अविनाभाव संबंध और निमित्त नैमित्तिक संबंध में क्या अंतर है?

अविनाभाव संबंध और निमित्त नैमित्तिक संबंध में कोई विशेष अंतर है ?

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अविनाभवी संबंध एक द्रव्य का उसही द्रव्य के गुण या पर्याय के साथ होता है।इसका कथन अन्वय और व्यतिरेक दो रूप में होता है।
जैसे-जीव और ज्ञान गुण में अविनाभाव संबंध है।
1.जहाँ -जहाँ जीव वहाँ-वहाँ ज्ञान।यह अस्ति की अपेक्षा,यानी अन्वय।
2.और जहाँ ज्ञान नहीं वहाँ जीव भी नहीं।यह व्यतिरेक यानी नास्ति की अपेक्षा कथन।

पर निमित्त नैमित्तिक संबंध असमान जाति द्रव्य पर्याय में होता है। जैसे-जीव और पुदगल।

वास्तव में नैमित्तिक कुछ नहीं होता ।जब भी कोई कार्य होता है, तब निमित्त की अपेक्षा उसे नैमित्तिक कहते हैं।
दृष्टांत-कुम्हार ने मिट्टी से घड़ा बनाया।
तो यहाँ मिट्टी और घड़े में अविनाभावी सम्बंध। जहाँ- जहाँ घड़ा, वहाँ-वहाँ मिट्टी।
और कुम्हार और घड़े में निमित्त नैमित्तिक संबंध।

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शास्त्रों में धुंआ और अग्नि का अविनाभाव संबंध बताया गया है। क्या धुंआ अग्नि की गुण या पर्याय होती है?

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जिनागम में उदाहरण मात्र एकदेश घटित होते है।

आपका कहना बिल्कुल सही है। धुँआ न तो अग्नि का गुण है और न ही पर्याय। पर यहाँ धुंए और अग्नि का उदाहरण अन्वय, व्यतिरेक को समझाने के लिए है। न्याय मन्दिर में यही उदाहरण हर जगह प्रयोग किया है।

जैसे:- जहाँ-जहाँ धुँआ है, वहाँ अग्नि होगी ही-अन्वय और जहाँ अग्नि नहीं वहाँ धुँआ नहीं होगा-व्यतिरेक

पर अध्यात्म में अगर आत्मा पर घटित करें तो अविनाभावी संबंध एक द्रव्य का उसके गुण या पर्याय के साथ ही होता है
अविनाभवी का अर्थ है-एक के बिना दूसरे का न होना और सूक्ष्मता से विचार करें तो यह एकजैसे द्रव्य पर लागू होगा।

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मतलब अध्यात्म को न consider करें तो सिद्धांत में अविनाभाव और निमित्त संबंध में कोई विशेष अंतर नहीं ?

जैसे, चलती गाड़ी में पेट्रोल निमित्त है। मतलब गाड़ी चलेगी तब पेट्रोल उस समय present होगा।

गाड़ी जब नहीं चलेगी, तब या तो पेट्रोल (निमित्त) present नहीं होगा या फिर अगर किसी अन्य कारण से खराब होगी तब निमित्त का प्रसंग ही नहीं उठेगा ।

नही ऐसा नहीं है। पेट्रोल और गाड़ी चलने के उदाहरण में निमित्त नैमित्तिक संबंध तो है पर अविनाभावी संबंध नहीं।
क्योंकि अविनाभावी संबंध के लिए अन्वय व्यतिरेक का होना आवश्यक है। पर अगर गहराई से विचार किया जाए तो ऐसा नहीं है।

अन्वय-साधन(पेट्रोल) के सद्भाव में साध्य(गाड़ी का चलना) का सद्भाव। यदि ऐसा होता तो जहाँ-जहाँ पेट्रोल होता वहाँ-वहाँ गाड़ी का चलना होना ही चाहिए। पर ऐसा नहीं है।

व्यतिरेक-साध्य(गाड़ी चलना) के अभाव में साधन(पेट्रोल) का अभाव।यानी गाड़ी नहीं चल रही तो मतलब पेट्रोल नहीं है। पर ऐसा भी सिद्ध नहीं होता

यानी पेट्रोल और गाड़ी में अविनाभाव संबंध नही है और दोनो संबंधों पर बहुत अंतर है।

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Why not ??
अन्वय - साधन(गाड़ी का चलना) के सद्भाव में साध्य(पेट्रोल) का सद्भाव।

व्यतिरेक-साध्य(पेट्रोल) के अभाव में साधन(गाड़ी चलना) का अभाव।

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Plz note:
1.Yha sadhan=petrol
Sadhya=gadi ka chalna, not vice versa.

Agar aisa hota to hm petrol se bhari gadi nhi khadi kr sakte,because jha petrol hota vha gadi chalti hi chalti.moreover jha petrol hota vhi gadi chalti,na hm dhakka de pate aur na kheench pate.

Aisa hota to hm petrol ko aur kahi use bhi n kr pate aur na hi use store kr pate.

