स्याद्वाद : निष्पक्ष विद्वानों की दृष्टि में
-डॉ. वीरसागर जैन
जैनदर्शन के ‘स्याद्वाद’ सिद्धान्त की कोई कितनी भी आलोचना करे परन्तु निष्पक्ष चिन्तकों ने तो इसे समीचीन सिद्ध करते हुए इसकी भूरि-भूरि प्रशंसा ही की है। स्याद्वाद सिद्धान्त है ही ऐसा जो प्रथम दृष्टि में बड़ा अटपटा सा (असंभव-सा) प्रतीत होता है, किन्तु थोड़ी गहराई में जाते ही वह सम्पूर्ण व्यवहार एवं परमार्थ का ठोस आधार है- यह भी समझ में आ जाता है। यही कारण है कि जिन्होंने इसे हल्के से लिया वे इसका मर्म नहीं समझ सके और इसकी आलोचना से स्वयं को ही दूषित कर बैठे, किन्तु जिन्होंने इस पर थोड़ा भी गंभीरतापूर्वक चिन्तन करने का प्रयत्न किया, वे इसकी समीचीनता पर ऐसे मुग्ध हो गये, मानो उन्हें अमृत मिल गया हो।
दरअसल अनेकान्तवाद / स्याद्वाद वस्तु का स्वरूप है और इसे स्वीकार किए बिना और कोई चारा ही नहीं है। संसार के सभी दर्शन, दार्शनिक एवं दर्शनग्रन्थ (शास्त्र) येनकेन-प्रकारेण स्याद्वाद को स्वीकार भी करते ही हैं परन्तु जिन्हें ‘जैन’ या ‘स्याद्वाद’ शब्द से ही चिढ़ है अथवा जो किसी पूर्वाग्रह से ग्रस्त हैं और इस विषय पर थोड़ी भी निष्पक्षता एवं गंभीरता से सोचना ही नहीं चाहते, उनका क्या किया जा सकता है?
तथापि हम तो पवित्र भाव से यही प्रयत्न करते रहना चाहते हैं कि सभी लोग निष्पक्षतापूर्वक इस स्याद्वाद सिद्धान्त को समझने का प्रयत्न करें और इससे लाभान्वित हों। जो सच्चे दार्शनिक / चिन्तक होंगे अथवा जिनकी भली होनहार होगी वे तो समझेंगे ही। यहाँ हम इसी पवित्र भावना से दुनिया भर के कुछ निष्पक्ष चिन्तकों के विचार जो उन्होंने स्याद्वाद सिद्धान्त के सम्बन्ध में प्रकट किये हैं, प्रस्तुत कर रहे हैं। यदि इन्हें पढ़कर हमारेकुछ मित्र अपना पूर्वाग्रह छोड़कर ‘स्याद्वाद’ को ठीक से समझने का प्रयत्न कर सके तो हम अपना परिश्रम सफल समझेंगे।
डॉ. सतीशचन्द्र चट्टोपाध्याय एवं डॉ. धीरेन्द्र मोहन दत्त संयुक्त रूप से लिखते हैं- “स्याद्वादी होने के कारण जैनमत के सम्बन्ध में एक भ्रम उत्पन्न हो गया है। इसे कुछ लोग संशयवाद(Sceptism) या अज्ञेयवाद (Agnoticism) मानते हैं। इसकी तुलना ग्रीक दार्शनिक पीरो (Pyrrho) के संशयवाद से की जाती है, क्योंकि पीरो के अनुसार भी वाक्यों के पहले ‘शायद’ (May be) का प्रयोग आवश्यक समझा जाता था, किन्तु यथार्थ में जैन संशयवादी नहीं है। ‘स्यात्’ शब्द के प्रयोग से किसी वाक्य से उसकी असत्यता या संदिग्धता का बोध नहीं कराया जाता है, बल्कि उसकी सापेक्षता का संकेत किया जाता है। परिस्थिति तथा विचास्प्रसंग के अनुसार परामर्श अवश्य ही सत्य होता है- इसे जैन दार्शनिक स्पष्ट रूप से स्वीकार करते हैं। अतः स्याद्वाद को संशयवाद समझना ठीक नहीं है।''¹
