धर्म पालने में हिंसा में कितनी सीमा रखी जानी चाहिए?


#1

प्रश्न : कहीं क्रियाएं हम मंदिर में करते हैं तो उनसे जीवो की हिंसा होती है जैसे नृत्य से , दीपक जलाने से, लेकिन वहां पर यह तर्क होता है कि इन सब से जिनेन्द्र भगवान के सामने भाव आदि अच्छे बनते हैं तो उनको गौण करना चाहिए, और ऐसा तर्क भी आता है कि ऐसे तो फिर मंदिर भी मत जाओ वहां भी तो चलने से हिंसा हैं, और किसी vehicle आदि से गए तो उसकी हिंसा, हिंसा तो हर चीज में हैं तो प्रश्न यह है कि इन चीजों को बलैंस कैसे करें, और अपने भावों को और जीव की हिंसा को quantify कौन करेगा, और यह कैसे निर्णय होगा कि कितनी हिंसा उचित है अपने भावों को बनाने के लिए और धर्म का पालन करने के लिए ??


#2

पंडित टोडरमल जी, मोक्षमार्गप्रकाशक, p. 190 -

  1. Perfectionism can also be an addiction. जिसके जिन पापों का सांसारिक कार्यों में त्याग नहीं हुआ है, वह धार्मिक कार्यों में - इसमें तो हिंसा होती है - यह कहकर बस छल द्वारा भाग जाना चाहता है | मंदिर जाने के लिए vehicle का प्रयोग करने में हिंसा तो होती है, लेकिन जो बाकी कार्यों में vehicles आदि का प्रयोग कर सकता है तो यह तो शुभ कार्य है, यहाँ क्यों नहीं ? धर्म के नाम पर हिंसा के पोषण का निषेध है, धर्म आराधना के लिए जो जिस भूमिका में है उसके उस उस प्रकार की हिंसा होगी ही । और भी अनेक उदाहरणों से समझा जा सकता है | यथा - यद्यपि क्रोध करना तो बुरा है ही, लेकिन जब बालक को school भेजने के लिए क्रोध किया जा सकता है तो पाठशाला भेजने के लिए भी करना चाहिए (वो बात अलग है कि किसी अन्य अपेक्षा से इस क्रोध को करुणा भी कह दिया जाए). इसीप्रकार, यद्यपि मंदिर निर्माण आदि कार्य में हिंसा होती है, तथापि ये कार्य गृहस्थों के लिए कहे है, और चूकि गृहस्थ अपने लिए घर बनाता ही है, तो मंदिर आदि कार्य मे होनेवाली हिंसा को गौण करना चाहिए ।

  2. अब यह तय कैसे करें कि कौन-सी हिंसा कथंचित् निषिद्ध (prohibited) है और कौन सी हिंसा सर्वथा निषिद्ध है ? - जिसमें रागादि हो तथा पोषण भी उसी का हो वह सर्वथा निषिद्ध तथा जिसमें रागादि तो हो किन्तु पोषण / प्रयोजन वीतरागता का हो वह कथंचित् निषिद्ध है । इसका निर्णय तो मुख्यतः द्रव्य-क्षेत्र-काल-भाव से ही होगा । यथा - दीपकादि के प्रयोग में हिंसा तो पहले भी थी और आज भी है, लेकिन आज प्रकाश आदि के लिए यदि अन्य साधन उपलब्ध है जिनमें हिंसा अल्प होती है (दीपक की अपेक्षा), तो दीपक के प्रयोग की आवश्यकता नहीं है ।


¹ पूज्यं जिनं त्वार्चयतोजनस्य, सावद्यलेशोबहुपुण्यराशौ। दोषायनालं कणिका विषस्य, न दूषिका शीतशिवाम्बुराशौ।। ५८।।

सामान्यार्थ - हे जिन ! आपकी पूजा करनेवालेको जो लेशमात्र पाप होता है वह बहुत भारी पुण्यराशिमें दोषके लिए समर्थ नहीं है । जैसे कि विषकी एक कणिका शीतल तथा कल्याणकारी जलसे भरे हुए समुद्रको दूषित नहीं कर सकती है ।
(बृहत् स्वयंभूस्तोत्र, श्री वासुपूज्य जिन स्तवन, श्लोक 3, p. 97)


#3

प्रश्न१: इसको उदहारण से और explain कीजिए,
प्रश्न२:पोषणता राग का हैं या वीतरागता का यह कैसे निर्णय होगा ???
प्रश्न३: “जिसमें रागादि हो” तो इसमें कैसा और कितना राग हो सकता है ???


#4

प्रथमानुयोग में बहुत कथायें ऐसी है जिनमें रागादि का वर्णन है, लेकिन प्रयोजन / पोषण वीतरागता का होने से वह जिनवाणी का अंश है |

पण्डित टोडरमल जी, मोक्षमार्गप्रकाशक, प्रथमानुयोग के व्याख्यान का विधान:

वज्रकरण राजाने सिंहोदर राजा को नमन नहीं किया, मुद्रिका में प्रतिमा रखी; सो बड़े-बड़े सम्यग्दृष्टि राजादिक को नमन करते हैं, उसमें दोष नहीं हैं; तथा मुद्रिका में प्रतिमा रखने में अविनय होती है, यथावत् विधि से ऐसी प्रतिमा नहीं होती, इसलिए इस कार्य में दोष है; परन्तु उसे ऐसा ज्ञान नहीं था, उसे तो धर्मानुराग से ‘मैं और को नमन नहीं करूँगा’ ऐसी बुद्धि हुई; इसलिए उसकी प्रशंसा की है | परन्तु इस छल से औरों को ऐसा कार्य करना योग्य नहीं है | (p. 274) (emphasis mine)

यहाँ जो अविनय है, वह दोष होने से राग का कथन हुआ | लेकिन इस कथा का प्रयोजन प्रतिमा की अविनय कैसे होती है, यह बताना नहीं है, अपितु धर्मानुराग बताना इष्ट है, अतः प्रथमानुयोग में उसकी प्रशंसा की है, साथ ही पण्डितजी ने सावधान भी कर दिया | और भी अनेक उदहारण है जिसके लिए पूर्ण प्रकरण मूलतः पठनीय है (pp. 271-75).


इसका निर्णय मुख्यतः अभिप्राय से होगा | और यह अभिप्राय अव्यक्त भी नहीं है | थोड़ा विचार करने पर स्पष्ट दिखने लगता है कि पोषण किस बात का हो रहा है | दूसरी बात, पूर्वापर विरोध नहीं होना चाहिए |


जिन रागादि से गृहीत-अगृहीत मिथ्यात्व, सप्त व्यसन, पाँच पाप एवं चार कषाय का पोषण हो वह सर्वथा निषिद्ध है |