For further clarification I would request more knowledgeable people like @jainsulabh or @jinesh to help .

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What is the basis of determining sadhan and sadhya among 2 things for establishing relation ?

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पांच समवाय में निमित्त की जब चर्चा की जाती है तब मुख्य रूप से नियामक निमित्त को ही ग्रहण किया जाता है। जीव के परिणामों का निमित्त नैमित्तिक संबंध कर्मो की उदय आदि अवस्था से है। कर्मो को जीव के परिणामों के अंतरंग निमित्त के रूप में कहा गया है। इन अंतरंग निमित्त कारणों से कार्य की व्याप्ति बैठती ही है।
विचार करने पर प्रतीत होता है कि पांच समवाए में सभी की कार्य के साथ व्याप्ति बैठती है। यह व्याप्ति अन्वय और व्यतिरेक दोनो रूप में घटित हो जाती है, अतः विवक्षित कार्य की उनके 5 समवायो के साथ अविनाभाव संबंध घटित होता है (निमित्त में अंतरंग/नियामक निमित्त को लेने पर और उपादान में क्षणिक उपादान को लेने पर ही)।
अविनाभाव संबंध दो दव्यो की पर्यायों के बीच, एक ही द्रव्य की पूर्व-उत्तर पर्यायो के बीच, अथवा द्रव्य-गुण के बीच में भी घटित हो जाता है। इसीलिए अविनाभाव का क्षेत्र निमित्त नैमित्तिक के क्षेत्र से ज्यादा व्यापक है।
निमित्त में बहिरंग निमित्त या अनियामक निमित्त की भी मुख्यता कभी कभी प्रसंगवश की जाती है, उस स्थिति में निमित्त नैमित्तिक संबंध अविनाभाव के क्षेत्र से ज्यादा व्यापक है (क्योंकि बहिरंग निमित्त के साथ में अन्वय और व्यतिरेक का होना आवश्यक नहीं है)।

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साध्य (probandum) has commitment to three criteria¹ -

  • Desirable (इष्ट / अभिप्रेत) - जो वक्ता को इष्ट हो, जिसे वह सिद्ध करना चाहता है.
  • Unproved (असिद्ध) - जिसको समझना है, उसके लिए वह पहले से सिद्ध नहीं होना चाहिए. अन्यथा, साध्य बनाने का क्या लाभ?
  • Uncontradictory (अबाधित / शक्य) - वह किसी भी अन्य प्रमाण से बाधित न हो अथवा उसमें विरोध नहीं आना चाहिए. वह शक्य होना चाहिए.

Just one condition - the relation of invariable concomitance (व्याप्ति)² of the साधन with the साध्य such that if the former is present, then the latter must also be. And if the latter is absent, the former is also absent.

Here, I think अविनाभाव सम्बन्ध is confused with तादात्म्य सम्बन्ध (for more on तादात्मय सम्बन्ध, check this thread). अविनाभाव सम्बन्ध need not be necessarily restricted to one substance. For instance,
Statement / Relation
अन्वय
व्यतिरेक
1. जीव और कर्मबन्ध
जहाँ जहाँ कर्म बन्ध, वहाँ वहाँ जीव
जीव के बिना कर्म बन्ध नहीं.
2. मोक्ष की प्राप्ति और पुरुष पर्याय
जो जो मोक्ष गये वे पुरुष पर्याय से ही गये
पुरुष पर्याय के बिना मोक्ष की प्राप्ति नहीं.

इनमें, और ऐसे अनेक उदाहरण है, जिनमें अविनाभाव तो है, लेकिन तादात्म्य नहीं.

As already stated by @jainsulabh,

अतः सभी तादात्म्य सम्बन्ध में अविनाभाव तो होता है, लेकिन जितने अविनाभाव सम्बन्ध है, उनमें तादात्म्य हो भी सकता है, और नहीं भी.


¹ परीक्षामुख, 3.16 (Link for PDF - English, Hindi)
² परीक्षामुख, 3.11

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अविनाभाव संबंध का एक प्रकार निमित्त-नैमेत्तिक संबंध हो सकता हैं।

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ये तब जब आप कर्मोदय को निमित्त के रूप में देख रहे हैं। बहिरंग निमित्त के साथ अविनाभाव संबंध का होना आवश्यक नहीं है।

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अविनाभाव संबंध व्यापक है,और निमित्त -नैमेत्तिक संबंध व्याप्य है।
-अर्थात अविनाभाव के अन्तरगत ही निमित्त-नैमेत्तिक सम्बन्ध आ जाता है।
इसका स्पष्टिकरण परिक्षामुख सूत्र के अन्दर आये अविनाभाव के भेदो से हो जाता है,अविनाभाव के दो भेद होते हैं
1.सहभाव 2.क्रमभाव ।
●वहाँ क्रमभाव की परिभाषा दी है कि जहाँ पूर्व उत्तर भावी पदार्थ में व कारण कार्य में क्रम भाव अविनाभाव होता।
है,और जो निमित -नैमेत्तिक संबंध है ,वह कारण कार्य व्यवस्था के अंतर्गत आता है।

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