स्यात् पद का महत्त्व | Syat Pad Ka Mahattv

स्यात् पद का महत्त्व

-प्रो. वीरसागर जैन

जैन दर्शन स्याद्वादी है | उसका कहना है कि हमें हर वाक्य ‘स्यात्’ पद लगाकर ही बोलना चाहिए, तभी वह वाक्य सत्य होगा, अन्यथा असत्य हो जाएगा | ( ‘स्यात्पदेन वदनं स्याद्वादः |’ )

‘स्यात्’ पद का अर्थ होता है- कथंचित्, किसी अपेक्षा से, एक अपेक्षा से | यदि हम इस ‘स्यात्’ पद का प्रयोग नहीं करेंगे तो उसका अर्थ हो जाएगा- सर्वथा, सभी अपेक्षाओं से | यही बड़ी गलती हो जाएगी | क्योंकि कोई भी वाक्य सभी अपेक्षाओं से सत्य नहीं होता, एक अपेक्षा से ही सत्य होता है ।

अतः जैन दर्शन के अनुसार सत्य बोलने के अभिलाषी को सर्वत्र ‘स्यात्’ पद लगाना अनिवार्य है | जैन दर्शन कहता है कि ‘स्यात्’ पद एक ऐसी संजीवनी बूंटी के समान है, जो सभी वाक्यों में लगे हुए ‘सर्वथा’ पद के विष को नष्ट करता है और उसे अमृत के समान स्व-पर-हितकारी बनाता है | यदि इसे नहीं लगाया जाएगा तो वह वाक्य ‘सर्वथा’ के विष के कारण स्व-पर-प्रणाशक सिद्ध होगा |

यहाँ कोई कहे कि मैं तो ‘सर्वथा’ पद लगाता ही नहीं हूँ, फिर वह वाक्य स्व-पर-प्रणाशक कैसे सिद्ध होगा ? जैनाचार्य कहते हैं कि ‘सर्वथा’ पद लगाना नहीं पड़ता, वह तो लगा ही होता है, भाषा का ऐसा ही स्वरूप है | ‘सर्वं वाक्यं सावधारणम्’ -न्यायदीपिका, 3/83 | इसीलिए ‘स्यात्’ पद लगाकर उसकी शुद्धि करना अनिवार्य है, उसका विष निर्मूल करना अनिवार्य है |

जैनाचार्यों ने इस ‘स्यात्’ पद के सम्बन्ध में बहुत गहरा चिन्तन किया है और निष्कर्षस्वरूप अनेक उद्गार व्यक्त किये हैं | स्वयम्भूस्तोत्र (श्लोक 65) में आचार्य समन्तभद्र लिखते हैं कि मेरी वाणी जंग खाए हुए लोहे के समान निर्मूल्य थी, किन्तु जब से इसमें ‘स्यात्’ पद लगाया है, यह पारस पत्थर के समान बहुमूल्य हो गई है | अथवा वे कहते हैं कि ‘स्यात्’ पद लगा देने से हर वाक्य सम्यक् बन जाता है, चाहे वह कुछ भी हो और ‘स्यात्’ पद हटा देने से हर वाक्य मिथ्या बन जाता है, चाहे वह कुछ भी हो | युक्त्यनुशासन (श्लोक 62) में भी आचार्य समन्तभद्र लिखते हैं कि मैं तो अभद्र था, किन्तु ‘स्यात्’ पद लगाने से समन्तभद्र बन गया | उनका भाव है कि ‘स्यात्’ पद से रहित कथन करनेवाला व्यक्ति अभद्र है और ‘स्यात्’ पद लगाकर कथन करनेवाला व्यक्ति समन्तभद्र है | अब यहाँ जरा इस बात पर कुछ विचार करते हैं कि क्या ‘स्यात्’ पद लगा देने से सभी वाक्य समीचीन हो जाते हैं, चाहे उसमें कुछ भी मिथ्या बात कही गई हो ?

इस प्रश्न का उत्तर यद्यपि कुछ जैनाचार्यों ने ऐसा दिया है कि हमने तो स्याद्वाद की परिभाषा में ही ‘प्रमाणेनाविरुद्धा विधिप्रतिषेधकल्पना’ कहा है, अतः कुछ भी प्रमाण-विरुद्ध बात समीचीन सिद्ध नहीं की जा सकती है | जो बात प्रमाण-अविरुद्ध है, केवल उसे ही समीचीन सिद्ध करना चाहिए | किन्तु समन्तभद्र आदि आचार्यों का कहना है कि हाँ, ‘स्यात्’ पद लगा देने से सब कुछ समीचीन सिद्ध हो जाता है, चाहे वह कुछ भी बात हो; क्योंकि शब्द, अर्थ, ज्ञान आदि की इतनी अधिक विवक्षाएँ उपलब्ध हैं कि कुछ भी घटित होना असम्भव नहीं है।

शंका- क्या ‘स्यात्’ पद लगा देने से ये कथन भी समीचीन सिद्ध हो सकते हैं कि- हिंसा में धर्म है, जीव अचेतन है, आत्मा पुद्गल है, ईश्वर जगत् का कर्ता-धर्ता है, गधे के सिर पर सींग हैं, मैं देश का प्रधानमंत्री हूँ, इत्यादि ?

