तीर्थंकर वर्धमान महावीर और उनकी शिक्षाएँ
-प्रो. वीरसागर जैन
तीर्थकर वर्धमान महावीर और उनकी शिक्षाएँ
वर्धमान महावीर जैनधर्म के २४वें तीर्थकर थे । कुछ लोग उन्हें जैनधर्म के संस्थापक या प्रवर्तक कहते हैं, किन्तु ऐसा कहना सत्य नहीं है, क्योंकि उनसे पहले भी जैनधर्म भलीभांति चल रहा था और उसमें २३ अन्य तीर्थंकर भी हो चुके थे । उन २३ तीर्थकरों में से प्रथम तीर्थकर ऋषभदेव का गुणगान तो दुनिया के अन्य धर्मों (धर्मग्रन्थों) में भी किसी-न-किसी रूप में उपलब्ध होता है। वेदों और पुराणों में भी ऋषभदेव का उल्लेख महायोगी, आत्मध्यानी आदि के रूप में अनेकों बार उपलब्ध होता है। भारत की प्राचीन सभ्यता के परिचायक मोहनजोदड़ो और सिन्धुघाटी के साक्ष्य भी ऋषभदेव की प्राचीनता का उद्घोष करते हैं, जैसा कि अनेक विद्वान् इतिहासकारों का निष्कर्ष है। खैर…, तीर्थकर ऋषभदेव का विषय बड़ा ही रोचक किन्तु एक अलग एवं विस्तृत विषय है, अतः यहाँ हम उसे रोकते हैं और अपने मुख्य विषय पर आते हैं।
ऋषभदेव के बाद और महावीर से पूर्व इस तीर्थंकर-पंरपरा में २२ तीर्थंकर और हो चुके हैं जिनके नाम इसप्रकार हैं- अजितनाथ, संभवनाथ, अभिनन्दन, सुमतिनाथ, पद्मप्रभ, सुपार्श्वनाथ, चन्द्रप्रभ, पुष्पदन्त, शीतलनाथ, श्रेयांस, वासुपूज्य, विमलनाथ, अनन्तनाथ, धर्मनाथ, शांतिनाथ, कुंथुनाथ, अरनाथ, मल्लिनाथ, मुनिसुव्रत, नमिनाथ, नेमिनाथ, पार्श्वनाथ।
जैन ग्रन्थों के अनुसार तो यह तीर्थंकर-परम्परा भी अनादिनिधन है। ऋषभदेव से पूर्व भी असंख्य तीर्थंकर हो चुके हैं और महावीर के बाद भी असंख्य तीर्थंकर होंगे, किन्तु ध्यान रखने की बात है कि एक युग (निश्चित कालखण्ड) में तो २४ ही तीर्थंकर होते हैं, और ऋषभदेव से महावीर पर्यन्त २४ तीर्थकर इस वर्तमान युग के तीर्थकर हैं। इनसे पहले होने वाले तीर्थकर इनसे पहले के युगों में हो चुके हैं और इनके बाद होनेवाले तीर्थकर इनके बाद के युगों में होंगे। इस वर्तमान युग के ऋषभदेव ही प्रथम तीर्थकर हैं और महावीर ही अन्तिम तीर्थकर हैं। जैन पुराणग्रन्थों में इन सभी तीर्थंकरों का विस्तृत जीवन-परिचय निबद्ध है। यदि थोड़े-बहुत अन्तरों को गौण कर दिया जाय तो इन सभी तीर्थंकरों का जीवनवृत्त प्रायः एक-सा होता है। जैनशास्त्रों में इन तीर्थकरों के जीवन की ५ प्रमुख घटनाओं का वर्णन विस्तारपूर्वक मिलता है जो सभी की प्रायः समान होती हैं। इनके नाम हैं- गर्भकल्याणक, जन्मकल्याणक, दीक्षाकल्याणक, ज्ञान कल्याणक, मोक्षकल्याणक। इनको ‘कल्याणक’ इसलिए कहते हैं, क्योंकि ये अनेकानेक जीवों का कल्याण करने में निमित्त बनती हैं। इनसे तीर्थंकरों का स्वयं का तो कल्याण होता ही है, दूसरे भी अनगिनत लोगों का इन शुभ घटनाओं के दर्शन-चिन्तन से कल्याण/परमहित होता है।
‘तीर्थंकर’ शब्द भी बड़ा ही सार्थक है। ‘तीर्थं करोतीति तीर्थकरः’ अर्थात् जो तीर्थ का निर्माण करे उसे तीर्थकर कहते हैं। ‘तीर्थ’ किसे कहते हैं? ‘तीर्थ’ का अर्थ यहाँ कोई सम्मेदशिखर, गिरनार आदि स्थानविशेष नहीं है। ‘तीर्थ’ का अर्थ यहाँ तिरने का साधन अर्थात् पुल (Fly Over) है। जिसप्रकार किसी नदी या सागर के पार जाना हो तो हम लोग उस पर एक पुल बना लेते हैं जिससे साधारण प्राणी भी (स्त्री, वृद्ध, शिशु आदि दुर्बल लोग भी) आसानी से उस पार जाने में समर्थ हो जाते हैं, उसीप्रकार यह संसार एक महासागर के समान है, हम सभी संसारी प्राणी इसमें बुरी तरह फंसे हुए हैं, इसमें से निकलकर उस पार पहुंचना बड़ा कठिन कार्य है, परन्तु उक्त तीर्थंकर पुरुषों ने हमें रत्नत्रय धर्म (सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र) का ऐसा सरल-सुगम उपाय बताया है कि हम उस पर चलकर आसानी से संसार-सागर से पार हो सकते हैं। अतः यह रत्नत्रय धर्म ही ‘तीर्थ’ कहलाता है और इस रत्नत्रय रूप धर्मतीर्थ का उपदेश देने के कारण ऋषभदेवादि को ‘तीर्थंकर’ कहा जाता है।
