तर्ज : शांत चित्त हो निर्विकल्प हो..
सहज भाव से भाओ-भाओ, आत्म भावना सुखकारी।
सहज भाव से ध्याओ-ध्याओ, ध्रुव शुद्धातम अविकारी ।। 1 ।।
ज्ञान सहज है और तत्त्व की प्राप्ति भी है सहज अरे।
शान्त चित्त से सोचो भाई, उलझन इसमें कौन करे ।। 2 ।।
ज्ञान स्वयं ही ज्ञेय स्वयं ही, प्रतिक्षण स्वयं ज्ञान में आय।
निर्णय कर अन्तर्मुख होवे, स्वानुभूति सहजहि प्रगटाय ।। 3 ।।
होय प्रतीति सहज मुक्त प्रभु, दीन भावना नश जावे।
मिथ्या कर्ता बुद्धि छूटे प्रत्यक्ष ज्ञाता हो जावे।। 4।।
सतत ज्ञान की धारा बढ़ती, बन्ध शिथिल हो शुद्धि बढ़े।
आत्म लीनता वृद्धिंगत हो, गुणस्थान फिर सहज चढ़े ।। 5 ।।
होय सहज निर्ग्रन्थ अवस्था, वर्ते प्रचुर स्वसंवेदन।
निर्ममत्व हो, निर्विकल्प हो, होवे श्रेणी आरोहण ।। 6।।
कर्म नशावें, प्रभुता प्रगटे, अविनाशी शिवपद प्रगटाय।
ऐसा ही पद सब जन पावें, मंगलमय शुद्धातम भाय ।। 7 ।।
Artist: ब्र. रवीन्द्र जी ‘आत्मन्’
स्रोत: सहज पाठ संग्रह