डॉ. चन्द्रधर शर्मा, पूर्व आचार्य एवं अध्यक्ष, दर्शन विभाग, जबलपुर विश्वविद्यालय लिखते हैं- “अन्य भारतीय दार्शनिकों ने ‘स्यात्’ पद का साधारण अर्थ ‘शायद’ या सम्भवतः मानकर स्याद्वाद की संशयवाद के रूप में कटु आलोचना की है। बौद्धों और वेदान्तियों ने स्याद्वाद को संशयवाद या संभावनावाद कहकर इसे ‘पागलों का प्रलाप’ बताया है।… किन्तु स्याद्वाद की यह आलोचना सही नहीं है, क्योंकि स्याद्वाद संशयवाद नहीं है, अपितु सापेक्षवाद है। पुनः स्याद्वाद यह नहीं कहता कि वस्तु में परस्पर विरोधी धर्म एक ही दृष्टि से, एक ही अर्थ में रहते है… द्रव्य दृष्टि से वस्तु में एकता, नित्यता आदि का और पर्याय दृष्टि से अनेकता, अनित्यता आदि का सापेक्षतया विधानकिया जाता है। स्वद्रव्य-रूप-देश-काल की दृष्टि से वस्तु की सत्ता का और परद्रव्य-रूप-देश-काल की दृष्टि से वस्तु की असत्ता का सापेक्षतया विधान किया जाता है, अतः स्याद्वाद में विरोध नहीं है।"³
भारतीय दर्शनों के प्रकाण्ड विद्वान् वाचस्पति गैरोला लिखते हैं- “जैनों के ‘अनेकान्त’ को कुछ आस्तिक दर्शनों में छल की संज्ञा दी गयी है; किन्तु यह ठीक नहीं है। छल के सिद्धान्त में एक ही शब्द के दो अर्थ मोनजाते हैं, जो अनेकान्तवाद की दृष्टि से उपयुक्त नहीं है। एक पदार्थ को एक दृष्टि से देखकर उसका अस्तित्व स्वीकार करना और उसी को दूसरी दृष्टि (अपेक्षा) से देखकर उसका अस्तित्व स्वीकार न करना-एक शब्द के दो अर्थ नहीं हैं, जैसा कि छल में होता है। वह तो व्यापक सिद्धान्तों एवं विचारों पर आधारित है। अतः अनेकान्तवाद कोछल नहीं कहा जा सकता है। अनेकान्तवाद, संशय का हेतु भी नहीं है, क्योंकि सप्तभंगी नय में समझाया गया है कि प्रत्येक पदार्थ में स्व-स्वरूप और पर-स्वरूप के विशेषों की उपलब्धि होती है। इस दृष्टि से अनेकान्तवाद में संशय की कोई गुंजाइश नहीं है।
इसके अतिरिक्त यदि हम चार्वाक, बौद्ध, सांख्य, न्याय और मीमांसा आदि दर्शनों के तात्त्विक विवेचन तथा सैद्धान्तिक स्वरूप को देखते हैं तो हमें विश्वास होता है कि जैनों का अनेकान्तवाद कुछ ऐसा गढ़ा हुआ सिक्त नहीं है, जिसमें जैन दर्शन की वैयक्तिक दृष्टि का आभास मिलता हो। वह तो लोकदृष्टि से जितना उपयोगी है, विचार की दृष्टि से भी उतना ही उपयोगी है।⁴
राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी लिखते हैं- “मेरा अनुभव है कि अपनी दृष्टि से मैं सदा सत्य ही होता हूँ, किन्तु मेरे ईमानदार आलोचक तब भी मुझमें गलती देखते हैं। पहले मैं अपने को ही सही और उन्हें अज्ञानी मान लेता च, किन्तु अब मैं मानता हूँ कि अपनी-अपनी जगह हम दोनों ठीक हैं, कई अंधों ने हाथी को अलम्अलग टटोलकर उसका जो वर्णन किया था, वह दृष्टान्त अनेकान्तवाद का सबसे अच्छा उदाहरण है। इसी सिद्धान्त ने मुझे यह बतलाया है कि मुसलमान की जाँच मुस्लिम दृष्टिकोण से तथा ईसाई की परीक्षा ईसाई दृष्टिकोण से की जानी चाहिए। पहले मैं मानता था कि मेरे विरोधी अज्ञान में हैं। आज मैं विरोधियों की दृष्टि से भी देख सकता हूँ। मेरअनेकान्तवाद, सत्य और अहिंसा-इन युगल सिद्धान्तों का ही परिणाम है।”⁵
