गृहीत मिथ्यात्व संबंधित

कुदेव कुगुरु कुशास्त्र, कुधर्म के अलावा गृहीत मिथ्यात्व में और क्या आ सकता है?

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Reading samaysaar ji (सुशास्त्र) and saying nischay ekant as only true and saying others false is also graheet mithyatva. See below video after 13:00 minutes

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बहुत अच्छा इसके अलावा और क्या क्या जैसे anniversary celebration aadi bhi le skte he
और क्या क्या ले सकते है?

ये बात सही है कि बहुत कुछ नए नए आयोजन और कार्य इस युग में होने लगे हैं, परन्तु क्या इस प्रकार उन सभी को सामान्य रूप से गृहीत मिथ्यात्व में शामिल कर देना चाहिए?

सबसे पहले तो यह विचार करना है कि किसे श्रृद्धा के और किसे चारित्र के दोष में शामिल करना है? चारित्र में भी किसे बड़ा दोष जानकर उसको पहले दूर करने का उपाय करना चाहिए और किस दोष का उपचार बाद में किया जा सकता है? इसका ज्ञान होना आवश्यक है।

नोट - छोटे बड़े सभी दोषों को दोष रूप ही स्वीकार करते हुए यह बात लिखी गई है।

मोक्ष मार्ग प्रकाशक जी ग्रंथ में बहुत सुंदर वर्णन है। जरूर देखिए।
अगृहीत मिथ्यात्व - अधिकार 4
गृहीत मिथ्यात्व - अधिकार 5,6,7

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समाज अति कट्टरवादी हो गयी है। जो कार्य इतिहास में नहीं हुए यदि वे वर्तमान में होते हुए देखे जाते हैं तो कतिपय लोग उसे गृहीत मिथ्यात्व की श्रेणी में डाल देते हैं, जो कि अनुचित है।

शादी की सालगिरह का त्यौहार मनाना कैसे गृहीत मिथ्यात्व हो सकता है यह बात मुझे समझ मे नहीं आती।
जन्मदिन बनाना गृहीत मिथ्यात्व कैसे?
होली खेलना गृहीत मिथ्यात्व कैसे?
रक्षा करने का प्रण लेना गृहीत मिथ्यात्व कैसे?

मेरा विचार तो इस संबंध में अति स्पष्ट है कि यदि होली मनोरंजन की दृष्टि से खेली जा रही है तो सामान्य आमोद प्रमोद के समान है, यदि धार्मिक आस्था के साथ खेली जा रही है तो मिथ्यात्व है।

रक्षाबंधन भी यदि एक सामान्य प्रण के रूप में है तो लोक व्यवहार रूप है, किन्तु यदि उसे किसी धार्मिक आस्था के साथ जोड़ दिया जाता है तो मिथ्यात्व है।

यदि कोई फादर्स डे आदि बनाता है तो भी उससे कोई मिथ्यात्व नहीं होता, अन्यथा स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस भी को मनाना भी मिथ्यात्व ही होगा।

यदि जन्मदिन बनाना मिथ्यात्व है तो तीर्थंकर भी तो बनाते थे, उस सम्बन्ध में क्या कहेंगे? यह कहना कि उनका तो आखरी था तो क्या फर्क पड़ता है?

ऐसी जी किसी स्त्री को नाचते हुए देखना/ अनुरोध पर नचवाना भी कोई गृहीत मिथ्यात्व नहीं है, आदिनाथ राजा भी सभा मे नृत्य देखते थे/ करवाते थे।

इस संबंध में सभी को सोच समझकर अपना निर्णय रखना चाहिए।

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गृहीत मिथ्यात्व - इस भव में ग्रहण कि हुई विपरीत मान्यता।