जैन-तीर्थंकर-परम्परा के सम्बन्ध में एक और अत्यन्त महत्त्वपूर्ण बात ध्यान देने योग्य यह है कि तीर्थंकर जन्मते नहीं, बनते हैं। जन्मते समय वे सब हम-आप जैसे ही मनुष्य (बालक) होते हैं, जो अपने पूर्वजन्मों में भी अनेक योनियों में जन्म धारण करते हुए संसार-परिभ्रमण करते हुए आये होते हैं। ऐसा नहीं है कि वे पहले भगवान् थे और अब तीर्थंकर के रूप में अवतरित हुए हैं।
यदि कोई कहे कि एक भगवान् ही जगत् के कल्याण हेतु इन २४ तीर्थंकरों के रूप में अवतार लेते हैं तो यह ठीक नहीं है। इस युग के सभी २४ तीर्थंकर पृथक्-पृथक् स्वतन्त्र-स्वतन्त्र २४ जीव/आत्माएँ हैं और इन सभी ने मनुष्य रूप में जन्म लेने के बाद अपने प्रबल पुरुषार्थ के द्वारा (संयम-तपादि रूप धर्मध्यान के द्वारा/सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र की आराधना के द्वारा) आत्मा के मोह-राग-द्वेष रूपी सम्पूर्ण मल को नष्ट कर दिया और वीतरागता-सर्वज्ञता प्रकट कर ली। इसके बाद उन्होंने दूसरों को भी आत्म-शुद्धि का यही मार्ग बतलाया, जिससे अन्य भी अनेक लोग उस मार्ग पर चलकर वीतरागी-सर्वज्ञ बन गये। इस प्रकार वे स्वयं भी संसार-सागर से तिर गये और उन्होंने दूसरों को भी संसार-सागर से तिरने का मार्ग बतलाया, अतएव उनको ‘तीर्थंकर’ कहा जाता है। जैन मान्यता के अनुसार जो जीव एक बार पूर्ण शुद्ध हो जाता है, वह पुनः कभी भी जन्म धारण कर अशुद्ध नहीं होता। जिस प्रकार अशुद्ध स्वर्णपाषाण पूर्ण शुद्ध स्वर्ण हो जाने के बाद फिर से अशुद्ध स्वर्णपाषाण नहीं बन सकता, दूध से घी बन जाने के बाद घी को पुनः दूध में नहीं बदला जा सकता, उसी प्रकार जो आत्मा एक बार पूर्ण शुद्ध (समस्त रागादि रहित) हो जाता है, वह पुनः कभी अशुद्ध नहीं होता, जन्म-मरण धारण नहीं करता।
भगवान् महावीर इसी अनादि-निधन तीर्थंकर-परम्परा के अन्तर्गत होनेवाले इस युग के २४ वें अथवा अन्तिम तीर्थंकर थे। उनकी आत्मसाधना के अवलोकनार्थ हमें उनके कतिपय पूर्वजन्मों को जानना जरूरी है-
अनेकानेक जन्मों से पूर्व अपने एक पूर्वजन्म में वे एक भीलराज थे जिसका नाम ‘पुरुरवा’ था। एक दिन वह पुरुरवा अपनी पत्नी के साथ वन में शिकार खोज रहा था। उसने भ्रम से एक ध्यानस्थ मुनिराज को मृग समझ लिया और वह धनुषबाण से उनका शिकार करने ही वाला था कि उसकी पत्नी ने उसे रोक दिया- ‘रुको, ये कोई मृग नहीं, अपितु वनदेवता प्रतीत होते हैं।’ दोनों पति-पत्नी मुनिराज के पास गये, उन्हें प्रणाम किया, उनका आशीर्वाद लिया और उनसे धर्म भी सुना। धर्म सुनकर भील ने मुनिराज की प्रेरणा एवं साक्षी से काकमांस का आजीवन त्याग कर दिया। उसके भाव बहुत अच्छे हो गये। उसने जीवनपर्यन्त अच्छे भावों से इस व्रत का निर्वाह किया। फलस्वरूप वह स्वर्ग में देव हुआ।
इसके बाद वह इस युग के प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव का पुत्र मारीचि हुआ। यहाँ उसने इतना अच्छा अवसर पाकर भी अज्ञान एवं कषायों के वश सच्चे धर्म-दर्शन का विरोध किया एवं मिथ्या धर्म-दर्शन का प्रचार किया। फलस्वरूप वह आगामी अनेकानेक जन्मों तक चतुर्गति की विविध योनियों में परिभ्रमण करते हुए अनन्त दुःख उठाता रहा।
इसी क्रम में एक बार वह वन में क्रूर सिंह हुआ। एक दिन वह सिंह एक मृग को मारकर खा रहा था कि उसे आकाशमार्ग से विहार करते हुए दो मुनिराजों ने देखा। वे उसकी भली होनहार जानकर नीचे उतरे। अपने समक्ष निर्भय एवं शांतमुद्राधारी इन मुनिराजों को देखकर सिंह आश्चर्यचकित रह गया। मुनिराज ने उसे अमृतोपम वचनों से समझाया- हे मृगराज ! हिंसादि पापों को छोड़ो और आत्मज्ञान करो, तुम तो आगामी दसवें जन्म में तीर्थंकर होनेवाले हो, इत्यादि।
मुनिराज के उपदेश से सिंह प्रतिबुद्ध हो गया। उसे आत्मज्ञान हो गया। उसने सम्यग्दर्शन की प्राप्ति कर ली। उसने हिंसा करना भी छोड़ दिया और अपना शेष सम्पूर्ण जीवन धर्माराधनापूर्वक व्यतीत किया। यह महावीर के जीवनक्रम का अत्यंत महत्त्वपूर्ण सोपान है। उसकी आत्मसाधना सही अर्थों में यहीं से प्रारम्भ होती है। जैनपरम्परा में इस घटना को बड़े ही महत्त्व से यत्र-तत्र वर्णित/चित्रित किया गया है।