समाधान- हाँ, ‘स्यात्’ पद लगा देने से उक्त कथन भी समीचीन सिद्ध हो सकते हैं | यथा-

हिंसा में धर्म है -यह कथन मीमांसक मत के यज्ञविधान की अपेक्षा समीचीन है | जीव अचेतन है -यह कथन चेतन के अतिरिक्त अन्य गुणों की अपेक्षा समीचीन है, जैसाकि ‘स्वरूपसम्बोधन-पंचविंशति’ में भी कहा है- ‘जीवो चेतनाचेतनात्मकः’ | आत्मा पुद्गल है -यह कथन कर्मपुद्गलों के संयोग की अपेक्षा समीचीन है | ईश्वर जगत् का कर्ता-धर्ता है -यह कथन न्यायदर्शन की अपेक्षा समीचीन है | गधे के सिर पर सींग हैं -यह कथन किसी चित्र की अपेक्षा समीचीन है | मैं देश का प्रधानमंत्री हूँ -यह कथन किसी स्वप्न या नाटक की अपेक्षा समीचीन है |

इसी प्रकार से अन्य सभी कथनों पर आसानी से घटित किया जा सकता है | यहाँ केवल कुछ ही वाक्यों के उदाहरण दिए हैं।

शंका- आपने कहा कि ‘स्यात्’ पद हटाकर हर वाक्य को मिथ्या भी सिद्ध किया जा सकता है, चाहे वह कितना ही अच्छा हो, तो क्या ये वाक्य भी मिथ्या सिद्ध हो सकते हैं- सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्र की एकता मोक्षमार्ग है, मुक्तावस्था में अनंत सुख है, राम-सीता पति-पत्नी थे, मनुष्य के सींग नहीं होते, इत्यादि ?

समाधान- हाँ, ‘स्यात्’ पद हटाकर इन वाक्यों को भी मिथ्या सिद्ध किया जा सकता है ।

यथा-

ज्ञानादेव मोक्षः -ऐसा माननेवाले सांख्य आदि की अपेक्षा ‘सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्र की एकता मोक्षमार्ग है’ -यह कथन मिथ्या सिद्ध होता है | मुक्त होने पर आत्मा पूर्णतः नष्ट हो जाती है -ऐसा माननेवाले बौद्ध आदि की अपेक्षा ‘मुक्तावस्था में अनंत सुख है’ - यह कथन मिथ्या सिद्ध होता है | किसी विशेष रामायण-ग्रन्थ की अपेक्षा अथवा नाटक के पात्रों की अपेक्षा राम-सीता पति-पत्नी थे -यह कथन मिथ्या सिद्ध होता है | किसी के स्वप्न या चित्र की अपेक्षा मनुष्य के सींग नहीं होते -यह कथन मिथ्या सिद्ध होता है।

इसी प्रकार से अन्य सभी कथनों पर आसानी से घटित किया जा सकता है | यहाँ केवल कुछ ही वाक्यों के उदाहरण दिए हैं | शास्त्रों में भी ऐसे बहुत सारे कथन मिलते हैं | जैसे कि प्रवचनसार में कहा है कि दुर्गति में भ्रमण करने के लिए धर्म निष्फल है- ‘धम्मो जदि णिफ्फलो’ (गाथा ) |

शंका- बात तो आपकी सही लग रही है, परन्तु ऐसा सब घटित करके जैनाचार्य आखिर कहना क्या चाहते हैं ?

समाधान- अन्य क्या कहना चाहेंगे भाई ! वस्तु का स्वरूप ऐसा ही है और वे उसे ही सम्यक् रीति से, सर्वांग रूप से, भलीभांति समझाना चाहते हैं | एक ही पक्ष को पूर्ण मानकर हम अनादि काल से अज्ञान का सेवन करते आ रहे हैं, उसी को ठीक कराना चाहते हैं | साथ ही, वे यह भी कहना चाहते हैं कि ‘स्यात्’ पद का प्रयोग करके एक बार अपना आग्रह तो समाप्त करो, आग्रह ही विष है, तत्त्वज्ञान की सबसे बड़ी बाधा है |