क्रमबद्ध और नियतिवाद में क्या अंतर है

क्रमबद्ध और नियतिवाद एक जैसे ही मालूम पड़ते है
दोनोमें क्या अंतर है ?

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इसका मतलब यह है क्या के नियतिवाद एक अपेक्षा सही है। पर सिर्फ जो ऐसा सोच ले के सब नियति पर है वह गलत है। या फिर नियतिवाद सोच ही गलत है?

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कोनसे ग्रंथ का कथन है?

क्रमबद्धपर्याय(डॉ हुकमचंदजी भारिल्ल, पेज नंबर 39) से उद्धरत हैं

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स्पष्टीकरण:
एकांत नियतवाद में अन्य समवायो (या कारणो) की उपेक्षा हैं , इसलिए एकांत नियतवाद (या सामान्य में नियतवाद) गलत हैं।
अनेकांत नियतवाद में अन्य समवायो का उपेक्षा नहीं हैं, इसलिए अनेकांत नियतवाद (अर्थात क्रमबद्धपर्याय ) सही हैं।

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Here more than one samvay taken , still told mithyatva

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देखो, यहाँ जो उद्धरण प्रस्तुत किया हैं, वह सही हैं, लेकीन हमे उसे नय विवक्षा/प्रकरण से समझना चाहिए। मुझे अभी इसकी विवक्षा ज्ञात नहीं हैं, इसलिए इस सन्दर्भ में कुछ भी कहने में असमर्थ हूँ ।

बिना नयज्ञान (या अपेक्षा) के समझे, शास्त्रो में आये हुए किसी भी विषय को समझना चाहोगे, तो बात कभी भी स्पष्ट नहीं होगी। जिस तरह किसी भाषा को उसकी व्याकरण जाने बिना नहीं समझा जा सकता हैं, उसी तरह जिनवाणी भी नय ज्ञान के बिना नहीं समझी जा सकती हैं। प्रमाणनयेरधिगमः (तत्वार्थ सूत्र)

मूल बात यह हैं की क्या हम किसी भी अपेक्षा से नियतवाद को नहीं मानेंगे? अनेकांत से नियतवाद को मानने में क्या आपत्ति हैं? कुछ भी आपत्ति नहीं हैं। रही बात प्रमाण की, तो इसके लिए मैं क्या प्रमाण दूंगा , जब प्रकृति ही स्पष्ट इस बात की घोषणा करती हैं, देखो उदाहरण के लिए सही:
१) दिन-रात नियत हैं २) सूर्य चन्द्रमा की गति नियत हैं ३) इतिहास नियत हैं ४) विज्ञान के मूल सिद्धांत नियत हैं ५) छह द्रव्य, सात तत्व, नो पदार्थ, पांच अस्तिकाय नियत हैं ६) मोक्ष के कारण नियत हैं ७) संसार के कारण नियत हैं ८) जीव - कर्म का निमित्त नैमेत्तिक संबंध नियत हैं ९) जीव के परिणाम हर अन्तर्मुहूर्त में बदलते हैं, यह नियत हैं १०) काल चक्र नियत हैं ११) तीर्थंकरो (और अन्य महापुरुषों की भी) की संख्या नियत हैं १२) चार गतिया नियत हैं १३) तीन लोक नियत हैं १४) नरक के जीव देव गति बांधने के परिणाम नहीं कर सकते हैं, यह नियत हैं । देव गति के जीव देव नरक गति बांधने के परिणाम नहीं कर सकते हैं, यह नियत हैं। १५) पंचम काल में मोक्ष के उत्कृष्ट परिणाम (७ से वे ऊपर गुणस्थान वाले) नहीं होंगे , यह नियत हैं १६) षष्ठम काल में धर्म के परिणाम नहीं होंगे, यह नियत हैं। और भी इसका कितना ही विस्तार कर सकते हैं। यह सब शाश्वत सत्य हैं/नियत हैं, और जो ऐसा माने वे सब सत्यवादी हैं या नियतवादी हैं।
जैन मत में न तो सर्वथा नियतवाद ग्रहण किया हैं और न सर्वथा अनियतवाद को ग्रहण किया हैं। अनेकांत नियतवाद में अन्य समवायो का उपेक्षा नहीं हैं, इसलिए अनेकांत नियतवाद (अर्थात क्रमबद्धपर्याय ) सही हैं।

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अगर दोनों का शब्दार्थ देखें तो एक समान लगता है। परंतु भावार्थ अलग अलग है। क्या यह कहना सही है कि नियतिवाद का गलत मतलब ले कर कुछ अलग परिपाठी शुरू हो गयी है इसलिए उन्हें एकांत मिथ्यात्व कहा है?

