तीर्थ आना सफल तेरा तब होयेगा, तीर्थ परिणति में तेरे प्रगट होयेगा ॥ टेक ॥
तीर्थ जिससे तिरा जाये उसको कहें, तेरा आत्म स्वभाव ही ध्रुव तीर्थ है।
पार भव से गये सब ही निज आश्रय ले, तू भी निज आश्रय ले पार खुद होयेगा॥1॥
आत्म साधक जहाँ भी विराजे अहो, तीर्थ जग में वही क्षेत्र कहलाता है।
पर विचारो अरे वो तो अपने में है, तू स्वयं में विराजे प्रभु होयेगा ॥ 2 ॥
आत्मा हूँ प्रतीति जगे जिस समय, ज्ञानमय अनुभवन ज्ञान का बल बने ।
होवे उपयोग की थिरता निज भाव में, तीर्थमय तू अरे तब स्वयं होयेगा ॥ 3 ॥
कर रहा जिनके दर्शन अरे भव्य तू, वे स्वयं ही स्वयं को निहारें अरे ।
कह रहे देख ले तू स्वयं की तरफ, तू भी मेरे ही सम खुद प्रभु होयेगा ॥4॥
तीर्थ तू आया है किन्तु प्रभु के लिये, और आये सहज प्रभु तो अपने लिये।
चेत ! अब भी अरे निज में थिरता करो, लौटकर व्यर्थ जग में दुःखी होयेगा ॥5॥
स्मरण मूढ़ किनका करे व्यर्थ तू, विस्मरण योग्य जग में सब पर भाव हैं।
अब करो स्मरण अपना ज्ञायक प्रभु, प्रभुतामय सिद्ध पद तब प्रकट होयेगा ॥6॥
आत्मन् बहुत भटके सुखी ना हुए, अब न जाओ कहीं अपने घर में रहो।
भोग वैभव परम निज का शाश्वत अरे, एक क्षण में सहज तृप्त तू होयगा ॥ 7 ॥
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’