महिलाओं का मासिक धर्म के समय मंदिर में प्रवेश वर्जित क्यों?

#1

स्त्रियों का मासिक धर्म के समय में मंदिर में प्रवेश वर्जित क्यों ?
आगम एवं तर्क दोनों अपेक्षित हैं।

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#2

एक महिला होने के नाते, जितना मुझे इसके पीछे का कारण समझ आ रहा है, में देना चाहूंगी।

एक महिला के मासिक धर्म के समय निरंतर रक्तस्त्राव होने के कारण, इसे अशुद्ध अवस्था मान कर, मंदिर आदि शुभ कार्यों में इनका प्रवेश वर्जित कहा गया है।

जिस तरह किसी व्यक्ति के चोट लगी हो और रक्त बह रहा हो, पट्टी आदि से बाहर आ रहा हो, तो उसे भी मंदिर में अंदर आना उचित नहीं है।

कुछ गलत लिखा हो तो कृपया सुधार करें।

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#5

हालाँकि जिन्हें धार्मिक श्रद्धा है उन्हें तो इस कारण से संतुष्ट किया जा सकता है लेकिन कुछ विकसित सोच वालों को ऐसे तर्क से समझाना थोड़ा कठिन लगता है।

मेरे यहाँ प्रश्न लिखने का कारण भी यूएस. में रहने वाली महिला का मुझसे ऐसा प्रश्न करना है, बहुत से तर्क देने का प्रयास मैंने भी किया है
जैसे अशुद्धि, शारीरिक बदलाव के साथ मानसिक बदलाव, कामुकता इत्यादि । इसके अलावा यदि कोई तर्क देना चाहे तो कृपया दें। साथ ही साथ आगम प्रमाण हों तो अधिक शोभनीय होगा।

(वे संतुष्ट हैं या असंतुष्ट इसकी जानकारी फिलहाल मुझे भी नहीं है।).

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#6

अनगार धर्मामृत में ऐसा आया है कि जिस महिला का मासिक धर्म चल रहा हो या फिर कोई पुरुष श्मशान से आया हो, उसके हाथ से आहार लेने को समान माना गया है, ये दोनों ही दायक दोष से युक्त होते हैं |
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त्रिलोकसार में ऐसा आया है की जो पुष्पवती (मासिक धर्म से युक्त) स्त्री का संसर्ग कर कुपात्र में दान देता है वह कुमनुष्य में उत्पन्न होता है |


ज्ञानानंद श्रावकाचार में रजस्वला स्त्री को चाण्डालनि के समान बताया है | जिसके स्पर्श मात्र से पापड़, मंगोड़ी लाल हो जाते हैं | मासिक धर्म के समय स्त्री को महा पाप का उदय होता है | उसकी स्पर्श की हुई सारी वस्तुएं नहीं लेने योग्य हैं | चौथे, पाँचवे अथवा छठे दिन स्नान कर शुद्ध वस्त्र पहन कर भगवान के दर्शन कर वह पवित्र होती है | जो मनुष्य इस छुआछूत को नहीं मानते, वे भी चाण्डाल के समान हैं |


कुछ लोग तर्क करेंगे की ये तो स्त्रियों के साथ अन्याय है | पर कर्म कभी किसी के साथ अन्याय नहीं करते | मायाचारी के फ़ल में ये स्त्री पर्याय मिली है | अगर ऐसे कर्म न किये होते तो ये पर्याय ही नहीं मिलती | ये तो प्रकृति का सबसे बड़ा न्याय है |

  • मासिक धर्म की मलिन दशा में अच्छे कार्य करने पर पुण्य बंध ना होकर पाप बंध ही होता है जिससे नीच गोत्र का बंध होता है।
  • यदि किसी स्त्री को घृणा करना हो तो उन मलिन भावों से करना जिसकी देन " मासिक धर्म की मलिनता" है | मलिन भावों में मूल है मलिन शरीर को अपना मानना और इसी का लक्ष्य करके राग-द्वेष -कषाय रूप प्रवर्तन करना। यदि वास्तव में किसी को मासिक धर्म की गंदी दशा अच्छी नहीं लगती हो तो वह स्वप्न में भी गंदे भाव नहीं करेगी ताकि इस गंदी दशा का अल्पकाल में अभाव हो क्योंकि कारण के अभाव में कार्य का अभाव होता ही है |
  • इसे छुआछूत कहकर छोड़ना चाहिए बल्कि पवित्र संस्कृति की देन जानकर मासिक धर्म संबंधी नियमों का पालन करके अपनी संस्कृति को पवित्र बनाने में सहयोगी बनना चाहिए और अपना जीवन शुद्ध बनाना चाहिए |