मेरा अनुमान हैं कि षट दर्शन में शायद कोई दर्शन नियति का पक्ष लेने वाला हो, उस एकांत दर्शन को गलत बताने कि लिए नियतवाद का निषेध किया हो, या यह भी हो सकता हैं कोई व्यक्ति सर्वथा नियति पक्ष लेने वाला हो, तब उस एकांत मान्यता को गलत बताने कि लिए नियतवाद का निषेध किया हो। इसलिए एकांत नियतवाद को मिथ्यात्व कहा हैं ।
पर अनेकांत नियतवाद (अर्थात क्रमबद्धपर्याय ) मिथ्यात्व नहीं हैं ।

Your logics are right but Gommatsaar karmkand also tells it mithyatva even after taking other samvay.

363 मिथ्या मत में एक नियतवाद होता है।

Gommatsaar karmkand and Acharya Amitgati’s Panchsangrah गाथा claim Niyativaad (including पंच समवाय) as mithyatva and that Niyativaad is same as Krambaddh paryay.

I want to ask @neeraj_jain ji that how krambaddh paryay is different from the gathas mentioned in these two shastras ??

Kartikey anupreksha gatha and these two gatha are contradictory. But this contradiction is the biggest and fundamental contradiction any system can have because it changes the whole view to see world.

फिर किस समवाय का समर्थन‌ किया है एकांत नियतवाद में ?

काल का ? लेकिन वो तो कालवाद हुआ। गोमटसार कर्मकांड में कालवाद की अलग गाथा कही है - (८७९) और नियतिवाद की अलग (८८२)।

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Please note, there is no contradiction in both Shastras if you understand Naya/Apeksha. Even though, no Naya/Apeksha is explicitly mentioned, there is always included implicit Naya/Apeksha as no sentence in Jinwani without Naya/Apeksha. This is the basic way of determining meaning of any gathas/shastras etc.

Now, please focus on above mentioned examples and try to understand hidden logic in such examples with free from biased nature. You will come to the same point, which I have discussed earlier. You cannot avoid universal truth because it is there in nature. So, my point is that you must understand the logic behind Krambaddhaparyay, if you ignore this then you cannot get true sense of Jainism. Jainism is literally different from orthodox view.

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क्रमबद्धपर्याय और नियतवाद में अंतर है, इसका सफलतम प्रयास आप सभी के द्वारा ऊपर किया ही गया है, किंतु उसके बाद भी एक व्यवस्थित उत्तर देने का प्रयास कर रहा हूँ।

क्रमबद्धपर्याय - प्रत्येक कार्य अपने स्वकाल में ही होता है, इसलिए प्रत्येक द्रव्य की पर्यायें क्रमनियमित हैं। एक के बाद एक अपने अपने स्वकाल में निश्चय उपादान के अनुसार नियमित हैं।
यहाँ पर क्रम शब्द पर्यायों की क्रमाभिव्यक्ति को दिखलाने के लिए स्वीकार किया है और नियमित शब्द प्रत्येक पर्याय का स्वकाल अपने अपने निश्चय उपादान के अनुसार नियमित है यह दिखलाने के लिए किया गया है।

नियतिवाद - नियति अर्थात् काल मात्र, वाद काल मात्र से ही सब कुछ स्वीकारने वाला मत।


इस दृष्टि से देखने पर दोनों क्रमबद्धपर्याय और नियतिवाद एक जैसे ही दिखायी देते हैं। किंतु, नियतिवादी अनेकांतवाद को स्वीकार नहीं करते, और क्रमबद्धपर्याय का सिद्धांत अनेकांतवाद को लिए हुए है। जिसके लिए निम्न प्रमाण प्रस्तुत किए जा रहे हैं।

  • *कार्योत्पत्ति में पंच कारणों के समवाय को सम्यक् घोषित करते हुए आचार्य सिद्धसेन सम्मईसुत्तं (सन्मति सूत्र) में लिखते हैं -

"कालो सहाव णियई पुव्वकयं पुरिस कारणेगंता।
मिच्छतं ते चेव उ समासओ होंति सम्मतं ॥५३॥

काल, स्वभाव, नियति, पूर्वकृत (निमित्त) और पुरुषार्थ - इन पाँच कारणों में से किसी एक से कार्योत्पत्ति मानना एकान्त है, मिथ्यात्व है और इनके समवाय से कार्योत्पत्ति मानना अनेकान्त है, सम्यक्त्व है।"

  • पंचसमवायों की चर्चा पद्म पुराण में इसप्रकार है -

"काल: कर्मेश्वरो दैवं स्वभावः पुरुषः क्रिया।
नियतिर्वा करोत्येवं विचित्रं के समीहताम्॥

ऐसी विचित्र चेष्टा को काल, कर्म, ईश्वर, दैव, स्वभाव, पुरुष, क्रिया अथवा नियति ही कर सकती है और कौन कर सकता है?"

