











*“रात्रि भोजन- एक कटाक्ष”*









(छन्द- नरेन्द्र/ जोगीरासा)
इतिहास:पापोदय के तीव्र आवेग में भी प्रतिज्ञा पर अडिग जैन।।


जैन धर्म का अतुलनीय इतिहास ज़रा यदि झाँकें।
समय क्षेत्र अरु परिस्थिति से हम अपने को आँकें।।
घोर असीम क्लेश आए, उपसर्ग अग्नि-से बरसे।
थे अधीर वे वीर-भक्त जिन-दर्शन को तक तरसे।
शीश तोड़ प्रतिमा के, आंचल में पीरा का साया।
छोड़ा नहिं जिनधर्म,अन्य को मस्तक नहीं झुकाया।।
हुई घोषणा-सब जन निशि को ही जीमेंगे दाना।
रात्रि भोज नहिं कर सकते-जैनी पर संकट आना।।
अंथउ कर दिन में, अभिनय कर रजनी संकट टारा।
बर्तन की ध्वनि कर, हल्ला कर, बर्बट लेत डकारा।।
मौत आए आ जाए पर यम-नियम कर्म नहीं छोड़ा।
भले शीश कट जावे पर जिनधर्म से मुख ना मोड़ा।।
निशा भोज तजना-यह तो जैनी का है आभूषण।
हँस कर जीवन तज दें पर लगने ना देंगे दूषण।।
पापोदय से फ़टे वस्त्र हों- तो भी हमें चलेगा।
पर अनीत का दाग वस्त्र में हमको वह खटकेगा।।
वर्तमान: पाश्चात्य के साये में सिमटते जैनी।।

छोड़ नियम-यम-धर्म सभी पाश्चात्य जहँ-तहाँ फैला।
आँख उठा कर देखो तो हर जैनी दिखता मैला।।
रहे झुकाते शीश सदा, पर बात एक नहिं मानी।
तिलांजलि दे रहे धर्म की भक्त कर रहे हानी।।
है गरजी का मार्ग, चलाओ मत अपनी कुछ मर्जी।
बस दिखावटी धर्म-कर्म यह ढोल धमाका फर्जी।।
मंदिर जावे सज-धज कर अरु कहे धर्म-ये काफी।
सुध-बुध नहिं खावे-पीवे की, कर्म न देंगे माफी।।
जब झांके तुम जीवन में, मन हो जाता है सैला।
दाग नहीं है, यह तो दिखता पूर्ण वसन ही मैला।।
रात्रि भोजियों का पेट- असंख्य जीवों का कब्रिस्तान।।

बना लिया यह उदर शवों का कब्रिस्तान पुराना।
लेन-देन दिन-रात यही, मुर्दों का आना-जाना।।
जिन जैनी के उदर बसी श्मसान मसान वितानी।
कैसे निकल सकेगी उस मुख से जिनवर की वाणी।।
तम भोजन तज देने से जब होता कोई न घाटा।
तन मन हो जाते पुनीत जीवन में आती साता।।
बनिया हो तो बनिया बुद्धि भी चलाना सीखो…

कैसे बनिया हो, नहिं करते मात्र ब्याज का धंधा।
तन मन दोनों खुश करता जो कभी न पड़ता मंदा।।
अपनी बनिया बुद्धि चलाकर सोचो बस इक क्षण को।
जीवन चंगा होवेगा तज ने से निशि भोजन को।।
अब क्या करें??

अब जो पाप हुए अतीत में पश्चाताप से धोलो।
पाप त्यागने का प्रण लेकर क्षमा पटल को खोलो।
क्षमा मांग-नहीं मिले, जिन धरम इतना क्रूर नहीं है।
तज कर देखो रैन भोज फिर ‘समकित’ दूर नहीं है।।








हम अपने जीवन को इस तरह बनाएं जिससे हम सर उठाकर शान से अपने आप को एक सच्चा जैन, सच्चा मुनि भक्त एवं महावीर प्रभु की संतान कह सकें।








✍🏻 मंगलार्थी समकित जैन, ईसागढ़