यह घटना एक साधारण मनुष्य को भी यह विश्वास दिलाती है कि जब एक हिंसक पशु भी पुरुषार्थ कर परमात्मा बन सकता है तो मैं नर हूँ, नारायण क्यों नहीं बन सकता? इसके बाद इस जीव ने क्रमशः निम्नलिखित ९ जन्म और धारण किये-
१. सौधर्म नामक प्रथम स्वर्ग में देव।
२. राजा कनकोज्ज्वल, जिसने मुनि होकर समाधिमरण किया।
३. लान्तव नामक ७वें स्वर्ग में देव।
४. राजा हरिषेण, जिसने मुनि होकर समाधिमरण किया।
५. महाशुक्र नामक ११वें स्वर्ग में देव।
६. प्रियमित्र चक्रवर्ती जो १००० राजाओं के साथ मुनि हो गया।
७. सहस्रार नामक १४वें स्वर्ग में देव।
८. राजा नन्द जिसने मुनि होकर तीर्थकर प्रकृति का बन्ध किया।
९. अच्युत नामक १६वें स्वर्ग में देव।
इसके बाद दसवें जन्म में आज से लगभग २६०० वर्ष पहले चैत्र कृष्णा १३ को वह भारत देश के बिहार राज्य के वैशाली जनपद के विदेह कुण्डग्राम में राजा सिद्धार्थ और रानी त्रिशला का पुत्र वर्धमान हुआ, जो बचपन से ही अत्यन्त धीर वीर गम्भीर था और विषम से विषम (समस्या) स्थिति का भी शांत एवं अविचल रहकर सुन्दर समाधान कर लेता था। जीवन में आगे अलग-अलग कारणों से इनके पाँच नाम प्रसिद्ध हुये- १. वर्धमान, २. सन्मति, ३. वीर, ४. अतिवीर, ५. महावीर। उन कारणों की चर्चा यहाँ विस्तार-भय से नहीं की जा रही है।
वैशाली एक अत्यन्त समृद्ध राज्य था, जहाँ प्रजातान्त्रिक सुन्दर शासन व्यवस्था के प्राचीन प्रमाण उपलब्ध होते हैं। अनगिनत विद्वान् इतिहासकारों ने वैशाली के गीत मुक्तकण्ठ से गाये हैं, परन्तु यहाँ विस्तारभय से उसकी भी चर्चा छोड़ रहे हैं। विशेष जिज्ञासुओं को वैशाली से प्रकाशित वैशाली अभिनन्दन ग्रन्थ ‘Homage to Vaishali’ का अध्ययन करना चाहिए।
युवा होने पर भी, और इतने बड़े राजघराने में उत्पन्न होकर भी वर्धमान ने बड़ा राजा बनने का स्वप्न नहीं देखा। शस्त्रों के बल पर दूसरों को झुकाकर अपने अधीन बनाना और अपने राज्य का विस्तार करते रहना उनकी दृष्टि में कोई श्रेष्ठ कार्य नहीं था। वे तो अपनी आत्मा के मोह-राग-द्वेष रूपी शत्रुओं पर विजय प्राप्त करना चाहते थे और इसी को सच्ची वीरता समझते थे। दूसरों पर अनुशासन करनेवाले लोक में अनेक मिलेंगे, पर वर्धमान तो आत्मानुशासन के पक्षधर थे। यही कारण है कि वे इतने राज्य-वैभव के बीच भी जल में कमल की भाँति निर्लेप रहकर सदैव तत्त्वचिन्तन में लीन रहते थे। उनकी वैराग्य प्रकृति से उनके सभी परिजन-पुरजन परिचित थे। और मोह के कारण कुछ चिन्तित भी थे, अतः एक बार उनके माता-पिता ने तत्कालीन सुविख्यात गायक सोमदत्त की शृंगार-संगीत-सभा आयोजित की, ताकि वर्धमान सांसारिक भोगों की ओर झुकें। किन्तु यह प्रयास भी निष्फल ही रहा और राजकुमार वर्धमान अपनी ३० वर्षीय पूर्ण यौवनावस्था में सम्पूर्ण राज्य-वैभव छोड़कर निर्ग्रन्थ मुनि हो गये।
राजकुमार वर्धमान के विवाह के सम्बन्ध में दो मत पाये जाते हैं। श्वेताम्बर कहते हैं कि उनका विवाह राजकुमारी यशोदा के साथ हुआ था और दिगम्बर कहते हैं कि उनका विवाह ही नहीं हुआ था। आचार्य जिनसेन (८वीं शती) ‘हरिवंशपुराण’ (६६/९) में लिखते हैं कि कलिंग देश का राजा जितशत्रु अपनी सुपुत्री यशोदा का विवाह प्रस्ताव लेकर वैशाली आया था। उसकी तीव्र अभिलाषा भी थी कि राजकुमार वर्धमान के साथ यशोदा का विवाह हो। राजा सिद्धार्थ और त्रिशला की भी ऐसी इच्छा हुई थी, किन्तु राजकुमार वर्धमान के निर्णय के आगे किसी की कुछ न चल सकी और उन्होंने विवाह नहीं किया, अपितु मुनिदीक्षा ग्रहण कर ली।
मुनि होने के बाद वे निरन्तर आत्मध्यान में लीन रहने का प्रयत्न करने लगे। अनेक उपसर्गों और परिषहों पर किंचित् भी ध्यान न देते हुए, उनसे अविचलित रहते हुए उन्होंने अपना सारा ध्यान आत्मशुद्धि की ओर ही लगाये रखा। उनका एक ही लक्ष्य था- अपने मोह-राग-द्वेष का पूर्ण नाश। आखिरकार १२ वर्षों की कठोर तपस्या के उपरान्त वे पूर्ण वीतरागी हो गये और साथ ही पूर्णज्ञानी (सर्वज्ञ) भी। अब उन्हें अरिहंत, जिन, जिनेन्द्र, तीर्थंकर, भगवान्, केवलज्ञानी कहा जाने लगा।
