विचार और विकल्प में अंतर

विचार और विकल्प में क्या अंतर है ?
निर्विचार अवस्था और निर्विकल्प अवस्था मे क्या अंतर है?
शास्त्र के आधार के माध्यम से स्पष्ट करें।

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Both the terms are pretty much used to denote the same thing. Here’s a reference from Rahasya Purn Chithhi:

but sometimes there may be difference which totally depends on the context it has been used for.

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@Sowmay यहाँ पंडित टोडरमलजी ने विचार और विकल्प का स्पष्ट भेद बताया है, जरूर पढ़ें

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Totally agree but…

करणानुयोग का कथन।

आपके द्वारा दिए गए reference में बाहरवें गुणस्थान पर्यन्त विचार का सर्वथा सद्भाव बताया - यहाँ ज्ञान पर्याय को विचार तथा राग द्वेष को विकल्प बताया गया हैं

द्रव्यानुयोग का कथन।

तथा पूर्व में “सविकल्प से निर्विकल्प दशा प्राप्ति” के प्रकरण में विचार छूट जाना चतुर्थ गुणस्थान से अनुभव काल में बताया => "…तत्पश्चात ऐसा विचार तो छूट जाय…नय-प्रमाणादिक का भी विचार विलय हो जाता हैं।"

. . .

सामान्य रूप से विचार को ज्ञान की पर्याय तथा विकल्प को राग-द्वेष की पर्याय कहा जा सकता हैं। प्रकरणानुसार शब्द के अनेक वाच्य हो सकते हैं - स्याद्वाद तथा तर्क-वितर्क द्वारा जैसे राग-द्वेष में कमी हो वैसे अर्थ ग्रहण करना।

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मैंने फेसबुक पर हसमुख दोषी जी की पोस्ट में पढ़ा था जिसमे उन्होंने सायद विचार को उबलते हुए पानी में ऊपर की ओर उठते हुए बड़े बुलबुले और विकल्प को पानी में निचे बने हुए छोटे बुलबुलो की तरह बताया था, प्रसंग यह था की दो इन्द्रिय तीन इन्द्रिय आदि जीवो को विकल्प कैसे होते होंगे

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निर्विचार और निर्विकल्प की स्पष्टता रत्नकरण्ड श्रावकाचार के page - 423
शुक्लध्यान वाले प्रकरण में विस्तार से स्पष्ट तरीके से समजाया है।

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