तीर्थंकर कौन होते हैं?
जो धर्मतीर्थ का प्रवर्तन करें, वे तीर्थंकर हैं। “तीर्थ” का अर्थ है जिससे संसार सागर पार किया जाए। तीर्थंकर भगवान् स्वयं केवलज्ञान प्राप्त करके समवसरण में दिव्यध्वनि द्वारा मोक्षमार्ग का उपदेश देते हैं और चतुर्विध संघ (मुनि, आर्यिका, श्रावक, श्राविका) रूप तीर्थ की स्थापना करते हैं।
हर तीर्थंकर केवली (अरहन्त) होते हैं, पर हर केवली तीर्थंकर नहीं होते। तीर्थंकर बनने के लिए पूर्व भव में तीर्थंकर नाम कर्म (तीर्थंकर प्रकृति) का बन्ध आवश्यक है।
ग्रंथों के उद्धरण: तीर्थंकर का लक्षण
आचार्य नेमिचन्द्र सिद्धान्तचक्रवर्ती, त्रिलोकसार गाथा 686:
सयलभुवणेक्कणाहो तित्थयरो कोमुदीव कुदं वा। धवलेहिं चामरेहिं चउसट्ठिहिं विज्जमाणो सो ॥६८६॥
अर्थ: जो सकल लोक के एक अद्वितीय नाथ हैं, और जिन पर चाँदनी या कुन्द पुष्प के समान श्वेत चौंसठ चँवर ढुरते हैं, वे तीर्थंकर हैं।
समाधिशतक टीका, श्लोक 2:
तीर्थकृतः संसारोत्तरणहेतुभूतत्वात्तीर्थमिव तीर्थमागमः तत्कृतवतः।
अर्थ: संसार से पार होने का कारण होने से आगम तीर्थ के समान है, इसलिए आगम ही तीर्थ है, और उस आगम के कर्ता तीर्थंकर हैं।
भगवती आराधना, विजयोदया टीका, गाथा 302:
मार्गो रत्नत्रयात्मकः उच्यते तत्करणात्तीर्थकरो भवति।
अर्थ: रत्नत्रय स्वरूप मोक्षमार्ग को तीर्थ कहते हैं, उसका प्रवर्तन करने से वे तीर्थंकर होते हैं।
तीर्थंकर नाम कर्म का बन्ध: सोलह कारण भावनाएँ
तत्त्वार्थसूत्र (अध्याय 6) में आचार्य उमास्वामी कहते हैं:
दर्शनविशुद्धिर्विनयसम्पन्नता शीलव्रतेष्वनतीचारोऽभीक्ष्णज्ञानोपयोगसंवेगौ शक्तितस्त्यागतपसी साधुसमाधिर्वैयावृत्त्यकरणमर्हदाचार्यबहुश्रुतप्रवचनभक्तिरावश्यकापरिहाणिर्मार्गप्रभावना प्रवचनवत्सलत्वमिति तीर्थकरत्वस्य ॥२४॥
ये सोलह भावनाएँ हैं:
- दर्शनविशुद्धि
- विनयसम्पन्नता
- शील और व्रतों में अतिचार न लगाना
- अभीक्ष्ण ज्ञानोपयोग
- संवेग
- शक्ति अनुसार त्याग
- शक्ति अनुसार तप
- साधु समाधि
- वैयावृत्त्य करना
- अर्हद्भक्ति
- आचार्यभक्ति
- बहुश्रुतभक्ति
- प्रवचनभक्ति
- आवश्यकों में हानि न करना
- मार्गप्रभावना
- प्रवचनवात्सल्य
इनमें दर्शनविशुद्धि सबसे प्रधान है। उसके बिना शेष पन्द्रह भावनाएँ तीर्थंकर प्रकृति का कारण नहीं बनतीं। इसीलिए यह पहले रखी गई है।
ग्रंथों के उद्धरण: तीर्थंकर नामकर्म क्या है?