श्री मंगलदेव शास्त्री (प्राचार्य संस्कृत कालेज, वाराणसी) लिखते हैं कि- “पाणिनि सूत्र अस्ति नास्ति दिष्टं मतिः (पा. 4/4/30) के अनुसार जैनदर्शन आस्तिक दर्शन में ही परिगणित होता है। जैनदर्शन का अनेकान्त तो उसका उधार स्तम्भ है ही, परन्तु परमार्थतः प्रत्येक दार्शनिक विचारधारा के लिए भी इसको आवश्यक मानना चाहिए क्योंकिस्वभावतः प्रत्येक तत्त्व में अनेकरूपता होनी ही चाहिए। नैतिक उत्कर्ष के साथ व्यावहारिक शुद्धि के लिए भी अनेकान्त दर्शा जैन दर्शन की महान् देन है।”⁶
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी के दर्शनशास्त्रविभागाध्यक्ष प्रो. फणिभूषण अधिकारी लिखते हैं- “जैनदर्शन के स्याद्वाद सिद्धान्त को जितना गलत समझा गया है, उतना किसी अन्य सिद्धान्त को नहीं। यहाँ तक कि शंकराचार्य भी इस दोष से मुक्त नहीं है। उन्होंने भी इस सिद्धान्त के प्रति अन्याय किया है। यह बात अल्पज्ञ पुरुषों के लिए अवश्य क्षम्य हो सकती थी, किन्तु यदि मुझे कहने का अधिकार है तो मैं भारत के इस महान् विद्वान् के लिए तो अक्षम्य ही कहूँगा। यद्यपि मैं इस महर्षि को अतीव आदर की दृष्टि से देखता हूँ। ऐसा जान पड़ता है कि उन्होंने इस धर्म के दर्शनशास्त्र के मूल ग्रन्थों का अध्ययन करने की परवाह नहीं की।”⁷
महामहोपाध्याय पं. स्वामी राममिश्र शास्त्री, प्रोफेसर, संस्कृत कॉलेज, वाराणसी कहते हैं- “मैं कहाँ तक कहूँ बड़े-बड़े नामी आचार्यों ने अपने ग्रन्थों में जो जैनमत का खण्डन किया है वह ऐसा किया है जिसे देखसुन हँसी आती है। स्याद्वाद यह जैनधर्म का एक अभेद्य किला है, उसके अन्दर वादी प्रतिवादियों के मायामय गोले नहीं प्रवेश कर सकते। जैनधर्म के सिद्धान्त प्राचीन भारतीय तत्त्वज्ञान और धार्मिक पद्धति के अभ्यासियों के लिए बहुत महत्त्वपूर्णहैं। इस स्याद्वाद से सर्वसत्य विचारों का द्वार खुल जाता है।”⁸
विख्यात समालोचक आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी, भूतपूर्व सम्पादक ‘सरस्वती’, प्रयाग कहते हैं- “प्राचीन दर्जे के हिन्दू-धर्मावलम्बी बड़े-बड़े शास्त्री तक अब भी नहीं जानते कि जैनियों का स्याद्वाद किस चिड़िया का नाम है। धन्यवाद है जर्मनी, फ्रांस और इंग्लैण्ड के कुछ विद्यानुरागी विशेषज्ञों को, जिनकी कृपा से इस धर्म के सुयायियों के कीर्ति-कलाप की खोज की और भारतवर्ष के इतर जैनों का ध्यान आकृष्ट हुआ यदि वे विदेशी विद्वान् जैनधर्म ग्रन्थों की आलोचना न करते, उनके प्राचीन लेखकों की महत्ता प्रकट न करते तो हम लोग शायद आज भी पूर्ववत् अज्ञान के अन्धकार में ही डूबते रहते।”⁹
डॉ. सम्पूर्णानन्द कहते हैं- “अनेकान्तवाद या सप्तभंगीन्याय जैनदर्शन का मुख्य सिद्धान्त है। प्रत्येक पदार्थ के जो सात अन्त या स्वरूप जैन शास्त्रों में कहे गये हैं, उनको ठीक रूप से स्वीकार करने में आपत्ति हो सकती है। कुछ विद्वान् सात में भी कुछ को गौण मानते हैं। साधारण मनुष्य को वह समझने में कठिनाई होती हैकि एक ही वस्तु के लिए एक ही समय में ‘है’ और ‘नहीं’ दोनों बातें कैसी कही जा सकती हैं, परन्तु कठिनाई के होते हुए भी वस्तुस्थिति तो ऐसी ही है।”¹⁰
