तीन मूर्तियाँ
-प्रो. वीरसागर जैन
“मूर्तियाँ ले लो मूर्तियाँ, कलात्मक मूर्तियाँ, शिक्षाप्रद मूर्तियाँ” -एक मूर्तिकार आज उज्जैन में अपनी मूर्तियाँ बेचता घूम रहा था | बहुत लोगों ने उसकी मूर्तियाँ देखीं भी, किन्तु किसी ने भी खरीदी नहीं | वह परेशान हो रहा था | सोच रहा था- बड़ा नाम सुना उज्जैन का कि यहाँ कला के बड़े कद्रदान रहते हैं, पर यहाँ तो कोई मेरी कला को कुछ भी नहीं समझ रहा | लगता है यहाँ से खाली ही जाना पड़ेगा | परन्तु कोई बात नहीं, जाते-जाते यहाँ के राजा को भी परख चलूँ |
वह राजदरबार में पहुंच गया- “महाराज की जय हो, महाराज ! आपके राज्य की बड़ी प्रशंसा सुनी थी, परन्तु यहाँ तो कोई भी मेरी कला का कद्रदान नहीं मिला, हम कलाकारों की जीविका कैसे चलेगी ?”
राजा भोज- “क्या कहना चाहते हो, स्पष्ट कहो ।”
“महाराज ! मैं ये तीन मूर्तियाँ बनाकर लाया हूँ, पर आपके नगर में किसी ने नहीं खरीदी, आप ही खरीद लीजिए ।”
“इनका मूल्य बताओ ।”
“महाराज ! पहली मूर्ति दस रुपये की है, दूसरी एक हजार रुपये की है और तीसरी एक लाख रुपये की है ।”
“अरे ! तीनों एक ही धातु से बनी हुई हैं, तीनों का आकार भी समान है, फिर मूल्य में इतना अधिक अंतर कैसे ?"
“महाराज यही तो मेरी कला है | यदि आप भी इसे नहीं समझेंगे तो हमारा तो विनाश ही हो जाएगा | जरा एक धागा मंगाइए, अभी मैं आपको इनका अंतर बताता हूँ ।”
धागा लेकर मूर्तिकार ने पहली मूर्ति के कान में डाला और बोला- “देखो महाराज, इस कान से धागा डाला और उस कान से बाहर निकल गया | अब मैं ये धागा दूसरी मूर्ति में डालता हूँ | देखिए इसमें इस कान से डाला और मुख से बाहर निकला | अब मैं तीसरी में भी डालता हूँ | देखिए इसमें इस कान में डाला, पर कहीं से भी बाहर नहीं निकला, बल्कि इसके अन्दर ही समा गया | देखो महाराज ! ये तीनों मूर्तियाँ बड़ी ही शिक्षाप्रद हैं, आप इनको अपनी प्रदर्शनी में लगाएँगे तो सबको बड़ी शिक्षा देंगी | कहेंगी- जो ज्ञान की बातों को एक कान से सुनकर दूसरे कान से निकाल देते हैं, उनका मूल्य दस रुपये है; जो उन्हें मुख से बाहर निकाल देते हैं, उनका मूल्य एक हजार रुपये है; परन्तु जो उन्हें अपने जीवन में ही समा लेते हैं, उतार लेते हैं, उनका मूल्य एक लाख रुपये है ।”
राजा ही नहीं, पूरा राजदरबार मन्त्रमुग्ध होकर मूर्तिकार की बातें सुन रहे थे, उनकी प्रसन्नता का कोई ठिकाना नहीं था | राजा ने तत्काल तीनों मूर्तियों को खरीद लिया और उसे पुरस्कृत भी किया | मूर्तिकार भी प्रसन्न होकर शुभकामनाएँ देता हुआ अपने घर लौट गया |