आर्हंत्यकारणं तीर्थकरत्वनाम। (सर्वार्थसिद्धि 8/11)
अर्थ: अरहन्त पद का कारण तीर्थंकर नामकर्म है।
जस्स कम्मस्स उदएण जीवस्स तिलोगपूजा होदि तं तित्थयरं णाम। (धवला, पुस्तक 6)
अर्थ: जिस कर्म के उदय से जीव की तीनों लोकों में पूजा होती है, वह तीर्थंकर नामकर्म है।
जस्स कम्ममुदएण जीवो पंचमहाकल्लाणाणि पाविदूण तित्थं दुवालसंगं कुणदि तं तित्थयरणामं। (धवला, पुस्तक 13)
अर्थ: जिस कर्म के उदय से जीव पाँच महाकल्याणकों को प्राप्त करके तीर्थ अर्थात् द्वादशांग की रचना करता है, वह तीर्थंकर नामकर्म है।
इसका बन्ध कहाँ और किसे होता है?
तत्थ मणुस्सगदीए चेव तित्थयरकम्मस्स बंधपारंभो होदि, ण अण्णत्थेत्ति। (धवला, पुस्तक 8)
अर्थ: तीर्थंकर कर्म के बन्ध का प्रारम्भ मनुष्य गति में ही होता है, अन्यत्र नहीं। धवलाकार कहते हैं कि इसके प्रारम्भ का सहकारी कारण केवलज्ञान से उपलक्षित जीव, अर्थात् केवली भगवान् हैं। गोम्मटसार कर्मकाण्ड (गाथा 93) के अनुसार यह बन्ध केवली या श्रुतकेवली के पादमूल में ही प्रारम्भ होता है।
तीर्थबंध असंयताद्यपूर्वकरणषष्ठभागांतसम्यग्दृष्टिष्वेव। (गोम्मटसार कर्मकाण्ड, जीवतत्त्वप्रदीपिका टीका, गाथा 92)
अर्थ: तीर्थंकर प्रकृति का बन्ध असंयत सम्यग्दृष्टि (चौथे गुणस्थान) से लेकर अपूर्वकरण (आठवें गुणस्थान) के छठे भाग तक, सम्यग्दृष्टि जीवों के ही होता है।
पारद्धतित्थयरबंधभवादो तदियभवे तित्थयरसंतकम्मियजीवाणं मोक्खगमणणियमादो। (धवला, पुस्तक 8)
अर्थ: जिस भव में तीर्थंकर प्रकृति का बन्ध प्रारम्भ किया, उससे तीसरे भव में तीर्थंकर प्रकृति की सत्ता वाले जीव का मोक्ष जाना नियम से होता है।
पंच कल्याणक
तीर्थंकर के जीवन की पाँच घटनाएँ कल्याणक कहलाती हैं, जिन्हें इन्द्र और देव उत्सव के रूप में मनाते हैं:
- गर्भ कल्याणक: माता के गर्भ में आना। माता सोलह स्वप्न देखती हैं, पन्द्रह मास तक रत्नवृष्टि होती है
- जन्म कल्याणक: जन्म होने पर सौधर्म इन्द्र सुमेरु पर्वत पर पाण्डुकशिला पर अभिषेक करता है
- तप कल्याणक: वैराग्य होकर दिगम्बर दीक्षा लेना
- ज्ञान कल्याणक: चार घातिया कर्मों के क्षय से केवलज्ञान प्रकट होना, समवसरण की रचना
- मोक्ष (निर्वाण) कल्याणक: सब कर्मों से मुक्त होकर सिद्ध होना
ग्रंथों के उद्धरण: गर्भ कल्याणक की रत्नवृष्टि
आचार्य जिनसेन, महापुराण (आदिपुराण) पर्व 12, श्लोक 96 और 97:
षण्मासानिति सापप्तत् पुण्ये नाभिनृपालये। स्वर्गावतरणाद् भर्त्तुः प्राक्तरां द्युम्नसंततिः ॥९६॥
पश्चाच्च नवमासेषु वसुधारा तदा मता। अहो महान् प्रभावोऽस्य तीर्थकृत्त्वस्य भाविनः ॥९७॥