डॉ. एस.वी. नियोगी, भूतपूर्व चीफ जस्टिस तथा उपकुलपति, नागपुर विश्वविद्यालय, नागपुर कहते हैं- “जैनाचार्यों की यह वृत्ति अभिनन्दनीय है कि उन्होंने ईश्वरीय आलोक(Revelation) के नाम पर अपने उपदेशों में ही सत्य का एकाधिकार नहीं बताया। इसके फलस्वरूप उन्होंने साम्प्रदायिकता और धर्मान्धता के दुर्गुणों को दूक्कर दिया, जिसके कारण मानव-इतिहास भयंकर द्वन्द्व और रक्तपात के द्वारा कलंकित हुआ। अनेकान्तवाद अथवा स्याद्वाद विश्व के दर्शनों में अद्वितीय है।…स्याद्वाद सहिष्णुता और क्षमा का प्रतीक है; कारण, वह यह मानता है कि दूसरे व्यक्ति को भी कुछ कहना है। सम्यग्दर्शन और स्याद्वाद के सिद्धान्त औद्योगिक पद्धति द्वारा प्रस्तुत की गई जटिल समस्याओं को सुलझाने में अत्यधिक कार्यकारी होंगे।"¹¹
डॉ. गंगाप्रसाद झा, प्रयाग विश्वविद्यालय कहते हैं- “जब से मैंने शंकराचार्य द्वाराजैन सिद्धान्त का खण्डन पढ़ा है, तब से मुझे विश्वास हुआ कि इस सिद्धान्त में बहुत कुछ है जिसे वेदान्त के आचार्य ने नहीं समझा और जकुछ अब तक जैनधर्म को जान सका हूँ, उससे मेरा दृढ़ विश्वास हुआ है कि यदि वे जैनधर्म को उसके मूल ग्रन्थ्यौं देखने का कष्ट उठाते तो उन्हें जैनधर्म का विरोध करने की कोई बात नहीं मिलती।"¹²
प्रो. आनन्दशंकर बाबूभाई ध्रुव, कहते हैं- “महावीर के सिद्धान्त में बताये गये स्याद्वाद को कितने ही लोग संशयवाद कहते हैं, इसे मैं नहीं मानता। स्याद्वाद संशयवाद नहीं है किन्तु वह एक दृष्टि-बिन्दु हमको उपलब्ध करा देता है। विश्व को किस रीति से अवलोकन करना चाहिए? यह हमें सिखाता है। यह निश्चय है कि विविध दृष्टि-बिन्दुओं द्वारा निरीक्षण किये बिना कोई भी वस्तु सम्पूर्ण स्वरूप मेआ नहीं सकती। स्याद्वाद (जैनधर्म) पर आक्षेप करना अनुचित है।"¹³
रामधारीसिंह ‘दिनकर’, कहते हैं- "इसमें कोई सन्देह नहीं कि अनेकान्त का अनुसंधान भारत की अहिंसम् साधना का चरम उत्कर्ष है और सारा संसार इसे जितनी ही शीघ्र अपनाएगा, विश्व में शान्ति भी उतनी ही शीघ्र स्थापित होगी।"¹⁴
श्रीमद् रायचन्द्र कहते हैं- “सब धर्मों में एक परमतत्त्व का ही गुणगान है, और सब दर्शनों ने भिन्न्नभिन्न शैली से उस परमतत्त्व का विवेचन किया है, परन्तु स्याद्वाद शैली संपूर्ण एवं यथार्थ है।"¹⁵
जर्मन के महान् वैज्ञानिक अल्बर्ट आइन्स्टीन कहते हैं कि- “हम केवल सापेक्ष सत्य को ही जान सकते हैं। वस्तु के समग्र सत्यांशों को विश्वद्रष्टा ही जान सकता है। कारण कि वस्तु में अनेक गुण रहते हैं और वे स्यद्वाद से ही अल्पज्ञानी द्वारा जाने जा सकते हैं।"¹⁶
अमेरिकी वैज्ञानिक प्रो. डॉ. आर्चीब्रह्म लिखते हैं कि- “अनेकान्त जैनदर्शन का एक महत्त्वपूर्ण सिद्धान्त है जिसको पश्चिमी वैज्ञानिकों तथा हिन्दू तर्कशास्त्रियों द्वारा सामान्यरूप से ही नहीं स्वीकृत किया गया है किन्तु उसको भौतिक एकता या समझौते द्वारा विश्वशान्ति के लिए भी प्रमुख सिद्धान्त माना गया है।"¹⁷