इसके बाद यद्यपि उन्होंने ३० वर्ष तक विहार करते हुए धर्म प्रवर्तन किया था अर्थात् भव्य जीवों को धर्म का उपदेश दिया था और उसके बाद ही (अर्थात् ७२ वर्ष की उम्र में) निर्वाण या मोक्ष को प्राप्त किया था; परन्तु एक अपेक्षा से कहा जा सकता है कि उनकी आत्मसाधना यहाँ आकर पूर्ण हो गई, क्योंकि उनके मोह-राग-द्वेषादि सर्व विकार नष्ट हो गये थे और वे पूर्णतया शुद्ध-बुद्ध हो चुके थे। आत्मशुद्धि के जिस कार्य का प्रारम्भ उन्होंने सिंह के जन्म में किया था, वह अब उनके वीतराग-सर्वज्ञ अरिहंत बनते ही सम्पूर्ण हो गया। अब तो मात्र आयु आदि कर्मों के कारण शरीरादि की स्थिति शेष थी और भव्यजीवों के भाग्यवश उनके सहज प्रवचन चल रहे थे। भगवान् महावीर का विहार एवं उपदेश अनिच्छापूर्वक था और सूर्य की भाँति लोगों के अज्ञान-अंधकार को दूर कर रहा था। जैन ग्रन्थों के अनुसार उनका विहार काशी, कश्मीर, कुरू, मगध, कौशल आदि अनेक स्थानों पर हुआ। बिहार का तो नाम ही ‘बिहार’ इसीलिए पड़ा कहते हैं क्योंकि वहाँ भगवान् महावीर का बहुत अधिक विहार हुआ। आज भी वहाँ के अनेक नगरों के नाम उनकी स्मृति स्वरूप रखे गये हैं- वीरभूमि, वीरनगर, सिंहभूमि, वर्धमान आदि।
कार्तिक कृष्णा अमावस्या को उन्हें पावापुर (बिहार, भारतवर्ष) से निर्वाण/मोक्ष की प्राप्ति हुई। वे लोक के अग्रभाग में अनन्तचतुष्टय (अनन्तदर्शन, अनन्तज्ञान, अनन्तसुख और अनन्त वीर्य) सहित विराजमान हो गये और अनन्तानन्त काल तक ऐसे ही शुद्ध-बुद्ध रहेंगे, कभी भी अशुद्ध नहीं होंगे, पुनः संसार में जन्म धारण नहीं करेंगे। वे वहाँ सम्पूर्ण जगत् के मात्र ज्ञाता-द्रष्टा रहते हैं किसी भी पदार्थ के कर्ता-धर्ता-हर्ता नहीं बनते। यहाँ तक कि वे किसी एक भी पदार्थ से किंचित् राग-द्वेष भी नहीं करते। वे तो सदा कृतकृत्य एवं परमसुखी अवस्था में स्थित रहते हैं।
इस प्रकार हम देखते हैं कि भगवान् महावीर का जीवन आत्मोत्कर्ष की एक सतत प्रक्रिया है जो पिछले अनेक जन्मों से चल रही थी और इस जन्म में पूर्ण हुई। हम आप में से भी कोई भी भव्यजीव इस प्रक्रिया को अपनाकर अपने राग-द्वेषों का पूर्ण अभावकर पूर्ण वीतरागता एवं सर्वज्ञता प्राप्त कर सकता है।
अब हम कुछ चर्चा भगवान् महावीर की शिक्षाओं के बारे में करना चाहते हैं। भगवान् महावीर की शिक्षाओं को जानने से पूर्व एक महत्त्वपूर्ण बात यह अवश्य ध्यान में रखनी चाहिए कि उन्होंने अलग से किसी नए धर्म की रचना या स्थापना नहीं की, अपितु उसका प्रवर्तन अर्थात् प्रतिपादन मात्र किया। क्योंकि धर्म तो वस्तु का स्वभाव है, उसकी रचना या स्थापना किसी के भी द्वारा नहीं की जा सकी, मात्र उसे जाना या समझा जा सकता है। जो जीव उसे यथार्थ जानता है वह सुखी होता है और जो उसे विपरीत जानता है वह दुःखी होता है।
भगवान् महावीर ही क्या, पूर्वकालीन भी किसी तीर्थंकर ने धर्म की स्थापना नहीं की, ऋषभदेव ने भी नहीं, अपितु मात्र प्रतिपादन किया। सभी तीर्थंकर धर्म का मात्र उपदेश देते हैं, उसका निर्माण नहीं करते। धर्म तो वस्तु का स्वभाव है जो अनादिनिधन अकृत्रिम होता है। जो जीव उस वस्तुस्वभावरूप धर्म को जानते हैं, मानते हैं और तदनुकूल प्रवृत्ति करते हैं, वे धर्मात्मा हैं और जो उसे नहीं जानते-मानते एवं तदनुकूल प्रवृत्ति नहीं करते, तद्विपरीत प्रवृत्ति करते हैं, वे अधर्मात्मा हैं।
तीर्थकर महावीर ने भी यही किया। स्वयं वस्तुस्वभाव को जाना, माना और तदनुकूल प्रवृत्ति की, फलतः वे मोह-राग-द्वेषादि सर्व विकारों से रहित होकर पूर्ण वीतरागी एवं सर्वज्ञ बन गये, परमसुखी हो गये। इसके बाद उन्होंने औरों को भी ऐसा ही करने की शिक्षा दी, अपनी ओर से कोई नया धर्म नहीं चलाया। सभी तीर्थंकर ऐसा ही करते आये हैं। यही जैनदर्शन है और इसीलिए जैनदर्शन अत्यन्त वैज्ञानिक दर्शन माना जाता है, क्योंकि इसमें किसी व्यक्ति विशेष, जाति विशेष, सम्प्रदाय विशेष या ग्रन्थ विशेष को महत्त्व नहीं दिया जाता, अपितु वस्तु स्वभाव को ही महत्त्व दिया जाता है।