अर्थ: भगवान् ऋषभदेव के स्वर्ग से अवतरण के छह महीने पहले से नाभिराज के पवित्र घर में रत्न और स्वर्ण की वर्षा हुई, और गर्भावतरण के पीछे भी नौ महीने तक वह वसुधारा बरसती रही। होने वाले तीर्थंकर का प्रभाव ऐसा ही आश्चर्यकारी होता है। (छह और नौ मिलाकर पन्द्रह मास की रत्नवृष्टि यहीं से है।)
कभी कभी तीन या दो कल्याणक भी
गोम्मटसार कर्मकाण्ड की जीवतत्त्वप्रदीपिका टीका (गाथा 546) में बताया है कि यदि चरम शरीरी जीव (विदेह क्षेत्र में) उसी भव में असंयत या देशसंयत अवस्था में तीर्थंकर प्रकृति का बन्ध प्रारम्भ करे, तो उसके तप आदि तीन ही कल्याणक होते हैं; और यदि प्रमत्त या अप्रमत्त अवस्था में करे, तो ज्ञान और निर्वाण, ये दो ही कल्याणक होते हैं।
आठ वर्ष की आयु में देशव्रत
स्वायुराद्यष्टवर्षेभ्यः सर्वेषां परतो भवेत्। उदिताष्टकषायाणां तीर्थेशां देशसंयमः ॥३५॥ (महापुराण, पर्व 53)
अर्थ: जिनके केवल प्रत्याख्यानावरण और संज्वलन, ये आठ कषाय ही उदय में रहते हैं, ऐसे सभी तीर्थंकरों के अपनी आयु के आठ वर्ष के बाद देशसंयम हो जाता है।
तीर्थंकर के 46 मूल गुण
34 अतिशय + 8 प्रातिहार्य + 4 अनन्त चतुष्टय = 46 मूल गुण।
जन्म के 10 अतिशय
- अत्यन्त सुन्दर रूप
- सुगन्धित शरीर
- पसीना रहित शरीर
- मल मूत्र रहित शरीर
- हित, मित, प्रिय वचन
- अतुल बल
- दूध के समान श्वेत रक्त
- शरीर में 1008 शुभ लक्षण
- समचतुरस्र संस्थान
- वज्रवृषभनाराच संहनन
तित्थयरा तप्पियरा हलहरचक्को य अद्धचक्की य। देवा य भूयभूमा आहारो णत्थि नीहारो ॥ (बोधपाहुड़ टीका, गाथा 32 पर उद्धृत)
अर्थ: तीर्थंकर, उनके माता पिता, बलदेव, चक्रवर्ती, अर्धचक्रवर्ती, देव और भोगभूमि के जीव, इनके आहार तो होता है पर नीहार (मल मूत्र) नहीं होता। वहीं टीका में यह भी कहा है: तीर्थकराणां स्मश्रुणी कूर्चश्च न भवति, शिरसि कुंतलास्तु भवंति। अर्थात् तीर्थंकरों के दाढ़ी मूँछ नहीं होती, सिर पर केश होते हैं।
केवलज्ञान के 10 अतिशय
- चारों ओर सौ सौ योजन तक सुभिक्ष
- आकाश में गमन
- चारों दिशाओं में मुख दिखना
- हिंसा का अभाव
- उपसर्ग का अभाव
- कवलाहार का अभाव
- सब विद्याओं का स्वामीपना
- नख और केश न बढ़ना
- नेत्रों की पलक न झपकना
- शरीर की छाया न पड़ना
देवकृत 14 अतिशय
- अर्धमागधी भाषा
- सब जीवों में मैत्री भाव
- दिशाओं का निर्मल होना
- आकाश का निर्मल होना
- सब ऋतुओं के फल फूल एक साथ आना
- पृथ्वी का दर्पण के समान निर्मल होना
- विहार में चरणों के नीचे स्वर्ण कमलों की रचना
- आकाश में जय जय शब्द
- मन्द सुगन्धित पवन
- सुगन्धित जल की वृष्टि
