मानव अधर्मकी ओर जिस त्वरा और सरलतासे चल पड़ता है धर्मके पथपर चलनेमें उसे उतनी ही देर तथा कठिनाईका अनुभव होता है। वह जिस प्रकार धर्म-पथपर चलकर बार-बार फिसलता है, पापके पथपर चलकर उसे एक बार भी गिरनेका अवसर प्राप्त नहीं होता। पापके पथपर वह उसी वेगसे अग्रसर होता है, जिस प्रकार गिरिके उत्तुङ्ग शिखरसे गिरता हुआ निर्झर भूतलकी ओर बढ़ता है। परन्तु धर्मके पथ पर चलना उसे इस प्रकार कठिन प्रतीत होता है, जैसे हिमालयकी भयंकर चढ़ाई की जा रही हो ।
कलाकार पंडित दौलतरामकी आत्मा भी इसी कोटिकी है। उसे धर्म-मार्गपर चलानेके लिए सैकड़ों बार प्रयत्न किये जाते हैं फिर भी वह उसपर स्थिर नहीं रह पाती है। वह बार-बार फिसलती है और पाप-पथकी अपावन धारामें बह जाती है। कलाकारका मन अपनी आत्माकी इस प्रवृत्तिपर अत्यन्त खीजा हुआ है। वह एक बार फिर अपने मधुर संगीतके द्वारा इस आत्माको संबोधता है-“तोहि समझायौ सौ सौ बार, जिया तोहि समझायौ सौ सौ बार । देख सुगुरुकी पर-हितमें रति हित-उपदेश सुनायो सौ सौ बार । जिया तोहि समझायौ सौ सौ बार ।।” हे आत्मन्, तुझे सैकड़ों बार तो समझाया। हाँ, सैकड़ों बार–हितोपदेशी गुरुओंके कल्याणकारी उपदेशोंको भी तो अनेक बार सुनाया। पर तूने उनका क्या उपयोग किया ? आत्मन्, तुझे सैकड़ों बार तो समझाया। हाँ, सैकड़ों बार ।