इस प्रकार एक अपेक्षा से सम्पूर्ण जैनदर्शन या जिनागम ही भगवान् महावीर का उपदेश कहा जा सकता है, जिसमें द्वादश अंगों में समाहित हजारों विषय सम्मिलित हैं किन्तु यहाँ इतना अवकाश नहीं है, अतः कतिपय प्रमुख (आधारभूत) सिद्धान्तों की ही संक्षिप्त चर्चा करते हैं, विशेष जिज्ञासुओं को अधिकाधिक आगम-ग्रन्थों का अध्ययन करना चाहिए।
भगवान् महावीर की सम्पूर्ण शिक्षाओं का सार इस प्रकार भी कहा जा सकता है कि १. आचार में अहिंसा २. विचार में अनेकान्त ३. वाणी में स्याद्वाद ४. जीवन में अपरिग्रह। अतः हम यहाँ इन ४ सिद्धान्तों की ही संक्षिप्त चर्चा करते हैं। यद्यपि ये चारों ही सिद्धान्त अत्यधिक गूढ़ गम्भीर हैं और पर्याप्त समय एवं स्थान की अपेक्षा रखते हैं, जो यहाँ नहीं है तथापि कुछ प्रयत्न किया जाता है।
१.अहिंसा
‘अहिंसा’ निषेधपरक शब्द है, अतः उसे समझने के लिए हमें सर्वप्रथम हिंसा को समझना होगा। हिंसा की सामान्य परिभाषा है- ‘प्रमत्तयोगात् प्राणव्यपरोपणं हिंसा।’ (तत्त्वार्थसूत्र, ६/१३) अर्थात् प्रमाद के वशीभूत होकर किसी भी जीव को मारना हिंसा है। किन्तु हिंसा-अहिंसा की एक और बड़ी सूक्ष्म परिभाषा यह मिलती है कि आत्मा में रागादि विकारों की उत्पत्ति ही हिंसा है और रागादि विकारों की उत्पत्ति न होना ही अहिंसा है।
दरअसल, भगवान् महावीर के अनुसार इस जगत् में कोई भी चेतनाचेतन पदार्थ अच्छा- बुरा (इष्ट-अनिष्ट) नहीं है, उसे अच्छा-बुरा मानना ही हिंसा का वास्तविक मूल कारण है। जिस प्रकार किसी प्राणी के वधरूप हिंसा का मूल द्वेष है, उसी प्रकार द्वेषरूप हिंसा का भी मूल वस्तुतः राग है, क्योंकि द्वेष का जन्म रागपूर्वक ही होता है। यह राग ही असली आग है।
हिंसा दो प्रकार की होती है- द्रव्यहिंसा और भावहिंसा। किसी जीव को मारना, सताना, कटु वचन कहना आदि द्रव्यहिंसा है और मारने-सताने का भाव करना भावहिंसा है। द्रव्यहिंसा भावहिंसापूर्वक ही होती है, किन्तु भावहिंसा द्रव्यहिंसा रूप में परिणत हो ही- यह अनिवार्य नहीं है, अतः भावहिंसा को प्रधान जानकर उससे बचने का पुरुषार्थ करना चाहिए।
भावहिंसा और द्रव्यहिंसा को क्रमशः निश्चयहिंसा और व्यवहारहिंसा भी कहा जाता है।
हिंसा के चार प्रकार भी समझाये गये हैं- १. संकल्पी हिंसा, २. विरोधी हिंसा, ३. उद्योगी हिंसा, ४. आरम्भी हिंसा।
किसी निर्दोष प्राणी को बिना ही प्रयोजन के जानबूझकर मारना-सताना संकल्पी हिंसा है। अपने को दुःख पहुँचानेवाले प्राणी को अपनी रक्षा के हेतु मारना विरोधी हिंसा है। व्यापारादि कार्यों में होनेवाली हिंसा उद्योगी हिंसा है और स्नान-भोजनादि गृहकार्यों में होनेवाली हिंसा आरम्भी हिंसा है। इनमें से संकल्पी हिंसा सर्वाधिक पापमूला है, क्योंकि उसमें बिना ही प्रयोजन निर्दोष प्राणी को मारा-सताया जाता है, अतः सामान्य श्रावक भी सर्वप्रथम संकल्पी हिंसा का त्याग करता है। श्रावक होने की यह अनिवार्य शर्त भी है। एक सामान्य श्रावक यद्यपि अपनी क्षमतानुसार विरोधी, उद्योगी और आरम्भी हिंसा से भी बहुत बचने की कोशिश करता है, किन्तु उनका अस्तित्व उसके जीवन में पाया ही जाता है। यही कारण है कि एक चींटी को भी नहीं मारनेवाला श्रावक एक बड़ा सैनिक या सेनापति भी हो सकता है और युद्धभूमि में अनगिनत लोगों को मार भी सकता है।
हिंसा की तीव्रता-मंदता हिंसक के आंतरिक भावों पर निर्भर करती है, जिनका हम केवल बाह्य घटना के आधार पर निर्णय नहीं कर सकते। तथा जीव के आंतरिक भावों की स्थिति को सूक्ष्मरूप से समझ पाना बड़ा कठिन है। अतः कई बार ऐसी विचित्रता भी होती है कि हिंसा कोई और करता है, फल किसी और को मिलता है; हिंसा एक करता है, फल अनेकों को मिलता है; हिंसा अनेक करते हैं, फल एक को मिलता है; कोई हिंसा करता है फिर भी उसे हिंसा का फल नहीं मिलता, कोई हिंसा नहीं करता फिर भी उसे हिंसा का फल मिलता है, कोई थोड़ी हिंसा करता है पर बहुत फल मिलता है और कोई बहुत हिंसा करता है पर अल्प फल मिलता है। यह सब भावों का विचित्र खेल है। यही कारण है कि जैनाचार्यों ने हिंसा-अहिंसा को भावों के आधार पर समझाया है।
