तो आप यही कहना चाहते है किसी भी तरह से यदि पशु का दूध निकाला जाता है तो वह सेवन योग्य नहीं है ???
आपने शुरुवाती वाक्यों में कहा कि लोग गाय के दूध पर ही अटक जाते हैं , ऐसा मोटे तौर पर समझाने हेतु कहा है । ओर रही बात अटकने की तो खुल कर कहा जाए कि जिनको जिनवाणी की बात समझ में आ गयी है वे देशकाल परिस्थितियों से सामंजस्य बनाते हुए अपनी योग्यता नुसार वीतराग भाव की ओर बढ़ते जाते हैं , वे अटकते नहीं हैं । क्योंकि उनको पता है कि संसार में रहने का भाव भी हिंसा युक्त है, बिना हिंसा के किसी भी जीव का रहना असंभव है। वीगन शैली अपना कर धर्म किया तो सोने पर सुहागा है पर सिर्फ वेगन ही बने रहे तो जिनवाणी में उनको मूढ़ ही कहा है । इसलिए जिनवाणी के अलावा अन्य विषयों में इतना उलझना ओर समय खपाना ठीक नहीं।
ये सब तो ऐसे ही चलेगा पर ये सोचो कि मनुष्य जीवन कब तक चलेगा। इसलिए अटकना महापाप है।
दूध पीने वाले प्रत्यक्ष रूप से नहीं किंतु अप्रत्यक्ष रूप से मांसाहारी ही है , आप जानें इस विडियो के माध्यम से । शायद ही कोई मंदबुद्धि व्यक्ति हो जो इस बात को
इस सत्य को समझ नहीं पाएगा, किसी को शराब की आदत है , तो किसी को दूध की आदत है , आखिर में दोनों नशा ही है , चाहे दूध का हो या चाहे शराब का , इंसान किसी भी प्रकार के दूध के बिना भी जीवित रह सकता है ।
इंसान ही एक ऐसा प्राणी है जो बचपन में अपनी मां का दूध पीता है और बुड्ढे होने तक जहां तक मृत्यु नहीं हो जावे वहां तक दूसरी मांओं का दूध छीन के पीता है!
दूध पीने वाला प्रत्येक व्यक्ति गाय भैंस और बकरी आदि के बच्चों का अधिकार छीन रहा है अर्थात ना बोल सके ऐसे मजबूर प्राणियों पर जुल्म कर रहा है, यह आप स्वयं सोचें ,![]()
जितना सस्ता और ज्यादा दूध और Dairy Products का उत्पादन उतना ज्यादा मांसाहार बढ़ रहा है,
दूध पीने वाले मांसाहार को सस्ता करके उसे बढ़ावा दे रहे हैं!
यहां पर क्लिक करें और इस वीडियो को अंतिम तक सुने यदि आप में इंसानियत है ,![]()
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*यदि पशुओं को कत्लखाने मे जाने से बचाना है!*![]()
पहले की परिस्थिति जो भी हो लेकिन आज के समय में
सारे नर बच्चों को अनुपयोगी होने के कारण बेच दिया जाता है और वह अंत में कतलखाने में मारे जाते हैं,
आप कोई भी दूध उत्पादक को पूछताछ से जान जाएंगे कि सारे नर अब खेतीबाड़ी ट्रेक्टर से होने के कारण अनुपयोगी है और उसका जीवन वहन करना नुकसानदायक होने से मांस के लिए बेचे जाते हैं.
इसीके कारण दूध हिंसात्मक उत्पादन श्रेणी में जाता है.
AtmaDharma.com has researched a lot about Vegan and shared their findings here. Both across the US and India.
https://atmadharma.com/shastras/vegetarian_food_and_jain_conduct_eng_txt/vfjcmpmilk.html
तभी आगम में वस्तु विशेष को छोड़ने की बात नहीं कही जबकि आगम में जमीकंद ( कंदमूल)के त्याग की बात कही है जो कि उसका लक्षण है ना की वस्तु इसलिए आलू की बात प्राचीन शास्त्रों में नहीं कहीं लेकिन जिमीकंद की बात प्राचीन शास्त्रों में कही गई है
और मुनिराज उद्दिष्ट आहार के त्यागी होते हैं तो श्रावक अपने लिए दूध निकाल कर लाए और मुनिराजों को देवै तो वह पूर्णत: उचित है
Thanks a lot, it will help me in spreading awarenss
**किस प्राचीन ग्रंथ मे ज़मीकंद न खाने की बात लिखी है?
अंडा न खाने की बात किस ग्रंथ मे सबसे पहले आई है?
जिलेटिन की बात किस मे आई है? **
कई शादियों वाली बात पर आपका क्या कहना है ?
Bhut bhut anumodna. Dekh kar bhut प्रसन्ता हुई की atleast koi Jain organisation to iss par research krke logo ko aaj ki dairy practices se jagruk kar rahi hai.
And aaj agar people अहिंसक dairies se milk nhi le sakte then unko milk chorna hi chaiye kyonki baaki sab milk अभक्ष hi hai.
Bhut bhut anumodna ![]()
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