जब किसी वस्तु को रजस्वला स्त्री के स्पर्श करने से वो किसी और के स्पर्श अयोग्य हो जाती है, तो मासिक धर्म में जिनमंदिर आदि पवित्र स्थान पर जाने की बात तो आ ही नहीं सकती |
यदि किसी की होनहार भली होना होगी तो उसको यह भली बातें सच्ची और अच्छी लगेंगी और जीवन में पालन होंगी |

मासिक धर्म में क्या करना और क्या नहीं करना चाहिए इसके लिए मैंने कुछ समय पहले एक पोस्ट लिखी थी : https://jaindivya.com/2018/09/29/woman-special/

आभार: ब्र. साक्षी दीदी, अभाना

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जिनधर्म में स्त्रियों के साथ हुए तथा-कथित भेदभाव पर तर्क
#7

स्त्री और पुरुष में रज , वीर्य होता है। जिसके सद्भाव से शक्ति बड़ती है ; परंतु जिस अवस्था में रज , वीर्य का पतन होता है , उस समय शक्ति तो हीन होती ही है , साथ ही साथ अनन्त जीवों का घात भी होता है तथा वह अवस्था को अशुद्ध होती है , जिसमें हम अपने ही घर की किसी भी वस्तु को स्पर्श नहीं करते हैं

बहुत अल्प रज , वीर्य के पतन से जब अनन्त जीवों का घात और अशुद्धता की उत्पत्ति होती है , तब अत्यधिक मात्रा में रक्तपात होने से कितने जीवों का घात होता होगा ? अर्थात अनन्तानन्त जीवों का घात होता है तथा वह अवस्था भी पूर्ण रूप से अशुद्ध ही है।

अतः अहिंसा और शुद्धि के परम स्थान में हम ऐसी हिंसक और अशुद्ध दशा में कैसे प्रवेश कर सकते हैं ? अर्थात नहीं कर सकते हैं ; अतः मासिक धर्म के समय महिलाओं का मंदिर में प्रवेश वर्जित है ।

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#8

मुनि श्री प्रमाणसागर जी द्वारा समाधान

https://youtu.be/5moPUtXPMwQ

https://youtu.be/c3T4jjr7hM8

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#9

Aapki baat 100 taka sahi. Kyuki rajswala ke samay sam moorchan jeevo ki hatya bhi bhot hoti he.
Per wahi hatya male nd female ke arm side me bhi hoti he, kyuki waha bhi sam moorchan jeev he.
Please explain this. Kya purush ko bhi nishedh hona chahiye

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#10

हिन्दू धर्म के गुरु का कथन है।

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#11

Ji sadguru ne bilkul sahi kaha, per mera prashn abhi bhi wahi he.
Ki sammoorchhan jeev toh hamare dwara bhi maare jaate he.
Aur iss reeti se na srf ladies mandir jaane se ya bhjn nhi banane se chookhti he, per issi wajah se aur bhi bhot si taqleefo ka saamna krna padta he. Shayd chhote gaavo me toh bhot jyada. Paani ke liye pyasi tak rahna pad jata he, 3 4 ghante.
Please give me satisfactory ans.

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#12

प्रवचनसार की जयसेन आचार्य जी ने टीका करते समय ऋतुसमय में जीवोत्पत्ति का हेतु दिया , अतः रोग फैलाव का कारण बनता है।

Credit = PT. SACHINJI (MANGLAYATAN)

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#13

Kishan ji and sachin ji bhot bhot dhanyawaad apka.i understood this fact.
Iska mtlab unhe bhi, sootak jesa he palan krna chahiye.Aur purusho ko SAMMOORCHHAN jeev nhi hote.

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#14

यहां पर एक प्रश्न आता है कि
Mobile Tablet आदि में मूल सिद्धांत ग्रंथ हो तो उनका विनय किस तरह करे?

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