२.अनेकान्त
अनेकान्त भगवान् महावीर का एक अत्यन्त प्रमुख सिद्धान्त है। इतना प्रमुख कि आचार्य अमृतचन्द्र ने इसे उनके सम्पूर्ण दर्शन का प्राण (जीव/आत्मा) कहा है। इस सिद्धान्त के अनुसार प्रत्येक वस्तु (पदार्थ) अनेकान्तात्मक है, एक भी वस्तु इसका अपवाद नहीं है। अनेकान्तात्मक का अर्थ है- अनेक धर्मों (आयामों/पक्षों/विशेषताओं) वाली है। और आश्चर्य की बात यह भी है कि वे अनेक धर्म परस्पर विरुद्ध भी प्रतिभासित होते हैं। यथा,एक ही वस्तु एक ही समय में नित्य भी है और अनित्य भी है, एक भी है और अनेक भी, भेद भी है और अभेद भी, सामान्य भी है और विशेष भी, इत्यादि। इसे हम एक उदाहरण द्वारा इस प्रकार सरलता से समझ सकते हैं-
एक सामान्य पुरुष है। वह पिता की अपेक्षा पुत्र है और पुत्र की अपेक्षा पिता। चाचा की अपेक्षा भतीजा हैं और भतीजे की अपेक्षा चाचा। मामा की अपेक्षा भानजा है और भानजे की अपेक्षा मामा। बड़े की अपेक्षा छोटा है और छोटे की अपेक्षा बड़ा। मोटे की अपेक्षा पतला है और पतले की अपेक्षा मोटा। लम्बे की अपेक्षा ठिगना है और ठिगने की अपेक्षा लम्बा। काले की अपेक्षा गोरा है और गोरे की अपेक्षा काला। दूर की अपेक्षा पास है, पास की अपेक्षा दूर। धनी की अपेक्षा निर्धन और निर्धन की अपेक्षा धनी। विद्वान् की अपेक्षा मूर्ख, मूर्ख की अपेक्षा ज्ञानी।
इस प्रकार एक ही पुरुष पिता भी है और पुत्र भी, चाचा भी है और भतीजा भी है, मामा भी है और भानजा भी है, बड़ा भी है और छोटा भी, मोटा भी है और पतला भी है, लम्बा भी है और ठिगना भी, काला भी है और गोरा भी, दूर भी है पास भी है, धनी भी है निर्धन भी है, विद्वान् भी और मूर्ख भी है। इसमें कोई कालभेद भी नहीं।
उसी प्रकार एक ही वस्तु एक ही समय में अपेक्षाभेद से नित्य भी होती है और अनित्य भो, एक भी और अनेक भी, इत्यादि। इसमें कोई विरोध नहीं है, मात्र विरोध प्रतीत होता है।
३.स्याद्वाद
ऊपर कहा जा चुका है कि जगत् की प्रत्येक वस्तु अनन्तधर्मात्मक है, उसमें परस्पर विरुद्ध प्रतीत होनेवाले अनन्त धर्म निवास करते हैं। इस स्थिति में उनको वाणी से कहना बड़ा ही कठिन कार्य हो जाता है। कठिन ही क्या, असंभव ही है यदि कोई एक साथ सम्पूर्ण धर्मों का कथन करना चाहे तो। अतएव इस ‘स्याद्वाद’ सिद्धान्त का आविष्कार हुआ है। हम कह सकते हैं कि अनेकान्तात्मक वस्तुस्वरूप को प्रतिपादित करने की समीचीन कथनशैली का नाम ही स्याद्वाद है।
इसीलिए अनेकान्त और स्याद्वाद में वाच्य-वाचक, कथ्य-कथक, द्योत्य-द्योतक अथवा प्रकाश्य-प्रकाशक सम्बन्ध कहा गया है। अनेकान्त वाच्य है, कथ्य है, द्योत्य है अथवा प्रकाश्य है और स्याद्वाद वाचक है, कथक (कथनकर्ता) है, द्योतक है अथवा प्रकाशक है। स्याद्वाद सिद्धान्त कहता है कि किसी भी वस्तु के किसी भी अंश/पक्ष के सम्बन्ध में तुमको बोलना हो तो सदा ‘स्यात्’ शब्द लगाकर बोलो, क्योंकि ‘स्यात्’ शब्द लगाने से उसके अपर पक्षों का भी गर्भित रूप से श्रोता को ज्ञान हो जायेगा, उनका अभाव नहीं होगा। यदि ‘स्यात्’ शब्द नहीं लगाया तो अपर पक्ष का बोध नहीं हो पाएगा, उसका अभाव हो जाएगा और इस प्रकार वस्तु का समीचीन ज्ञान न हो पाने से अपितु मिथ्या ज्ञान हो जाने से मिथ्यात्व का महादोष उत्पन्न होगा, जिसे एकान्तवाद कहते हैं।
‘स्यात्’ शब्द का अर्थ है- कथंचित्, किसी अपेक्षा से, अमुक अपेक्षा से, एक अपेक्षा से। अर्थात् जो कुछ कहा जा रहा है वह किसी एक अपेक्षा से ही है। उसका अपर पक्ष भी होता है जो इस समय नहीं कहा जा रहा है और पूर्णज्ञान तभी होगा जब उस अपर पक्ष को भी जान लिया जाएगा। जैसे वस्तु की नित्यता समझना हो तो स्याद्वाद कहता है कि ‘स्यात् नित्य है’- इस प्रकार बोलो, क्योंकि इससे उसमें विद्यमान अनित्य पक्ष का भी गर्भित रूप से ज्ञान हो जाएगा, उसका अभाव नहीं होगा। तथा यदि आपने ‘स्यात्’ नहीं लगाया तो वस्तु नित्य ही है- ऐसा बोध होगा और उसके अनित्य पक्ष का अभाव हो जाएगा।