जन्मदिन का अर्थ है - इस तारीख को मेरा जन्म हुआ है ऐसी मान्यता है।शरीर के परिणमन को मेरा जन्म मान लिया।जब कि में तो
में तो अनादि निधन भगवान आत्मा हुं ऐसी श्रद्धा होनेसे जीव को निश्चित ही सम्यक्त्व होगा,जब कि जन्म दिन और anniversary सम्यक्त्व होने के लिए बिल्कुल विपरीत है,यह सब मोह पुष्ट करने के कार्य है,

हम सभी लोग पूजा में बोलते है
जन्म जरा मृत्यु विनाशनाय जलं निर्वंम पमिति स्वाहा,
और हम जन्म दिन मनाये ये तो बिल्कुल विपरीत बात हो गयी

रही बात anniversary की जैन दर्शन में भगवान बनने के मार्ग में अब्रम के भाव को बाधक रूप में माना गया है भले ही कोई जीव अब्रम का सेवन करता हो परंतु भाव तो ब्रह्मचर्य लेकर मुनि होने के ही होने चाहिए,
जब कि इस भव में की हुई शादी के अब्रम के भाव को anniversary मना कर अपना मानना यह जीव को अधोगति में ही ले जाएगा।

आदरणीय बड़े pt जी का एक सुंदर बोल है

शरीर और शरीर के संबंधित जितने भी विकल्प है सभी मिथ्या ही है।

रही बात तीर्थंकर के जन्म कल्याणक की इसमे हमारी ऐसी भावना होती है कि हमारा भी इसी तरह अंतिम जन्म आये और जन्म मरण रहित हो जाये।

इस विषय मे हमे भाई बहन के सम्बंध से आगे व्यापक सोच की आवश्यक्ता है।

इसमें लड़के लडकिया पानी के साथ खेलते है अन्छने पाने से खेलते है अनर्थ दंड बहोत होता है अनन्त जीवो का घात होता है।

मोक्ष जाने के लिए राजमार्ग तो यही है आजे मानो या अनन्त काल बाद मानो।

और भी कई मुद्दे है जैसे
भावुकता में आ कर किसी व्यक्ति विशेष को भगवान के समान मानना यह भी एक इस विषय का मुद्दा है।

सम्यक्त्व होने के लिए छोटे से छोटे दोष भी बाधक रूप बन सकता है इस अपेक्षा से दोष दूर करने का परुषार्थ करना चाहिए ।

उत्तम क्षमा

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बिलकुल सही। मान्यता के विपरीत होने का नाम मिथ्यात्व है। यहाँ मान्यता पर ज़ोर दिया जा रहा है यह बात बहुत ही ध्यान देने योग्य है।

जन्मदिन के सम्बंध में भी यदि दृष्टिकोण लगाया जाए तो मुझे तो नहीं लगता कि इसके किसी भी प्रकार से मोह को पुष्टि होने का अथवा गृहीत मिथ्यात्व का प्रसंग आएगा। लोक व्यवहार नाम की भी कोई चीज़ है और ज्ञानी भी संसार में रहते हुए इसका परिपालन करते हैं। अन्यथा जिस प्रकार आप जन्मदिन को नहीं मनाना उचित ठहरा रहे हैं मोह पुष्टिकारक होने से, तो शादी करना, शादी के बाद गृहस्थ जीवन जीना, घर वालों के उद्देश्य से पैसा कमाना, सभी की ज़रूरतों को पूरा करना इत्यादि सभी कार्यों को गृहीत मिथ्यात्व की श्रेणी डालना पड़ेगा जो की सही नहीं है।

