दीपावली कैसे मनाएं

“ चौथे काल के तीन वर्ष साढ़े आठ मास शेष रहने पर स्वाति नक्षत्र में कार्तिक अमावस्या के दिन प्रातः तीर्थंकर महावीर का निर्वाण होने से चारों निकाय के देवों द्वारा पावा नगरी में दीप जलाए गए थे। तभी से महावीर निर्वाण कल्याणक की स्मृति में कार्तिक अमावस्या की रात में भारत में दीप जलाए जाने लगे और दीपावली के नाम से एक उत्सव मनाया जाने लगा।”

                                                                                      हरिवंश पुराण - सर्ग ६६

इस उद्धरण से यह तो समझ आया कि यह पर्व महावीर निर्वाण कल्याणक का ही रुप है। जब भगवान का परम औदारिक शरीर जो सूर्य के समान दैदीप्यमान था, विलीन हो गया है तो सब तरफ अंधकार छा जाने से दीप प्रज्ज्वलित करने की आवश्यकता प्रतीत हुई।

इतिहास से चलकर आई इस घटना का वास्तविक स्वरूप भूलकर और जैनेत्तर धर्मों के विस्तृत रुप से प्रभावित होकर, लोग अब इसे दीपावली के त्यौहार की तरह ही मनाने लगे। हां, यह सही है कि हम मंदिर जाकर भगवान की पूजा करते हैं, निर्वाण कांड का पाठ करते हैं और लड्डू भी चड़ा देते हैं।

पर क्या इस पर्व की सार्थकता इतने में ही है कि अनन्त जीवों की हिंसा की परवाह न करते हुए भी निर्वाण लाडू चढ़ायें, १००८ दियों से भगवान की आरती करें। ज्ञान के अविनाशी, प्रचण्ड तेज रूप सूर्य, जो अहिंसा धर्म का उपदेश देकर गये, उन्हीं के सामने महा हिंसक दीप मालिकायें जलायें।

“ यह ज्ञान है कि अज्ञान कहो, तुमको भी दीप दिखा डाला”

देव- शास्त्र - गुरु पूजन, डाॅ हुकमचंद भारिल्ल ‌

नियमसार गाथा १७९ में कहा है -:

“ णवि दुक्खं णवि सुक्खं णवि पीडा णेव विज्जदे वाहा ।

णवि मरणं णवि जणणं तत्थेव य होइ णिव्वाणं।। “

अर्थात् - जहां दुःख नहीं है, सुख नहीं है, पीड़ा, बाधा, मरण, जन्म कुछ नहीं है वहीं निर्वाण है।

ऐसी निराकुल, सुखरुप दशा का भोग भगवान प्रति समय पर रहे हैं।

क्या हमें भी इच्छा है कि जैसी भगवान की अविनाशी, निराकुल आनंद रूप अवस्था प्रतिसमय है , वैसी ही अवस्था मुझे भी प्राप्त हो? क्या अंतरंग से संसार से भय लग रहा है और दुःख से मुक्ति चाहते हैं?

यदि हां, तो इस दीपावली भगवान की पूजा करते समय उनकी प्रतिमा में स्वयं को खोजने का प्रयत्न करें। क्या उपदेश केवल उनकी वाणी में या आगम में ही है? वह तो अपने सर्वांग से उपदेश दे रहे हैं, अपनी वीतरागी छवि से प्रभु यही तो बता रहे हैं कि “ जैसे मैं ज्ञानानंद स्वरुप हूं, वैसे ही तुम भी ज्ञान और सुख के भंडार हो। एक बार दुनिया से दृष्टि मोड़कर मेरी तरफ तो देखो, मैं तुम्हारा ही प्रतिरुप हूं।” इस तरह आप्त का सही स्वरूप जानकर उनका श्रद्धान करें।

आचार्य कुन्दकुन्द ने प्रवचनसार गाथा ८० में वर्णन किया

“ जो जाणदि अरहंतं, दव्वत्तगुणत्तपज्जयत्तेहिं।

सो जाणदि अप्पाणं, मोहो खलु जादि तस्स लयं।।”

उनकी वाणी रूप आगम जो आज हमारे महान पुण्य से हमें सहज ही उपलब्ध है, उसके स्वाध्याय बिना मोक्षमार्ग में कदम रखना भी दुरूह है।आचार्यकल्प पण्डित टोडरमल जी मोक्षमार्ग प्रकाशक के प्रथम अधिकार में आगमज्ञान को मोक्ष मार्ग में उपादेय कहते हुए लिखते हैं -