यह भाषा की कमजोरी है कि वह वस्तु में विद्यमान अनन्तधर्मों को जैसा का तैसा एक साथ नहीं कह पाती है, अतएव ‘स्यात्’ शब्द का प्रयोग करना अनिवार्य कहा गया है। इससे असमर्थ भाषा भी कुछ समर्थ बन जाती है। आचार्य समन्तभद्र लिखते हैं कि लोहे के समान निर्मूल्य भाषा ‘स्यात्’ पद के प्रयोग से ‘पारस’ के समान अतिमूल्यवान बन जाती है।
कुछ लोग अज्ञानतावश ‘स्यात्’ शब्द का अर्थ शायद/सम्भावना करते हैं और स्याद्वाद की अनेक प्रकार से आलोचना करते हैं, परन्तु वह सब लापरवाही के कारण है, अन्यथा इस सिद्धान्त में ऐसा कुछ भी नहीं है जिसका विरोध किया जा सके, सभी को यह स्वीकार्य हो सकता है, सभी इसे किसी न किसी रूप में स्वीकार भी करते ही हैं।
स्याद्वाद के अन्तर्गत सप्तभंगवाद की भी चर्चा आती है, जिसका अभिप्राय है कि वस्तु के एक-एक धर्मयुगल को हम सात-सात प्रकार से कह सकते हैं। उदाहरणार्थ वस्तु के अस्ति- नास्ति रूप धर्मयुगल को हम इस प्रकार सप्तभंगों के द्वारा कह सकते हैं १. स्यादस्ति, २.स्यान्नास्ति, ३.स्यादस्तिनास्ति, ४. स्याद् अवक्तव्य, ५. स्यादस्तिअवक्तव्य, ६.स्यान्नास्ति अवक्तव्य, ७. स्याद्अस्तिनास्तिअवक्तव्य।
इस प्रकार वस्तु में अनन्त धर्मयुगल होने से अनन्त सप्तभंगियाँ बन जाती है। सबका अभिप्राय अनेकान्तात्मक वस्तु के जटिल स्वरूप को समीचीनतया समझना-समझाना ही है।
४. अपरिग्रह
अहिंसा की तरह अपरिग्रह भी एक निषेधवाचक शब्द है, अतः अपरिग्रह को समझने के लिए हमें सर्वप्रथम ‘परिग्रह’ को समझना आवश्यक है। बहुत से लोग बाह्य वस्तुओं का नाम परिग्रह समझते हैं किन्तु जैनदर्शन में परिग्रह की परिभाषा (लक्षण) इस प्रकार बताई गई है कि- मूर्च्छा परिग्रहः = अर्थात् मूर्च्छा ही परिग्रह है ।
प्रश्न है कि मूर्च्छा किसे कहते हैं ?
उत्तर- “मूर्च्छा तु ममत्वपरिणामः।” अर्थात् परवस्तुओं से ममत्व रखना, उन्हें अपना मानना ही मूर्च्छा है और जीव का परवस्तुओं के प्रति ममत्व परिणाम ही वास्तव में परिग्रह है।
हिंसा की भाँति परिग्रह के भी दो भेद किये गये हैं-
१. भाव परिग्रह अथवा निश्चय परिग्रह अथवा अंतरंग परिग्रह।
२. द्रव्य परिग्रह अथवा व्यवहार परिग्रह अथवा बहिरंग परिग्रह।
इनमें से अंतरंग परिग्रह १४ प्रकार का बताया गया है- १. मिथ्यात्व, २. क्रोध, ३. मान, ४. माया, ५. लोभ, ६. हास्य, ७. रति, ८. अरति ९. शोक, १०. भय, ११. जुगुप्सा, १२. स्त्रीवेद, १३. पुरुषवेद, १४. नपुंसकवेद ।
बहिरंग परिग्रह १० प्रकार का बताया गया है- १. क्षेत्र, २. वास्तु, ३. हिरण्य, ४. सुवर्ण, ५. धन, ६. धान्य, ७. दास, ८. दासी, ९. वस्त्र, १०. बर्तन ।
बहिरंग परिग्रह और भी अनगिनत प्रकार के हो सकते हैं। जिस किसी भी बाह्य वस्तु के प्रति जिसका ममत्व परिणाम है वह उसका बहिरंग परिग्रह है। शास्त्रों में कथित १० प्रकार की संख्या को एक लाक्षणिक प्रयोग ही समझना चाहिए, जैसे कि लोक में कहा भी जाता है कि मुझे तो दस काम हैं।
दोनों प्रकार के परिग्रहों की उक्त समस्त सूची को हमें बहुत ध्यान से देखना चाहिए। बहुत कम लोग इस ओर ध्यान दे पाते हैं कि जैनदर्शन में मिथ्यात्व और क्रोध-मानादि विकारों को भी परिग्रह माना गया है। यहाँ तक कि हास्यादि भी परिग्रह हैं- यह बात तो और भी सूक्ष्म प्रतीत होती है। यही कारण है कि अंतरंग और बहिरंग- इन दो प्रकार के परिग्रहों में से अंतरंग परिग्रह को ही प्रधान कहा गया है, क्योंकि उसके बिना बहिरंग परिग्रह को ‘परिग्रह’ ही नहीं कहा जा सकता, वह तो वस्तुमात्र है। यदि बाह्य वस्तु मात्र को परिग्रह माना जाए तो लोक में सभी वस्तुएँ अनादिनिधन हैं, उनका कभी अभाव नहीं होगा, तब फिर हमारा परिग्रह का पाप कब कैसे दूर होगा ?