- भूमि का कण्टक रहित होना
- सब जीवों को आनन्द
- आगे आगे धर्मचक्र चलना
- अष्ट मंगल द्रव्य साथ रहना
8 प्रातिहार्य
- अशोक वृक्ष
- सिंहासन
- तीन छत्र
- भामण्डल
- दिव्यध्वनि
- पुष्पवृष्टि
- चौंसठ चँवर
- दुन्दुभि
4 अनन्त चतुष्टय
अनन्त ज्ञान, अनन्त दर्शन, अनन्त सुख, अनन्त वीर्य।
समवसरण
केवलज्ञान होने पर इन्द्र की आज्ञा से कुबेर समवसरण की रचना करता है। यह तीर्थंकर की धर्मसभा है। बीच में गन्धकुटी पर भगवान् सिंहासन से ऊपर अधर विराजमान रहते हैं और चारों ओर बारह सभाओं में मुनि, आर्यिका, श्रावक, श्राविका, देव, देवियाँ और तिर्यंच (पशु पक्षी) बैठकर उपदेश सुनते हैं। दिव्यध्वनि को हर जीव अपनी अपनी भाषा में समझता है, और गणधर उसे द्वादशांग रूप में गूँथते हैं।
ग्रंथों के उद्धरण: समवसरण
आचार्य यतिवृषभ, तिलोयपण्णत्ति, अधिकार 4:
ताहे सक्काणाए जिणाण सयलाण समवसरणाणिं। विक्किरियाए धणदो विरएदि विचित्तरूवेहिं ॥७१०॥
अर्थ: तब सौधर्म इन्द्र की आज्ञा से कुबेर विक्रिया द्वारा सब तीर्थंकरों के समवसरण की विचित्र रूप से रचना करता है।
मिच्छाइट्ठिअभव्वा तेसुमसण्णी ण होंति कइआइं। तह य अणज्झवसाया संदिद्धा विविहविवरीदा ॥९३२॥ (तिलोयपण्णत्ति 4/932)
अर्थ: समवसरण के बारह कोठों में मिथ्यादृष्टि, अभव्य और असंज्ञी जीव कभी नहीं होते, और न ही अनध्यवसाय, संशय या विविध विपरीतता वाले जीव होते हैं।
दिव्यध्वनि इच्छा से नहीं खिरती
आचार्य कुन्दकुन्द, प्रवचनसार गाथा 44:
ठाणणिसेज्जविहारा धम्मुवदेसो य णियदयो तेसिं। अरहंताणं काले मायाचारो व्व इत्थीणं ॥४४॥
अर्थ: अरहन्त भगवन्तों के खड़े रहना, बैठना, विहार और धर्मोपदेश उस समय स्वभाव से ही, बिना प्रयत्न और बिना इच्छा के होते हैं।
वर्तमान चौबीसी: 24 तीर्थंकर और उनके चिह्न
| क्रम | तीर्थंकर | चिह्न |
|---|---|---|
| 1 | ऋषभनाथ (आदिनाथ) | बैल |
| 2 | अजितनाथ | हाथी |
| 3 | सम्भवनाथ | घोड़ा |
| 4 | अभिनन्दननाथ | बन्दर |
| 5 | सुमतिनाथ | चकवा |
| 6 | पद्मप्रभ | लाल कमल |
| 7 | सुपार्श्वनाथ | स्वस्तिक |
| 8 | चन्द्रप्रभ | अर्धचन्द्र |
| 9 | पुष्पदन्त | मगर |
| 10 | शीतलनाथ | कल्पवृक्ष |
| 11 | श्रेयांसनाथ | गैंडा |
| 12 | वासुपूज्य | भैंसा |
| 13 | विमलनाथ | सूअर |
| 14 | अनन्तनाथ | सेही |
| 15 | धर्मनाथ | वज्रदण्ड |
| 16 | शान्तिनाथ | हिरण |
| 17 | कुन्थुनाथ | बकरा |
| 18 | अरनाथ | मछली |
| 19 | मल्लिनाथ | कलश |
| 20 | मुनिसुव्रतनाथ | कछुआ |
| 21 | नमिनाथ | नीलकमल |
| 22 | नेमिनाथ | शंख |
| 23 | पार्श्वनाथ | सर्प |
| 24 | महावीर (वर्धमान) | सिंह |