  • इसी बात का स्पष्टीकरण करते हुए जैनेन्द्र सिद्धान्त कोश कार लिखते हैं-
    “काल को नियति में, कर्म व ईश्वर को निमित्त में और दैव व क्रिया को भवितव्य में गर्भित कर देने पर पाँच बातें रह जाती हैं। स्वभाव, निमित्त, नियति, पुरुषार्थ व भवितव्य - इन पाँच समवायों से समवेत ही कार्य व्यवस्था की सिद्धि है, ऐसा प्रयोजन है।”

गोम्मटसार के सम्बंध में जो प्रश्न किए गए उसके सम्बंध में स्पष्टीकरण -

  • कुछ लोगों का यह भी कहना है कि गोम्मटसार में नियतिवादी को मिथ्यादृष्टि कहा है। यह क्रमबद्धपर्याय भी कुछ वैसी ही है; अत: इसमें भी एकान्त का दोष आता है। पर गोम्मटसार के नियतिवाद और क्रमबद्धपर्याय में बहुत अन्तर है।एकान्तनियतवादी तो पुरुषार्थादि अन्य समवायों की उपेक्षा कर एकांत नियतिवाद का आश्रय लेकर स्वच्छन्दता का पोषण करता है, जबकि क्रमबद्धपर्याय का सिद्धान्त तो पुरुषार्थादि अन्य समवायों को साथ लेकर चलता है।

  • इस सन्दर्भ में जैनेन्द्र सिद्धान्तकोशकार की टिप्पणी द्रष्टव्य है -
    "जो कार्य या पर्याय जिस निमित्त के द्वारा जिस द्रव्य में जिस क्षेत्र व काल में जिसप्रकार से होना होता है, वह कार्य उसी निमित्त के द्वारा उसी द्रव्य, क्षेत्र व काल में उसीप्रकार से होता है। ऐसी द्रव्य, क्षेत्र, काल व भावरूप चतुष्टय से समुदित नियत कार्य-व्यवस्था को ‘नियति’ कहते हैं। नियत कर्मोदयरूप निमित्त की अपेक्षा इसे ही ‘दैव’, नियतकाल की अपेक्षा इसे ही ‘काललब्धि’ और होने योग्य नियतभाव या कार्य की अपेक्षा इसे ही ‘भवितव्य’ कहते हैं।

  • इस संदर्भ में स्वामीजी का स्पष्टीकरण भी देखिए -
    “गोम्मटसार में जो नियतिवाद क्या है, वह तो स्वच्छन्दी का है। जो जीव सर्वज्ञ को नहीं मानता, ज्ञान स्वभाव का निर्णय नहीं करता, जिसने अन्तरोन्मुख होकर समाधान नहीं किया है, विपरीत भावों के उछाले कम भी नहीं किये हैं, और ‘जैसा होना होगा’ - ऐसा कहकर मात्र स्वच्छन्दी होता है और मिथ्यात्व का पोषण करता है - ऐसे जीव को गोम्मटसार में गृहीतमिथ्यादृष्टि कहा है किन्तु ज्ञान स्वभाव के निर्णयपूर्वक यदि इस क्रमबद्धपर्याय को समझे तो ज्ञायक स्वभाव की ओर के पुरुषार्थ द्वारा मिथ्यात्व और स्वच्छन्द छुट जाय।”

नियतिवाद एक अपेक्षा सही नहीं, किंतु अपेक्षा सहित होने से सही है।

बिलकुल सही। सब कुछ नियति पर है ऐसा मानने से अन्य पुरुषार्थ आदि समवायों का अभाव हो जाता है।

मात्र नियतिवाद की सोच ग़लत है, अनेकांत युक्त नियतिवाद की सोच ग़लत नहीं है।

यहाँ पर जो बात कही गयी है वह एकांत से नियतवाद को मानने के कारण कही गयी। है। किंतु अनेकांत से क्रमबद्धपर्याय को स्वीकार करने का आदेश तो अनेकों ग्रंथो में दिया गया है।

मैं निश्चित तो नहीं हूँ किंतु इसके ऐसा अंतर खड़ा किया जा सकता है कि नियतवाद में द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव चारों की नियतता की बात है, जबकि कालवाद में सिर्फ़ काल को मुख्य करके चर्चा है। अतः इस तरह का अंतर समझ जा सकता है।

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Seems contradictory -

Also, Kartikey anupreksha gatha tells niyati in terms of what KEVALI has seen and hence is samyak or right, but Gommatsara karmakand and Panchsangrah gatha tells niyati mithyatva when SAMSARI JIVA think so. May be that is reason ?