जर्मनी के विद्वान् हर्मन जैकोबी ने लिखा है कि- "जैनदर्शन के सिद्धान्त प्राचीन तत्त्वज्ञान तथा धार्मिक पद्धति के अभ्यासियों के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण हैं। इसके स्याद्वाद नामक सिद्धान्त से सर्व सत्य विचारों का द्वार खुल जाता है।"¹⁸
डॉ. थामस प्रधान ग्रंथपाल, इंडिया ऑफिस, लन्दन लिखते हैं कि- “न्यायशास्त्रों में जैन न्याय का स्थान बहुत ऊँचा है। उसमें स्याद्वाद वस्तुओं की भिन्न्नभिन्न परिस्थितियों पर अच्छा प्रकाश डालता है।"¹⁹
ग्रीक दर्शन में एलिअटिक्स और हेरेक्लिट्स नामक विचारकों के बाद ईसा से 495 वर्ष पूर्व एम्पीडोक्लीज, एटोमिस्ट्रस अनैक्सागोरस नामक दार्शनिकों का युग था। इन तत्त्वचिन्तकों ने एलिअटिक्स के एकान्त नित्यवाद और हेरेक्लिट्स के एकान्त क्षणिकवाद का समन्वय करके दोनों सिद्धान्तों को नित्यानित्य रूप में ही स्वीकार किया। न्झ्के मतानुसार सर्वथा नित्यवाद तथा सर्वथा क्षणिकवाद असम्भव है।²⁰
अब हम ग्रीस के प्रतिभाशाली कवि तथा दार्शनिक प्लेटो के विचारों की ओर जाते हैं। सोफिस्ट नामक संवाद में एलिमा का मुसाफिर कहता है- जब हम असत्य के विषय में कुछ कहते हैं तो इसका मतलब सत् से विरुद्ध (सर्वथा असत्) न होकर केवल सत् से भिन्न होता है।²¹
जर्मन विद्वान् हीगेल कहते हैं विरुद्ध धर्मात्मकता ही सब वस्तुओं का मूल है।
ब्रेडले कहते हैं कि कोई भी वस्तु अन्य वस्तुओं के साथ तुलनात्मक दृष्टिकोण से देखी जाने पर किसी अपेक्षा से आवश्यक तथा किसी अपेक्षा से अनावश्यक दोनों रूप सिद्ध होती है।²²
प्रो. जे. अचिम ‘सत्य का स्वरूप’ नामक पुस्तक में लिखते हैं कि कोई भी विचार स्वतः ही दूसरे विचार से सर्वथा अनपेक्षित होकर, केवल अपनी अपेक्षा से सत्य नहीं कहा जा सकता।²³ प्रो. पेटी के अनुसार यह विश्व किसी अपेक्षा से नित्य है लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि इसमें परिवर्तन नहीं होता। यह नित्यानित्यात्मकता का सिद्धान्त संसार की छोटी से छोटी वस्तु में भी लागू होता है।
यूनान के दार्शनिक सुकरात, अफलातूँ तथा अरस्तू ने भी अपने विचारों के प्रतिपादन में ज्ञात भाव अथवा अज्ञात भाव से अनेकान्त का कथन किया ही है। सुकरात को अपने ज्ञान की अपूर्णता का अल्पज्ञता का पूरा परिज्ञान था। इस मर्यादा के भान को ही उसने ज्ञान अथवा बुद्धिमत्ता कहा है। वह कहा करता था कि “मैं ज्ञानी हूँ क्योंकि मैं जानता हूँ कि मैं अज्ञ हूँ। दूसरे लोग ज्ञानी नहीं हैं, क्योंकि वे यह नहीं जानते कि वे अज्ञ हैं। यह कथन अनेकान्त के अनुरूप है।
