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तो ही समझायो सौ सौ बार, जिया ।
तो ही समझायो सौ सौ बार ॥
देख सुगुरु की परहित में रति ।
हित उपदेश सुनायो ॥
विषय भुजंग से यह दुःख पायो ।
पुनि तिन सों लिपटायो ॥
स्वपद विसार रच्यो पर पद में ।
मद रत ज्यों बौरायो ॥
तन धन स्वजन नहीं हैं तेरे ।
नाहक नेह लगायो ॥
क्यों न तजे भ्रम चाख समामृत ।
जो नित संत सुहायो ॥
अब हूँ समझ कठिन यह नर भव ।
जिन वृष बिना गमायो ॥
ते विलखे मणि डाल उदधि में ।
दौलत सो पछितायो ॥
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स्रोत: JinSwara ऑडियो संग्रह।