भरत और ऐरावत क्षेत्र में हर अवसर्पिणी और उत्सर्पिणी काल में चौबीस चौबीस तीर्थंकर होते हैं। विदेह क्षेत्र में तीर्थंकर सदा विद्यमान रहते हैं, जैसे वर्तमान में सीमन्धर स्वामी आदि बीस विहरमान तीर्थंकर।
प्रत्येक तीर्थंकर की पूरी जानकारी (जन्म नगरी, माता पिता, नक्षत्र, वंश, वर्ण, ऊँचाई, आयु, वैराग्य वृक्ष, निर्वाण स्थल, पूर्वभव): चौबीस तीर्थंकर: प्रत्येक की पूरी जानकारी
हुण्डावसर्पिणी काल की विशेषताएँ
तक्काले जायंते पढमजिणो पढमचक्की य ॥१६१७॥ (तिलोयपण्णत्ति 4/1617)
अर्थ: हुण्डावसर्पिणी काल में तीसरे काल में ही प्रथम तीर्थंकर और प्रथम चक्रवर्ती उत्पन्न हो जाते हैं।
सत्तमतेवीसंतिमतित्थयराणं च उवसग्गो ॥१६२०॥ (तिलोयपण्णत्ति, गाथा 1620)
अर्थ: हुण्डावसर्पिणी काल में सातवें (सुपार्श्वनाथ), तेईसवें (पार्श्वनाथ) और अन्तिम (महावीर) तीर्थंकर पर उपसर्ग भी होता है।
तीर्थंकर और सामान्य केवली में अन्तर
- ज्ञान में कोई अन्तर नहीं: दोनों का केवलज्ञान एक समान पूर्ण है
- तीर्थंकर प्रकृति: तीर्थंकर ने पूर्व भव में तीर्थंकर नाम कर्म बाँधा है, सामान्य केवली ने नहीं
- कल्याणक और अतिशय: पंच कल्याणक, 34 अतिशय और 8 प्रातिहार्य केवल तीर्थंकर के होते हैं
- समवसरण और तीर्थ प्रवर्तन: समवसरण की रचना और धर्मतीर्थ की स्थापना तीर्थंकर ही करते हैं
हम क्या सीखें?
तीर्थंकर भगवान् भी कभी हमारे जैसे संसारी जीव थे। उन्होंने सम्यग्दर्शन प्राप्त किया, सोलह कारण भावनाएँ भाईं और रत्नत्रय की साधना से परमात्मा बने। उनकी पूजा, भक्ति और गुणों का स्मरण हमें अपने ही आत्मस्वभाव की याद दिलाता है।
स्रोत:
- तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य उमास्वामी): अध्याय 6 सूत्र 24
- सर्वार्थसिद्धि (आचार्य पूज्यपाद): 8/11
- धवला टीका (आचार्य वीरसेन): पुस्तक 6, 8, 13
- गोम्मटसार कर्मकाण्ड: गाथा 93; जीवतत्त्वप्रदीपिका टीका गाथा 92, 546
- त्रिलोकसार (आचार्य नेमिचन्द्र सिद्धान्तचक्रवर्ती): गाथा 686
- तिलोयपण्णत्ति (आचार्य यतिवृषभ): अधिकार 4 गाथा 710, 932, 1617; गाथा 1620
- महापुराण / आदिपुराण (आचार्य जिनसेन): पर्व 12 श्लोक 96 और 97, पर्व 53 श्लोक 35
- प्रवचनसार (आचार्य कुन्दकुन्द): गाथा 44
- भगवती आराधना, विजयोदया टीका: गाथा 302
- समाधिशतक टीका: श्लोक 2
- बोधपाहुड़ टीका: गाथा 32
- मोक्षशास्त्र टीका (पं. परमेष्ठीदास न्यायतीर्थ)
उद्धरणों का पाठ जैनेन्द्र सिद्धान्त कोश (jainkosh.org) में दिए मूल पाठ से लिया गया है।
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