सुकरात के शिष्य अफलातूँ ने कहा था कि हम लोग सागर के किनारे खेलने वाले उन बच्चों के समान हैं जो अपनी सीपियों से सागर के अथाह जल को नापना चाहते हैं। यह सत्य है कि हम सीपियों से पानी भरभर कर कभी उसे खाली नहीं कर सकते। फिर भी अपनी छोटी-छोटी सीपियों से जो पानी इकट्ठा करना चाहते हैं वह उस महासागर का ही एक अंश है, इसमें किसी प्रकार का संशय नहीं रह जाता। अफलातूँ का यह कथन अनेकान्त तथा स्याद्वाद के अत्यन्त निकट है।
मिल के अनुसार विधि (अस्ति) दर्शन में नागर (सिविल) शब्द का उच्चारण करने पर ही अपराधी, सैनिक, राजनीतिक तथा धर्मशास्त्रीय अर्थों का निषेध (नास्ति) हो जाता है। थामस कैम्पबेल सुस्पष्ट शब्दों में कहते हैं कि मनुष्य इसलिए है (अस्ति) कि वह पत्थर, सिंह, गर्दभ आदि नहीं (नास्ति) है। यह कथन स्याद्वाद-अनेकान्त के निकट है तथ इसी कारण सर्वसंकर दोष का नाशक एवं अर्थक्रियाकारित्व का उत्पादक है।
दार्शनिक अरस्तू के मत में समस्त परिवर्तन (अनित्यता) के लिए एकरूपता (नित्यता-स्थिरता) को स्वीकार करना आवश्यक है। समस्त परिवर्तन के अन्दर कुछ स्थायी तत्त्व अवश्य रहना चाहिए जिसके अन्दर परिवर्तन हो सके। बिना स्थायी तत्त्व को स्वीकार किए परिवर्तन (अस्थायिता) हो सके- यह हमें प्रतीत नहीं होता।
काण्ट भी स्यात् नित्य स्यात् अनित्य स्वीकार करते हैं। ‘सेकण्ड एनोलोजी ऑफ एक्सपीरियेंस’ में वे कहते हैं कि बिना स्थिर सत्ता के, काल के सम्बन्ध सम्भव नहीं है। ‘क’ के पीछे ‘ख’ आने का तात्पर्य यह है कि इससे पूर्व कि ख प्रारम्भ हो, ‘क’ समाप्त हो चुका। उनके बीच का सम्बन्ध जिसे हम अनुक्रम के नाम से पुकारते हैं, न तो ‘क’ के लिए और न ‘ख’ के लिए ही रह सकता है; किन्तु एक ऐसी वस्तु के लिए अवश्य रह सकता है जो दोनों के लिए एक समान उपस्थित हो। यदि एक-दूसरे के पीछे आने वाली घटनाओं के अतिरिक्त इस संसार में और कुछ न हो - अर्थात् ‘ख’ के प्रारम्भ होने से पूर्व ‘क’ का विलोप हो जाना एवं इससे पूर्व कि ‘ग’ का प्रारम्भ हो, ‘ख’ का विलुप्त हो जाना आदि-आदि, तो इस प्रकार का कोई सिलसिला नहीं बैठ सकता। किसी भी सिलसिले का सम्भव होना उपलक्षित करता है कि एक सापेक्ष स्थिर तत्त्व अवश्य है।
इस प्रकार अनेक निष्पक्ष चिन्तकों ने स्याद्वाद-अनेकान्तवाद को स्वीकार किया है और उसकी भूरि-भूरि सराहना भी की है।
सन्दर्भ-सूची
- भारतीय दर्शन, पृष्ठ 55 (पुस्तक भंडार, पटना, सितम्बर 1964)
- प्रमाणवार्तिक 1/182-185; तत्त्वसंग्रह 311-327; शांकरभाष्य 2/2/33
- भारतीय दर्शन : आलोचन और अनुशीलन, पृष्ठ 36
- भारतीय दर्शन, पृष्ठ 114
- तीर्थंकर वर्द्धमान (आचार्य विद्यानन्द), पृष्ठ 84
- जैनदर्शन, प्राक्कथन, पृष्ठ 14 से 17 (गणेश प्रसाद वर्णी ग्रन्थमाला, वाराणसी)
7-13. तीर्थंकर वर्धमान महावीर (पद्मचन्द्र शास्त्री), पृष्ठ 111 से 113 - संस्कृति के चार अध्याय, पृष्ठ 137
- श्रीमद् राजचंद्र, भाग 1, पृष्ठ 245
- स्याद्वाद (पं. जवाहरलाल शास्त्री), पृष्ठ 249
- आचार्य शिवसागर स्मृतिग्रन्थ, पृष्ठ 546-47
18-29. स्याद्वाद (पं. जवाहरलाल शास्त्री), पृष्ठ 249 से 251
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