केवलज्ञान होने के लिए क्या पुण्य बाधक है?

चार घतिया कर्मों का नाश करके केवल ज्ञान की प्राप्ति हो जाती है तो क्या पुण्य इसमें रुकावट नहीं बनता ? घातिया कर्म तो अप्रशस्त ही है, लेकिन अघातिया कर्म प्रशस्त भी है और अप्रशस्त भी।

पाप के क्षय से केवलज्ञान की प्राप्ति हो जाती है और पुण्य का क्षय जब होता है तब होती है सिद्धत्व की प्राप्ति।

केवलज्ञान होने के बाद निश्चित रूप से उसी भव से ही मोक्ष जाना है तो क्या पुण्य का क्षय अपने आप हो जाता है। पुण्य कैसे छूट जाता है ?

I heard a very intelligent muni - Pranamya sagar ji saying that shuddhopayog results in even greater punya compared to shubhupyog, only punya kriya is left in it.

See below video from 40:41 to 53:43 minutes.

पाप पुण्य की बात आयी है तो यह भी विचार करें कि प्रवचन में पूज्य महाराज जी किस पाप पुण्य की बात कर रहे है। उन्होंने द्रव्य कर्म में जो पुण्य पाप का भेद है, उसकी बात की है।

सामान्य रूप में पाप पुण्य की निम्न रूप में बात आती है और सभी के सद्भाव और अभाव होने में भी भिन्नता मिलेगी।

~ पाप और पुण्य के परिणाम (सभी प्रकार के कषाय भाव - मंद/तीव्र - इनकी सीमा १०वे गुणस्थान तक है)

  • बुद्धिपुर्वक और अबुद्धिपुर्वक
  • उनकी गाड़ता कितनी है - अनंतानुबंधी आदि किस कषाय चतुष्ट्य के साथ वो पाए जाते है।

~ पाप और पुण्य कर्म (घाति और अघाति द्रव्य कर्म रूप)

  • पाप और पुण्य का बंध
  • पाप और पुण्य की सत्ता
  • पाप और पुण्य का उदय

~ पाप पुण्य क्रिया ( शरीर आदि की या अन्य बाह्य अनुष्ठान आदि की क्रिया को जीवों के परिणामों के निमित्त के कारण उपचार से पुण्य पाप रूप कहना)

इन सभी का अभाव कब किस गुणस्थान में होता है, उसको ध्यान में देने से ये बात क्लियर हो जाएगी। विवक्षा और अपेक्षा को समझने पर विरोध भाषित नहीं होगा।

If something more can be added, please say.

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शुद्धभाव के साथ जैसे शुभभाव रूप परिणाम होते हैं, उनसे अति तीव्र पुण्य का बंध होता हैं। मात्र शुद्धभाव से ही अगर पुण्य बंध माने तो सिद्ध अवस्था में पुण्य बंध मानने का विरोध उत्पन्न होगा। Something similar also discussed here: ऊपर ऊपर के गुणस्थानों में पुण्य बन्ध का मुल कारण क्या?

केवलज्ञानी को स्थिति - अनुभाग बंध नहीं होता, अतः पूर्व में बंधी पुण्य प्रकृति का भोग मात्र रहता हैं। प्रकृति - प्रदेश का एक समय मात्र बंध तथा निर्जरा होता हैं (ईर्या-पथ आस्रव).

So over the time period of remaining आयु, the stock of पुण्य कर्म keep depleting and in the end, if there’s any inconsistency like पुण्य कर्म is greater than आयु, then something magical happens which is terms as समुद्घात।

Also, need to deep dive into the कर्म अवस्थायें in different गुणस्थान, especially after 10th (for current context) to have a proper understanding of what kind of परिणाम results in what kind of फल।

Correct me if wrote something inaccurate : )

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Answering to the original question in the heading-
केवालज्ञान के होने में पुण्य परिणाम(कषाय भाव होने के कारण) नियम रूप से बाधक है, परंतु पुण्य का उदय-सत्ता बाधक नहीं है।
पुण्य में उपादेय बुद्धि तो सम्यक दर्शन में भी बाधक है।

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