प्रशंसा और निंदा

#1

@jainsulabh
Q.1 क्या हमे ऐसे प्रयास करना चाहिए की कोई हमारी प्रशंसा या निंदा ना करे ? प्रशंसा और निंदा तो लोग भगवान की भी करते है। या ऐसा प्रयास करे की हमारे भाव में प्रशंसा और निंदा से कोई फर्क न पड़े ?
Q. 2 क्या किसी के गुणों की अनुमोदना करने में भी राग का भाव है ?
Q. 3 अगर कोई गलत कार्य कर रहा है, और हम उसे उसका आभास कराये तो क्या वो उसकी निंदा होगी? क्या वह द्वेष का भाव होगा?
Q. 4 हम लोग पंडित जी को छोटे दादा कहते है। क्या वहा हमारा राग भाव है ?

#2
अच्छा है आपने ये बात उठाई है।

प्रशंसा और निंदा दोनों ही भाव कषाय रूप हैं। इनमे मंदता-तीव्रता, प्रशस्त-अप्रशस्त, और स्व-पर जन्यता के द्वारा भी भेद हो जाते है। यह बात भी ध्यान देने योग्य है कि व्यक्ति-वाचक निंदा तो सदैव अप्रशस्त रूप ही होती है(in my opinion)।

हिंसा आदि अशुभ रूप विकारी परिणामों की निंदा और उनके समक्ष शुभ और मंद कषाय रूप भावो की प्रशंसा जिनवाणी में भी की जाती है। कहीं व्यक्ति की भी प्रशंसा और निंदा की हो तो वहाँ भी गुणो और दोषों के उपचार के कारण ही ऐसा किया जाता है। [अध्यात्म शास्त्र में तो शुद्ध भावों के समक्ष शुभ को भी अशुभ के साथ ही स्थान दिया जाएगा और फलस्वरूप समस्त शुभाशुभ भावों की निंदा-ग़र्हा की बात सामयिक के सम्बन्ध द्वारा की जाती है।] स्वाभाविक और वैभाविक भावों के सम्बन्ध में ये बात, अपनी परिणती को सुधारने और जीव को मोक्षमार्ग में आगे बढ़ाने के प्रयोजन से करने में कोई दोष नहीं दिखता।

Practically भी तत्व दृष्टि पूर्वक इस बात का विचार करना चाहिए कि क्या किसी अन्य के द्वारा निंदा प्रशंसा हमारे लिए कार्यभूत हो सकती है? अन्य के द्वारा निंदा प्रशंसा करने पर यदि हमारे स्वयं के परिणामों में क्रोध/द्वेष/राग/अभिमान रूप परिणाम होते है तो वो ज़रूर हमारे लिए अहितकारी साबित होंगे। दोनो में समभाव ही सूखकारी होते है।

1. हमारा प्रयास तो अपनी ही परिणती में से पर प्रशंसा-निंदा सम्बंधी राग द्वेष का अभाव करने का होना चाहिए। प्रशंसा के लिए किए अच्छे कार्य भी अच्छे नहीं कहे जाएंगे। लेकिन निंदा के प्रसंग में ये भी विचार किया जा सकता है की हमारी निंदा का कारण क्या है? कोई स्थूल दोष जिसको दूर किया जा सकता है और जिसको दूर करना चाहिए, यदि उसके कारण निंदा हो तो निंदा को भी इस प्रकार फलिभूत किया जा सकता है। उस सम्बन्ध में प्रयास किया जा सकता है।

Some points:

वचन और परिणामों संबंधी निंदा-प्रशंसा अपने आप में कोई अर्थक्रिया करने में समर्थ नहीं है। परन्तु भूमिका अनुसार और उदय अनुसार होती अवश्य है। उदय भी आवश्यक नहीं जैसा की कहा है -
लोक निंद्य कार्य करने पर निंदा का होना और प्रशंसनीय कार्यों में प्रशंसा का होना नियम रूप तो नहीं परन्तु स्वाभाविक अवश्य है। इस कारण से जगत में निंदनीय प्रवृत्ति से बचना या उसे छुप कर करना और प्रशंसनीय प्रवत्ति में सहज रूपता दिखाई देती है।
हाँजी, किसी की भी अनुमोदन, चाहे व्यक्तिवाचक हो या गुणवाचक हो, दोनो में राग पूर्वक ही प्रवत्ति होती है।
इस अभिप्राय से बात करना तो अंदर मे उस के प्रति करुणा भाव का सूचक है, न की द्वेष भाव का।

मोक्ष मार्ग प्रकाशक page no. 138

इस सम्बंध में समता षोदशी की ये पंक्तिया भी पथ प्रदर्शक हैं-
हाँ राग भाव तो है परंतु गुरु के प्रति विनय भाव आदि अनेक जाति के राग भाव भूमिकानुसार होते हैं। भूमिकानुसार रागादि का होना अलग बात है, परंतु उस समय भी श्रद्धान में उसे उपादेय नहीं मानना, बंध का ही कारण जानना, और वीतरग विज्ञान रूप परिणती को ही उपादेय मानना ।
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प्रशंसा की इच्छा से कैसे बचे
#3
सुलभ भैया ने प्रश्न के सम्पूर्ण भागों को बहुत अच्छे से explain कर ही दिया है। इसी विषय में आ.कल्पना दीदी ऐसा कहा करती थी कि―
“यदि कोई आपकी निंदा करता है तो विचार करना चाहिए कि वो जीव अपने स्वयं के द्वेष भाव के कारण मेरी निंदा कर रहा है, मैं तो ज्यों का त्यों ही रहा। उसकी निंदा के कारण मुझमे कोई दोष अधिक नहीं हुआ। उसीप्रकार यदि कोई हमारी प्रशंसा करता है तो वो उसके खुद के रागभाव वश करता है, उससे मुझमें कोई गुण अधिक नहीं हुआ। दोनों ही situations में समता धारण करना सच्चे आत्मार्थी की पहचान है। यदि कोई आपकी प्रशंसा करे तो उसको neutralise करने के लिए अपने दोषों का विचार कीजिये और कोई यदि निंदा करे तो अपने गुणों का विचार कीजिये। ”
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#4

इस चर्चा में एक और विचारणीय बिंदु-
प्रशंसा और निंदा मात्र वचनों से ही नहीं होती है, इसके भी मानसिक, वाचिक और कायिक तीनों रूप होते है। प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप में भी होती ही है। व्यावहारिक दृष्टि से सभी का अपना अपना स्थान है परन्तु परमार्थ से तीनों ही अन्य द्रव्य में अर्थ क्रिया करने में असमर्थ हैं।

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