“ सो इस जीव का तो मुख्य कर्त्तव्य आगमज्ञान है। उसके होने से तत्वों का श्रद्धान होता है, तत्वों का श्रद्धान होने से सयंमभाव होता है, और उस आगम से आत्मज्ञान की भी प्राप्ति होती है; तब सहज ही मोक्ष की प्राप्ति होती है।

पुनश्च, धर्म के अनेक अंग हैं, उनमें एक ध्यान बिना उससे [ अर्थात् स्वाध्याय से] ऊंचा और धर्म का अंग नहीं है, इसलिए जिस- तिस प्रकार आगम- अभ्यास करना योग्य है।”

इस दीपावली आप्त प्रणीत शास्त्रों के आद्योपांत स्वाध्याय का नियम लें, उसमें लिखे प्रत्येक वाक्य के हार्द को समझने का प्रयत्न करें, साधर्मी व ज्ञानियों से चर्चा-वार्ता व शंका-समाधान करें, जितना हो सके चिन्तन में उपयोग लगावें। सच्ची रुचि हो तो स्वाध्याय का भाव सहज बने और जितना अधिक पढ़ना- समझना हो उतनी रूचि और बलवती होती जाये।

अज्ञानता में बिजली की लड़ियां लगाने का, नये कपड़े खरीदने का, मिठाईयां बांटने का, घर की साफ-सफाई में महीने पहले से लगे रहने का कार्य तो करते ही आ रहे हैं पर इनका फल विषय - कषाय के पोषण रुप अशुभ बंध के अलावा और क्या मिला? क्या इनसे अनादि के मिथ्यात्व का नाश हो सकता है? अरे! इनसे तो लौकिक अनुकूलता भी नहीं प्राप्त होगी।

जैन धर्म के पर्व केवल आत्मश्रद्धान और पवित्रता बढ़ाने वाले होते हैं। जिस दीपावली में मात्र अशुभ का ही बंध हो वह तो जैन पर्व ही नहीं माना जा सकता। धर्म अंतरंग परिणति है और अन्तर में आत्म आश्रय से ही उत्पन्न हो सकती है। स्वामी समन्तभद्र ने रत्नकरण्ड श्रावकाचार में धर्म का स्वरूप इस प्रकार कहा:

देशयामि समीचीनं धर्मं कर्मनिवर्हणम्।

संसारदुःखत: सत्वान् यो धरत्युत्तमे सुखे।। २ ।।

अर्थात् - जो प्राणियों को पंचपरिवर्तन रुप संसार के दुःखों से निकाल कर स्वर्ग के और मोक्ष के बाधारहित उत्तम सुखों को प्राप्त करा देता है,…जो कर्म बंधन को नष्ट करने वाला है ..।

अगर सच्चे, स्वाधीन, बाधा रहित सुख की अभिलाषा है तो हमें राग-द्वेष बढ़ाने वाले उपक्रमों से अपने मन को बुद्धि पूर्वक, दृढ़ता से हटाकर सच्चे देव-शास्त्र-गुरू के श्रद्धान में, सप्त तत्वों के सम्यक् निर्णय में, स्व-पर भेदविज्ञान में व अंततः आत्मश्रद्धान में लगाना/उत्पन्न करना ही एकमात्र उपाय है। ऐसी प्रतिज्ञापूर्वक अपने कल्याण के मार्ग में अग्रसर होना ही दीपावली मनाने की सही विधि है।

जो स्वयं को भगवान समान चैतन्य, अखण्ड, अनादि-अनंत तत्व जाने और उसी का अनुभव कर लेवे अथवा प्रयासरत हो, उसी के लिए दीवाली की सार्थकता है, उसने ही दीपावली मनाई।

  • संसार को अनित्य और दुःखरुप देखे और संसार, शरीर और भोगों से विरक्ति व धर्म में अनुराग रुप संवेग भावना को जगायें, तो दीपावली मनाई।

  • “ संसार में केवल दुःख है व मैं अनन्त सुख का सागर हूं” यह निश्चय करने का पर्व है दीपावली।

  • “ कोई मेरा इष्ट- अनिष्ट नहीं करता , सब परिणाम अपनी ही योग्यता से होते हैं” यह निर्णय करने का त्यौहार है दीपावली।

  • सर्व द्रव्य स्वतंत्र हैं - अगर मैं चाहूं तो कोई अन्य जीव वा कर्म वा काल मुझे आत्मानुभव करने में बाधक नहीं हो सकता - इस शंखनाद को आत्मोत्साह से करने का पर्व है दीपावली।

ज्ञान के अविनश्वर सूर्य रूप महावीर भगवान के समक्ष अपना स्वयं का स्वानुभव रुप दीप जलायें अथवा स्वानुभव की प्रतिज्ञा रूप लाडू चढ़ायें- ऐसे मनाएं दीपावली।