दोहा
वृषभादिक चौबीस जिन, मंगल मूल महान्।
स्वस्ति कारक होय दें, स्व-पर भेद-विज्ञान।। 1।।
सोरठा
जिनको कुछ भी चाहिये, ते मूढ़न सरदार।
ज्ञानी वांछा रहित हो, होते भव से पार।। 2।।
पराधीनता दुःखमय, आकुलता उपजाय।
विज्ञ मोक्षमार्गी भये, पर से दृष्टि हटाय।। 3।।
इष्ट जनों के योग में, जो नर हर्षे सार।
अज्ञानी रागी वही, रोवे आँसू ढार।। 4।।
जो अनिष्ट संयोग में कहे हाय दुःखकार।
तत्त्वज्ञान से शून्य वह, जावे नरक मँझार।। 5।।
तत्त्ववेत्ता होय जो, निश्चय राग निवार।
कर्म जाल को भेदकर, होता भव से पार।। 6।।
अनिष्ट योग दुखकार अरु इष्ट योग सुखकार।
अज्ञानी जन कहत हैं, ज्ञानी समता धार।। 7।।
संयोगों की प्रतीक्षा, करता ज्ञानी नाहिं।
कार्य करें दृढ़ चित्त हो, दृष्टि ज्ञायक माँहि।। 8।।
पर के पीछे भागते, पर नाहिं जाना जाय।
आत्म भान में तिष्ठते, स्वयं ज्ञान में आय।। 9।।
बहुत समय पर में गया, पर कछु बना न काम।
तन-धन-गृह बल ने कभी, दिया न सुख छदाम ।। 10 ।।
राग-द्वेष ही रोग है, ज्ञान मात्र सुख साज।
ऐसा माने सो लहे, सुन्दर सिद्ध समाज।। 11 ।।
जेतो करो उपाय, काय व्याधि उतनी बढ़े।
सुःख ज्ञान निज पाय, करो उपेक्षा देह की।। 12।।
परमेष्ठी को समझकर, आत्म स्वरूप लहाय।
पर से लक्ष्य हटाय जो, परमेष्ठी बन जाय।। 13।।
इष्ट-अनिष्ट न कोय, ज्ञान नेत्र से देख तू।
ममता कबहुँ न होय, ज्ञान ज्योति प्रकाश में।। 14।।
चौपाई
स्व-पर विवेक करहु सुखदाई, यह अवसर चूकौ मत भाई।
पर की ओर दृष्टि दुखदाई, इस ही तैं भव भ्रमण कराई ।।
द्रव्य-क्षेत्र निज काल स्वभावा, जाने सो संसार न पावा।
जिन स्व-चतुष्टय ज्ञान कराई, अनंत चतुष्टय सम्पद पाई ।। 15 ।।
सोरठा
धन से सुख न छदाम, देखो दृष्टि पसारिकैं ।
निज में ही आराम, ज्ञानी अनन्ते कहि गये।। 16 ।।
दोहा
ज्यों मिश्री मुख में रखे, तुरत मिष्ट रस पाय।
त्यों अन्तर्मुख दृष्टि से, तत्क्षण सुख विलसाय ।। 17 ।।
नींबू खट्टा रटन से, खट्टा स्वाद न आय ।
आत्मा सुख स्वरूप है, कथनी से नहिं पाय।। 18।।
पर दुखदाता है नहीं, राग-द्वेष दुखकार ।
राग-देष के त्याग से, प्रकटे सुख अविकार।। 19।।
आधि-व्याधि-उपाधि सब देते हैं बहु ताप।
इनसे रहित सुतप करे, मिटें सभी संताप ।। 20।।
सम्यग्दर्शन-ज्ञान अरु सम्यक् चारित्र युक्त।
ऐसे गुरु को नमन कर, होऊँ जग से मुक्त।। 21 ।।
Artist: ब्र. रवीन्द्र जी ‘आत्मन्’
स्रोत: सहज पाठ संग्रह
खोज: Tattvarth Vinshatika Sar