा बन गया | 2) श्रेणिक महाराज का जीव जो भील था उसे मात्र कौए का मॉस छोड़ने को कहा, इतने में ही वह जीव तीर्थंकर बन जायेगा)

यह कथन अजैनो की अपेक्षा है, जैनो की अपेक्षा नहीं |

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Adding to the above discussion -

This discussion is based on a quote from मोक्षमार्ग प्रकाशक - link to the original post.

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