तादात्म्यसम्बन्ध- मोक्षमार्गप्रकाशक

मोक्षमार्गप्रकाशक

#1

मोक्षमार्गप्रकाशक के सातवें अधिकार में ऐसा आया है -

यहाँ कोई कहे कि शास्त्रोंमें आत्माको कर्म – नोकर्मसे भिन्न अबद्धस्पृष्ट कहा है?
उत्तरः — सम्बन्ध अनेक प्रकारके हैं। वहाँ तादात्म्यसम्बन्धकी अपेक्षा आत्माको कर्म-नोकर्मसे भिन्न कहा है, क्योंकि द्रव्य पलटकर एक नहीं हो जाते, और इसी अपेक्षासे अबद्धस्पृष्ट कहा है। अथवा निमित्त-नैमित्तिक सम्बन्धकी अपेक्षा बन्धन है ही, उनके निमित्तसे आत्मा अनेक अवस्थाएँ धारण करता ही है; इसलिये अपनेको सर्वथा निर्बन्ध मानना मिथ्यादृष्टि है।

यहाँ पर अबद्धस्पृष्ट और तादात्म्यसम्बन्ध का अर्थ क्या है ? व् सम्बन्ध के और कौनसे प्रकार हैं ?


#2

सम्बन्ध के अनेक प्रकार है किन्तु कुछ की चर्चा यहाँ संक्षेप में करते है:

  • तादात्म्य संबंध - (समयसार, गाथा 61 की टीका ); जो वस्तु सर्व अवस्थाओं में जिस भावस्वरूप हो और किसी भी अवस्था में उस भाव स्वरूपता को न छोड़े; उस वस्तु का उन भावों के साथ तादात्म्य सम्बन्ध होता है । {द्रव्य और गुण में नित्य तादात्म्य और द्रव्य तथा पर्याय में अनित्य तादात्मय; एक के बिना दूसरे का होना असंभव}
    इसी को व्याप्य-व्यापक सम्बन्ध भी कहते है (समयसार कलश, 49) |

  • संयोग सिद्ध संबंध (समयसार, गाथा 69-70 की टीका के आधार से) - स्वभाव और विभाव में - यद्यपि क्रोध आत्मा में होता लेकिन क्रोध और आत्मा में ऐसा सम्बन्ध नहीं है जैसा आत्मा और ज्ञान में है । अतः क्रोध को आत्मा का संयोगी भाव कहा जाएगा, स्वभाव नहीं |

  • एकक्षेत्रावगाह सम्बन्ध - (समयसार, गाथा 69-70 की टीका) एवं जीवपुद्गलयोः परस्परावगाहलक्षणसंबंधात्मा बन्धः सिध्येत् - इसप्रकार इस जीव के और पुद्गल के परस्पर अवगाह लक्षणवाला संबंधरूप बंध सिद्ध होता है ।

बस इसमें विशेष इतना है कि एकक्षेत्रावगाह रूप सम्बन्ध दो प्रकार के है –

  1. दो द्रव्यों का एक क्षेत्र में मात्र रहना, बिना किसी बंधन के | (जैसे – सिद्ध भगवान् के प्रदेशों में ही अनंत निगोदिया जीव भी रहते है और कार्माण वर्गणायें भी है लेकिन बंधन रूप एकक्षेत्रावगाह नहीं है)

  2. दो द्रव्यों का एक क्षेत्र में रहना + बन्ध (हमारे साथ जितने क्षेत्र में आत्मा के प्रदेश है उन्हीं प्रदेशों में कार्माण वर्गणायें भी है लेकिन बन्धन रूप है)

यहाँ जो दूसरा वाला एकक्षेत्रावगाह सम्बन्ध है, उसे निमित्त-नैमित्तिक सम्बन्ध का एक sub-set समझना चाहिए ।

अतः पण्डितजी के कथन का भाव यह है कि आत्मा को संसार दशा में अबद्धस्पृष्ट सर्वथा नहीं कहा जा सकता, अन्यथा निश्चयाभास होगा |

संबंधों के अन्य भेदों के लिए देखें - सम्बन्ध


#3

कृपया अबद्धस्पृष्ट की व्याख्या करें।


#4

अबद्धस्पृष्ट - आत्मा कर्मों से न बँधा है, न ही वे कर्म आत्मा को छूते है ।

समयसार, गाथा 14, आत्मख्याति टीका -

अबद्धस्पृष्ट - जिसप्रकार जल में डूबे हुए कमलिनी पत्र का, जल से स्पर्शितपर्याय की ओर से अनुभव करने पर, देखने पर, जल से स्पर्शित होना भूतार्थ है, सत्यार्थ है; तथापि जल से किंचित्मात्र भी स्पर्शित न होने योग्य कमलिनी पत्र के स्वभाव के समीप जाकर अनुभव करने पर जल से स्पर्शित होना अभूतार्थ है, असत्यार्थ है।
इसीप्रकार अनादिकाल से बंधे हुए आत्मा का पुद्गलकर्म से बँधने, स्पर्शित होनेरूप अवस्था से अनुभव करने पर बद्धस्पष्टता भूतार्थ है, सत्यार्थ है; तथापि पुद्गल से किंचित्मात्र भी स्पर्शित न होने योग्य आत्मस्वभाव के समीप जाकर अनुभव करने पर बद्धस्पृष्टता अभूतार्थ है, असत्यार्थ है।


#5

इसे संश्लेष संबंध भी कहते हैं। और इनके बीच में अनुपचरित असदभूत व्यवहार नय घटित होता है।