दर्शन मोह कर्म और जीव

जब कर्म की मुख्यता से बात की जाती है तो कहा जाता है की दर्शन मोह कर्म के उदय में जीव को मिथ्यात्व रहता है। पुरुषार्थ की मुख्यता से कहते है की कर्म जीव का कुछ नहीं करता। तो क्या दर्शन मोह के उदय में जीव मिथ्यात्व न करे ऐसा हो सकता है ?

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ऐसा तो नहीं होता है कि मिथ्यात्व कर्म का उदय होने पर औदयिक भाव ना हो, परंतु इतना अवश्य है कि मिथ्यात्व के अभाव का प्रयत्न मिथ्यात्व के ही मंद उदय में प्रारंभ हो जाता है।
सम्यक दर्शन के पहले होने वाली पांच लब्धियां इसी बात का प्रमाण है।

एक विशेष बात यह भी है कि यदि दर्शन मोह के भेदों की अपेक्षा से देखा जाए तो मिथ्यात्व और सम्यक मिथ्यात्व के उदय में तो जीव के भी मिथ्यात्व के परिणाम होते हैं परंतु सम्यक-मिथ्यात्व प्रकृति के उदय में जीव के मिथ्यात्व के परिणाम नहीं होते है (इसके उदय के साथ तो क्षायोपशमिक सम्यक्तव पाया जाता है)।

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हा हो सकता।
दर्शन मोह की तीन प्रकुति है।

  1. मिथ्यात्व
  2. सम्यक्मिथ्यात्व
  3. सम्यक प्रकुति

इसमे सम्यक्मिथ्यात्व दर्शन मोह की जात्यन्तर सर्वघाति प्रकृति है जो मिथ्यात्व और सम्यक्त्व का मिश्र जैसा काम करती है।

सम्यक प्रकृति के उदय में जीव का क्षयोप्शमिक सम्यक्त्व बना रहता है।

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अगर दर्शन मोह के उदय में जीव मिथ्यात्व के अभाव का प्रयत्न नहीं कर पाए तो उदय कभी मंद ही नहीं होगा। और तीव्र होता जायेगा। और दर्शन मोह की सम्यक्त्व प्रकृति किन कारणों से होती है?

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जात्यन्तर सर्वघाति प्रकृति क्या है ?

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आपकी जिज्ञासा बहुत अच्छी है।
आप ये video प्रवचन में गुणस्थान का अच्छा खुलासा किया है।
आप इसका स्वादध्याय कर सकते है।

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Kishanji and Shalabhji,
Thanks for your response. However my basic question is still unanswered.
जब दर्शन मोह के उदय में जीव अन्यथा श्रद्धान ही करे तो और दर्शन मोह का बंध होगा। ऐसे तो कभी सम्यक्त्व हो ही नही पाएगा।

क्या आपने गुणस्थान की पढ़ाई की हुई है?

जब दर्शन मोह की 3और चारितमोह की 4प्रकति का उपशम छय या छयो पशम होता है तो सम्यक्त्व होता है
तो 4 गुणस्थान बनता है पर बाकी की कर्म प्रकति तो बढ़ती ही है

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सम्यक्त्व के लिये 7 प्रकति का काम है

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Yes but not extensive.

इससे क्या तात्पर्य है?

सात प्रकृतियों के में दर्शन मोह की तीन और अनंतानुबंधी की चार, सो दर्शनमोह तो पूरा आ ही गया, और क्या शेष रहा?

बाकि 21 तो रहती ही है

वह सभी तो चारित्र मोहनीय की है 12 अप्रत्याख्यानावर्णी आदि की + 9 नो-कषाय

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तो क्या जैसे अकाम निर्जरा होती है वैसे दर्शन मोह के उदय में जीव मिथ्यात्व रूप परिणमन नहीं करे ऐसा हो सकता है ?

यदि दर्शन मोह की अभेद प्रकृति की बात करें तो ऐसा नहीं हो सकता है।

सम्यक दर्शन होने के पूर्व होने वाली पांचवीं करण लब्धी में दर्शन मोहनीय की 3 और अनंतानुबंधी की 4 प्रकृतियों का अंतरकरण और उपशमकरण विधान होता है। उस कारण से वे प्रकृतियां अंतर्मुहुर्त तक उदय में आने के अयोग्य होती है, और तब जीव के सम्यक परिणाम ही होते है, वह काल ही उपशम सम्यक दर्शन का है। किसी प्रकार ऐसा संभव नहीं की उदय भी आता रहे और जीव के परिणाम भी उस जाति के ना हो।
इस बात में मुख्य बिंदु यह है कि दर्शन मोह के उदय (मंद) में ही पांच लब्धियां (ये सम्यकदर्शन के पूर्व होती हैं) होती है, परंतु मिथ्यात्व के परिणाम का अभाव तो उसके उदय का अभाव होने पर ही होता है, उसके बिना नहीं।

यह तो जिनागम का कर्म सिद्धांत है कि जब जब कर्म का उदय होगा तब तब जीव के औदयिक परिणाम भी अवश्यमेव होगा, अन्यथा कर्म के उस परिणाम को उदय नाम ही नहीं मिलेगा ।
ऐसा होने पर भी हर एक उदय होने पर बंध हो - ये भी नियम नहीं। कैसे? क्यूंकि जघन्य परिणाम बंधन का कारण नहीं होता।
जघन्य परिणाम के उदाहरण-
१) दर्शन मोहनीय की सम्यक प्रकृति के उदय में होने वाला परिणाम - वह नवीन दर्शन मोह के बंधन का कारण नहीं होता।
२) १०वे गुण स्थान में सूक्ष्म लोभ के उदय में होने वाला चारित्र मोहनीय का जघन्य परिणाम नवीन चारित्र मोहनीय के बंधन का कारण नहीं।

आप अकाम निर्जरा को यहां किस रूप में जोड़ रहे है, कृपया बताएं। प्रकरण को अधिक स्पष्ट करने के लिए अकाम निर्जरा का स्वरूप भी स्पष्ट करें।

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सम्यक दर्शन जब होगा जब कर्म की स्थति अन्तः कोड़ाकोड़ी हो

इसी लिए मेरा प्रश्न था की क्या दर्शन मोह के उदय मे हम मिथ्यात्व नहीं करे ऐसा हो सकता है ?

दर्शन मोह के उदय में मिथ्यात्व होगा

दर्शन मोह के उदय में क्षयोप्शमिक सम्यकदर्शन पाया जाता है।