तू कितनी मनहर है..जिनवाणी भक्ति

“तू कितनी मनहर है…”

          (तर्ज- तू कितनी अच्छी है...)

तू कितनी मनहर है, तू कितनी सुखकर है।
सुपथ दिखलाती है।।
ओ$$ माँ ओ$$ माँ-2

वस्तु स्वरूप की समझ सिखाती।
निज को निज का मार्ग दिखाती।।
स्याद्वाद अरु अनेकांत निश्चय व्यवहार बताती।
सुख के आंचल से,नयों के काजल से,मोक्ष मग दर्शाया।।
ओ$$ माँ ओ$$ माँ।।1।।

जीना सिखाती है माँ तेरी बतियाँ।
अब छोड़ूं दुख मय चहुँ गतियाँ।।
पार भईं तोरी शरणा से सीता जैसी सतियाँ।
भय जो मृत्यु का, स्वप्न तड़पाता था, निंदिया टूट गयी।
ओ$$ माँ, ओ$$ माँ।।2।।

सम्यक दर्शन ज्ञान चरण मय।
शुद्धातम इक शरण है सुखमय।।
मुक्ति महल में पग द्वै धरकर तज दूंगा भव दुखमय।।
‘समकित’ पाकर के, दृष्टि उर लाकर के, सिद्ध पद पाऊँगा।।
ओ$$ माँ ओ$$ माँ।।3।।

:writing_hand:t2::writing_hand:t2:–मंगलार्थी समकित जैन
(शास्त्री प्रथम वर्ष)


Singer- @shruti_jain1

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