यद्यपि उक्त समस्त ही परिग्रह त्याज्य है, परन्तु सभी जीव उन सबका त्याग एक साथ नहीं कर पाते; अतः परिग्रहत्याग के अनेक चरण भी सुझाए गये हैं, जिनमें श्रावक और मुनि की अपेक्षा से होनेवाले २ चरण प्रमुख हैं। एक को परिग्रहपरिमाण व्रत कहते हैं और दूसरे को अपरिग्रह महाव्रत। श्रावकों या गृहस्थों के परिग्रहपरिमाण व्रत होता है जिसमें वे अपने परिग्रह को सीमित करते हैं और मुनियों के अपरिग्रह महाव्रत होता है जिसमें वे सम्पूर्ण परिग्रह का त्याग करते हैं। जो व्यक्ति सम्पूर्ण परिग्रह का त्याग न कर सकें उन्हें परिग्रहपरिमाण तो अवश्य करना चाहिए।
इस प्रकार हमने यहाँ तीर्थंकर वर्धमान महावीर और उनकी शिक्षाओं की संक्षिप्त चर्चा की। विस्तृत जानकारी हेतु निम्नलिखित ग्रन्थ बड़े सहायक सिद्ध होते हैं-
१. आचार्य जिनसेन- महापुराण (भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली)
२. महाकवि विबुध श्रीधर- वड्ढमाणचरिउ (भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली)
३. महाकवि पुष्पदंत- वीरजिणिंदचरिउ (भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली)
४. आचार्य विद्यानन्द मुनि - तीर्थकर वर्धमान महावीर (वीरनिर्वाण समिति, इन्दौर)
५. मुनि विकर्षसागर- वनराज से जिनराज (कुन्दकुन्द भारती, नई दिल्ली-६७)
६. डॉ. हीरालाल जैन, डॉ. ए.एन. उपाध्ये- Mahavir : His time and philosophy
७. डॉ. हुकमचन्द भारिल्ल- तीर्थकर महावीर और उनका सर्वोदय तीर्थ (टोडरमल स्मारक, जयपुर)
८. पं. पदमचन्द शास्त्री- तीर्थकर महावीर (जैनविद्या संस्थान, श्रीमहावीरजी)
24वें तीर्थंकर वर्धमान महावीर : एक दृष्टि में
पांच नाम : वीर, अतिवीर, महावीर, सन्मति, वर्धमान
जन्मस्थान : क्षत्रिय कुण्डग्राम, वैशाली, बिहार
पितृनाम मातृनाम : राजा सिद्धार्थ एवं त्रिशलादेवी (प्रियकारिणी), वंशनाम : नाथवंश (ज्ञातृवंश, नाठवंश)
गर्भावतरण : आषाढ़ शुक्ला षष्ठी, शुक्रवार, १७ जून ५९९ ई.पू.
गर्भवास : नौ मास, सात दिन, बारह घंटे
जन्म-तिथि : चैत्र शुक्ला त्रयोदशी, चन्द्रवार, २७ मार्च, ५९८ ई.पू.
जन्म-समय-ज्योतिर्ग्रहस्थितिः : नक्षत्र- उत्तरफाल्गुनि, राशि- कन्या, महादशा- बृहस्पति, दशा- शनि, अंतर्दशा- बुध
वर्ण (कान्ति ) : स्वर्णाभ (हेमवर्ण),
चिह्न : सिंह,
गृहस्थित रूप : अविवाहित (प्रसंग चला, परन्तु विवाह नहीं हुआ),
कुमारकाल : २८ वर्ष ५ माह १५ दिन,
दीक्षा-तिथि : मार्गशीर्ष कृष्णा १०, सोमवार, २९ दिसम्बर, ५६९ ई.पू.,
तप : १२ वर्ष, ५ मास, १५ दिन,
कैवल्य : वैशाख शुक्ला १०, रविवार, २६ अप्रैल, ५५७ ई.पू.,
देशनापूर्व मौन : ६६ दिन,
देशना-तिथि (प्रथम) : श्रावण कृष्णा प्रतिपदा, शनिवार, १ जुलाई, ५५७ ई.पू.,
निर्वाण-तिथि : कार्तिक कृष्णा अमावस्या, मंगलवार, १५ अक्टूबर, ५२७ ई.पू.,
निर्वाण-भूमि : पावा (मध्यमा पावा),
आयु : ७२ वर्ष (७१-४-२५),
पूर्वभव : अच्युतेन्द्र