दीक्षा के संबंध मे।

तो क्या नियति पर सब छोड़ दे

कुछ कर सकते हों तो करके देखलें।

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तो deekcha कोई लेता है या होनी होती सो होती है फिर तो यह बात हर कार्य पर लागू होनी चाहिये

होनी तो चाहिए।

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फिर तो सारे उपदेश निरर्थक हो जाये गे

पहले सारे उपदेशों का अपेक्षानुसार अनुसरण करके देखें।
उत्तर अपने आप मिल जाएगा।

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कुछ स्पष्ट करे की क्रम क्या हो

आपने पंडित सुमतप्रकाश जी से प्रश्न पुरुषार्थ समवाय को मुख्य करके किया था लेकिन उत्तर नियति समवाय को मुख्य करके मिला और आप संतुष्ट हो गए।

हाँ जी।

फिर तो यह वर्तमान में सभी मुनियों पर लागू होना चाहिए जो कि संभव नहीं।

जब उन सबके तीन कषाय चौकड़ी का अभाव हुआ होगा, तब उनको दीक्षा लेने के निमित्त अपने आप ही आ मिलें होंगे‌।

अगर तीन कषाय चौकड़ी का अभाव होगा तो जीव विपरीत परिस्थितियों में भी अङग रहेगा,28 मूलगुण आदि का अखंड पालन सहज ता में ही पलेगा, जीव को शुद्धोपयोग पूर्वक आत्मा की अनुभूति सहजता में ही होगी।

यह एक आदर्श राज मार्ग है।

बाकी तो भ्रष्ट मुनिभि भाव लिंगी हो कर उसी भव में मोक्ष जा सकते है।
परंतु यह अनुकरणीय मार्ग नही है।

चरणानुयोग के अनुसार

स्म्यक्त्व प्राप्त करके , गुणव्रत, शिक्षाव्रत, आदि धारण करके ,11 प्रतिमा का अखंड रूप से पालन होने बाद मुनिधर्म का अभ्यास करके दीक्षा लेनी चाहिए।

भावुकता में दीक्षा लेने से शुद्धोपयोग और 28 मूलगुण के पालन की बात तो दूर रही , धर्म की अप्रभवना के अलावा कुछ भी नही होता।

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अरे भाई। व्यर्थ के तर्क क्यों प्रस्तुत करते हो? ऊपर सभी शंकाओं का समाधान दिया तो जा चुका है। पुनः सभी पर टीका टिप्पणी करने से क्या लाभ?

चरणानुयोग के अनुसार

स्म्यक्त्व प्राप्त करके , गुणव्रत, शिक्षाव्रत, आदि धारण करके ,11 प्रतिमा का अखंड रूप से पालन होने बाद मुनिधर्म का अभ्यास करके दीक्षा लेनी चाहिए।
यह किस शास्त्र का प्रमाण है

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भाई, आपने गुणस्थान पढ़ा है
उसमे पहले 4 था सम्यक्त्व,5 व अणुव्रत,6 वा मुनिधर्म और फिर आगे यही क्रम है।
आप रत्नाकरण्ड श्रावकाचार का index देख लीजिए, हमे आचार्यो के भाव को हमे समझना चाहिए।

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ये क्रम सही है गुण स्थान की अपेक्छा से
लेकिन द्रव्यलिंगी साधु का यह क्रम कैसे बनेगा
और किसी गाथा या श्लोक का प्रमाण दे
और मूलाचार में आता है पहले deekcha और बाद में shikcha और बिना sikcha के भेद विज्ञान कैसे होगा

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जिनागम में स्याद्वाद शैली है प्रत्येक जगह पर अपेक्षा कृत कथन है । कथन के भाव को समझने का प्रयास कीजिये।

द्रव्यलिंगी का अर्थ मात्र ‘प्रथम गुणस्थानवर्ती मुनिराज’ - ऐसा तो है नहीं । चतुर्थ एवं पंचम गुणस्थान में भी जो मुनिराज है, वे द्रव्यलिंगी है, और ऐसा होने पर भी साधु संज्ञा को प्राप्त है, क्योंकि भावलिंग सब के ज्ञान का विषय नहीं । और उसके अनुसार पूज्यत्व का व्यवहार संभव नहीं ।

गुणस्थान एवं चरणानुयोग - दोनों की अपेक्षा पहले द्रव्यलिंग होगा, पश्चात् भावलिंग ।

शेष चर्चा यहाँ हुई है - DravyaLingi /BhaavLingi Muni

और यहाँ भी - द्रव्यलिंगी मुनि सारे दिन किसका ध्यान करते होंगे?

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प्रश्न ये बनता है कि यदि कोई दीक्षा लेता है तो उसकी तीन चौकड़ी समाप्त हुई माना जाये या उसके वैसी काल लब्धि थी तो उसकी दीक्षा हुई
तो जो दीक्षा होती है उसमें मुख्यता किसकी है
और जो मुनि है उसका कोनसा गुण स्थान माना जाये

तीन चौकड़ी कषाय सामान्य मति श्रुत ज्ञानी नही जान सकते।
यह केवलज्ञान गोचर विषय है।जीव कोनसे गुणस्थान में है यह हम नही जान सकते ।
हमे मात्र चरणानुयोग की अपेक्षा से 28 मूलगुण,32 अंतराय आदि का अखंड रूप से पालन हो रहा है तो हमे नमस्कार करना चाहिए।
रही बात काल लब्धि की कोई भी कार्य बिना काल लब्धि के नही होता।

दीक्षा में क्रिया संबधित में मुख्यतः चरणानुयोग का और वैराग्य आदि के भाव वह द्रव्यानुयोगविषय है।

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