इन सभी का समाधान मान्यता से ही सम्भव है।
आचार्य कुन्दकुन्द की जन्मजयंती मनाना, गुरुदेव की मनाना इत्यादि को क्या ग्रहीत मिथ्यात्व माना जाए?
तीर्थंकर के जीव जब गृहस्थ अवस्था में होते हैं तब हर वर्ष उनका जन्मदिन मनाया जाता है [ गृहीत मिथ्यात्व ], सारी की सारी नगरी को स्वर्ग के समान सजाया जाता है [ अनर्थदंड ], इसके बाद भी उनका सम्यक्त्व सुरक्षित रहता है। इसके दो ही उत्तर हैं - लोक व्यवहार और मान्यता।
होली आप सिर्फ़ लड़कों के साथ खेलें, लड़कियाँ लड़कियों के साथ खेले तो समाधान हो जाएगा। अनछने के स्थान छने पानी से खेलें, एवं योग्य ही खेलें अयोग्य न खेलें।
राजमार्ग ही उपादेय है, यह बात पूरी तरह से सत्य है, किंतु अन्य लौकिक कार्यों को करने से ग्रहीत मिथ्यात्व होता है यह बात उचित नहीं है, सारा विषय मान्यता और चारित्र सम्बन्धी दोष का है उसे सीधे सम्यक्त्व से जोड़ना उचित नहीं है।
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यहां पर मान्यता की ही तो बात चल रही है।
क्रिया की बात करे तो कुछ भी हो सकता है।,क्षायिक सम्यकदृष्टि जुआ भी खेल सकते है,शिकार ,पत्नी को बचाने के लिए सामूहिक हत्या भी कर सकता है, लाश को उठाकर 6 महीने घूम भी सकते है , यह सब चरित्र के दोष ही है।
Birthday आदि तो बहोत सामान्य बात है,

लेकिन अगर कोई जीव ऐसा मान ले कि इसी दिन मेरा जन्म हुआ था, और यही पत्नी के साथ मे जन्मो बिताना चाहता हूं इससे मुजे बहुत खुशी मिलती है,
यह तो मिथ्यात्व ही है,यह मान्यता तो हमे तोड़नी है।
गोमट सार कर्म कांड गाथा 70 तो 86 में यही आता है कि हमारे राग आदि भाव बढ़े ऐसे नोकर्म का हो सके उतना दूर रहना चाहिए।
ब्र राजकुमारी दीदी से
जन्म दिन मनाना है , पुद्गल को सजाना
पुद्गल को सजाना है, आतम को रुलाना

ऐसा एक गीत है बहुत सुंदर है।

क्रिया में मजबूरी वशात यह सब हो सकता है इसमे अंदर में खेद ( प्रशम संवेग अनुकम्पा आदि की धारा तो चलती ही रहेगी) परंतु एकत्व पूर्वक खुद ही यह सब जमेला खड़ा करे ये योग्य और अनुकरणीय नही है।
लौकिक व्यवहारों में सुख बुद्धि का भाव तो नही रखना चाहिए।
बस मात्र पुरुषार्थ की कमी के कारण या सब समता पूर्वक करना है।ऐसा भाव बनाना चाहिए।संसार से थकान लगेगी तो ही वैराग्य बढ़ेगा।

यह प्रवचन जरूर सुनना चाहिए।

इसमे सभी सामान मायावी होता है इसमे हिंसा नही होती है अगर हम लोग एक मोहल्ला भी फूल आदि से सजायेंगे तो अनंत त्रस जीवो का घात होगा।

कुल मिलाकर मेरा भाव यही है कि सभी जीव की विपरीत मान्यता छुटे और जल्द से जल्द मोक्ष मार्ग की और बढ कर भगवान बने ऐसी मंगल भावना।

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मैं और आप एक ही बात कह रहे हैं मान्यता

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वैसे तो भगवान् का दर्शन पूजन सभी विध्नों को शांत करने में समर्थ है, परन्तु तीर्थंकरो को ग्रह - नक्षत्रो से relate करके एक-एक ग्रह शांति के लिए तीर्थंकर विशेष का पूजन करना या नवग्रह मंदिर बनवाना, क्या यह आगम के अनुसार है या यह भी गृहीत मिथ्यात्व है ?

