अपेक्षाओं से कैसे बचे

#1

दूसरे के प्रति जो हमारी आकांक्षायें होती हैं… उनसे कैसे बचे?

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#2

पर द्रव्य का परिणमन में करा ही नही सकता।ऐसा श्रद्धान (विश्वास) है।

छःढाला की तीसरी ढाल में दूसरा छंद

परद्रव्यन्ते भिन्न आपमे रुचि सम्यक्त्व भला है
आपरूप को जान पनो सो सम्यगज्ञान कला है।

यही बात का चिन्तवन करना है। यही सम्यक्त्व है।

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#3

आदरणीया कल्पना दीदी जी के अनुसार दूसरों से किसी भी तरह की अपेक्षा करना विष समान है। Expectation is the dangerous poison in the world.
Regards to this,जब हम परद्रव्य में हस्तक्षेप ही नहीं कर सकते, सभी द्रव्य स्वतंत्र हैं एक द्रव्य दूसरे द्रव्य का कुछ कर ही नहीं सकता तो फिर किसी अन्य से अपेक्षा करने का हमारा क्या अभिप्राय है।
विचार करें कि जब हम खुद से ही कुछ अपेक्षा करते हैं तो उसका भी कुछ भरोसा नहीं है कि वह पूरी होगी या नहीं तो हम अन्य मैं हस्तक्षेप करने का भाव क्यों करें।
आचार्य कल्प पंडित टोडरमल जी के अनुसार यदि कहा जाए तो यह जीव खुद ही कल्पना करता है और खुद ही दुखी होता है इसलिए पर द्रव्य को परिणमन कराने का विचार मिथ्यात्व ही है।
(सुधार अपेक्षित है)

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#4
  • अपेक्षा का मूल कारण - जिसको जिसमें/जिससे जितनी सुख की कल्पना होती है, उसको उसमें/उससे उतनी अपेक्षाएं जन्म लेती है।
    (इसे काफी practically विचार करना पड़ेगा, analyse करके इसकी validity स्वयं देखना पड़ेगी)
  • अपने जीवन में भी और जगत में भी एक बात देखी जाती है कि अपेक्षा उनसे ही होती है जिनसे अपनत्व होता है (वह अपनत्व किसी भी रूप में हो सकता है), अतः अपनत्व के अभाव में ही अपेक्षाओं का अभाव संभव है। स्व की पहचान पूर्वक उसी में संतुष्ट होने पर स्व में अपनत्व भी आएगा और पर से अपनत्व का भी अभाव होगा। फलतः अपेक्षाओं का भी स्वयमेव अभाव होगा।

Some important points regarding this-

  • मिथ्यात्व से पर में सुख बुद्धि होती है और भूमिकानुसार विद्यमान कषाय से सुख का विकल्प होता है।
  • जब प्रयास सुख बुद्धि तोड़ने का होगा तब धीरे धीरे पर में सुख के विकल्प ढीले भी स्वयमेव होंगे और विशुद्धता के बढ़ने पर उनका घटना भी होगा।
  • अपेक्षा का होना एक कार्य है, उसका कारण जब तक विद्धमान है तब तक वो कार्य भी होगा ही।
  • भूमिका के योग्य विकल्प होते ही हैं, अतः भूमिका को ऊंची करने का पुरुषार्थ करना श्रेयस्कर है। भूमिका के योग्य होने वाले विकल्पों से बलजोरी करने का प्रयास निरर्थक है।
  • उन विकल्प से भी सदा भेदज्ञान करना योग्य है।

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#5

Bahut Bahut dhanyawaad

#6

हमें दूसरों से ज्यादा अपेक्षा करने पर उपेक्षा का सामना करना पड़ सकता है,अतः अपेक्षा करना श्रेयस्कर नहीं है।