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भद्रबाहु संहिता ग्रंथ में आया है,
निमित्त दो प्रकार के है।

  1. कारक निमित्त - कार्य होने में जो निमित्त हो उसे कारक निमित कहते है।

  2. सूचक निमित्त - जिसके माध्यम से कहा जाए कि कार्य ऐसा ही होगा उसे सूचक निमित्त कहते है।

ग्रह , नक्षत्र , ज्योतिष , वास्तु आदि जो भी है यह सब सूचक निमित्त में आएगा।

जैसे भद्रबाहु आचार्य ने अकाल पड़ने वाला था यह पहले से जानकर सभी मुनियों के विहार करवा दिया।

अगर 12 साल पहले समाधि लेनी हो तो निमित्त ज्ञानी मुनिराज से ही ले सकते है।
ऐसी कई बातें प्रथमानुयोग में आती है,
राजा युद्ध करने जाने वाला हो अगर घोड़े आदि भोजन करना छोड़ दे तो राजा युद्ध को टाल देता था।
यहां पर निमित्त को निमित्त रूप मानेगें तो कोई दोष नही है,परंतु कर्ता कर्म संबंध मानने में मिथ्यात्व का पाप लगेगा।

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  1. तो क्या ग्रह नक्षत्र आदि के विषय मे यह कहना कि हम तो तो इन बातों पर विश्वास ही नही करते - ये जिनवाणी विरुद्ध हो जाएगा क्योंकि इनकी चर्चा भी जिनवाणी में है ?
    2.और ज्योतिष विशेसज्ञ से इनकी जानकारी लेना गलत होगा क्या ?

Assume : हम ग्रह नक्षत्रों की जानकारी को कर्ता नही मानते।

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नही ऐसा नही है।
आज के समय मे ज्योतिष आदि सब profeesional level पर हो गया है,एक व्यापार का माध्यम बन गया है,एक बार आप कोई
ज्योतिष,बाबा आदि के चक्कर मे पैड गए तो उसी में उलझे रहोगे।
नही आज के समय मे निमित ज्ञानी मुनिराज है।

यह क्यों लेना है,क्या धन दोलत पत्नी बच्चे आदि के लिए लेना हो तो यह तो उचित नही है,

अगर आपको interest हो तो स्वयं अध्ययन कर सकते हो।
बाकी इस सब के ज्ञान से मोक्षमार्ग में कुछ खास सहायता नही मिलेंगी।

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क्या आप यह कहना चाहते है कि अगर कोई सही जानकर मिले तो क्या उससे पूछना उचित हो सकता है ?

लौकिक शांति के नाम ये सब योग्य नही इस बात से सहमत हूँ पर क्या धार्मिक आयोजनों में जैसे पंचकल्याणक , विधान आदि , में इनका प्रयोग अनुपयोगी होगा ? वस्तु स्वतंत्रता के विचार से तो अधिकतर हर कार्य अनुपयोगी ठहरेगें , हम श्रद्धा में वस्तु स्वतंत्रता का विचार रखेंगे पर का क्या ग्रह नक्षत्रों को गृहीत मिथ्यात्व का स्थान देना उचित हो सकता है ?

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धर्म के संबंध में इसका प्रयोग जरूर हिना चाहिए,और होता ही है।
जिनालय,प्रतिष्ठा आदि में इस विषय का उपयोग होता है।

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गोधा जी ने कहा, भगवान् से लौकिक वांछा रखना भी गृहीत मिथ्यात्व है | क्योंकि लौकिक वांछा से पूजा भक्ति करने में पाप होता है (क्योंकि वांछा की तीव्र कसाय बनी रहती है, अभिप्राय अशुभ होता है) । स्तुति में / भक्ताम्बर में जो कहा की भगवान् सब दुःख बाधाओं से पार करते है, सब इच्छा पूरी हो जाती है - वह सहज हो जाता है, परन्तु ऐसा ही अभिप्राय रखकर पूजन भक्ति करने में स्वार्थ आता है, भक्ति तो निस्वार्थ होती है - सो इसने तो स्तुति / पाठ का अर्थ विपरीत ग्रेहण किया सो यह नवीन मिथ्यात्व ग्रेहण हुआ ।

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बहुत सुंदर,
भाव यही है कि नई नई विवक्षा ध्यान में आये।