स्याद्वाद : कतिपय प्रश्नोत्तर | Syadvad Katipay Prashnottar

स्याद्वाद : कतिपय प्रश्नोत्तर

-प्रो. वीरसागर जैन

प्रश्न- स्याद्वाद का मूल सन्देश क्या है- संक्षेप में बताइए ?
उत्तर- स्याद्वाद कहना चाहता है कि हमें हर कथन को ‘स्यात्’ पद लगाकर ही बोलना चाहिए और समझना चाहिए ।
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प्रश्न- ‘स्यात्’ पद का क्या अर्थ होता है ? इसे लगाने से क्या लाभ है ?
उत्तर- ‘स्यात्’ पद का अर्थ होता है- कथंचित्, किसी अपेक्षा से, एक अपेक्षा से । इसे लगाने से यह स्पष्ट होता है कि प्रत्येक वस्तु में अनन्त गुण-धर्म हैं, किन्तु हम अभी उनमें से केवल एक ही गुण-धर्म को कह रहे हैं, सबको नहीं । जो कहा जा रहा है, वह अभी मुख्य है, किन्तु उसी समय अन्य गुण-धर्म भी गौण रूप से विद्यमान हैं । ‘स्यात्’ पद अनुक्त गुण-धर्मों की स्वीकृति के लिए लगाया जाता है ।

प्रश्न- यदि ‘स्यात्’ पद न लगाएँ तो क्या होगा ?
उत्तर- अनुक्त गुण-धर्मों की स्वीकृति नहीं हो पाएगी, हमारे द्वारा कहा हुआ कथन ‘सर्वथा’ सिद्ध होगा, सभी अपेक्षाओं से कहा हुआ सिद्ध होगा और इसीलिए वह कथन गलत सिद्ध होगा ।

प्रश्न- तो फिर ‘सर्वथा’ पद लगाने को मना कीजिए न ? हर जगह ‘स्यात्’ पद लगाने की क्या आवश्यकता है ?
उत्तर- ‘सर्वथा’ पद तो हमें कभी लगाना ही नहीं चाहिए, किन्तु भाषा का स्वरूप ऐसा ही है कि उसमें ‘सर्वथा’ पद न लगाने पर भी लगा ही रहता है, दिखाई नहीं देता हो तब भी लगा ही रहता है, क्योंकि कहा भी है- ‘सर्वं वाक्यं सावधारणम्’ -न्यायदीपिका 3/83 । अतः हमें सर्वत्र ‘स्यात्’ पद लगाकर ही बोलना चाहिए । तथा समझना भी चाहिए ।

प्रश्न- किन्तु जैनाचार्य तो स्वयं भी सर्वत्र ‘स्यात्’ पद लगाकर बोलते हुए नहीं दिखाई देते हैं ?
उत्तर- बोलते हैं, बारम्बार बोलते हैं; किन्तु फिर भी वचन-व्यवहार का स्वरूप ऐसा ही है कि वह अनेक बार लुप्त हो जाता है, अतएव जैनाचार्यों ने स्थान-स्थान पर यह स्पष्टीकरण दिया है कि हमारे हर कथन में ‘स्यात्’ पद लगा हुआ ही समझना, चाहे हमने उसे लगा पाया हो या नहीं । हमारा हर कथन स्यात्पदमुद्रित ही है -ऐसा पक्का समझ लेना ।

प्रश्न- जैनाचार्य कहते हैं कि ‘स्यात्’ पद लगाने से हर बात समीचीन हो जाती है, चाहे वह कुछ भी हो, तो क्या ये कथन भी ‘स्यात्’ पद लगाने से समीचीन सिद्ध हो सकते हैं कि- अग्नि शीतल है, हिंसा में धर्म है, जीव अचेतन है, आत्मा पुद्गल है, ईश्वर जगत् का कर्ता-धर्ता है, गधे के सिर पर सींग हैं, मैं देश का प्रधानमंत्री हूँ, इत्यादि ?
उत्तर- हाँ, ‘स्यात्’ पद लगा देने से उक्त कथन भी समीचीन सिद्ध हो सकते हैं । यथा-

अग्नि शीतल है -यह कथन चित्र या स्वप्न की अपेक्षा समीचीन है । हिंसा में धर्म है -यह कथन मीमांसक मत के यज्ञविधान की अपेक्षा समीचीन है । जीव अचेतन है -यह कथन चेतन के अतिरिक्त अन्य गुणों की अपेक्षा समीचीन है, जैसाकि ‘स्वरूपसम्बोधन-पंचविंशति’ में भी कहा है- ‘जीवो चेतनाचेतनात्मकः’ । आत्मा पुद्गल है -यह कथन कर्मपुद्गलों के संयोग की अपेक्षा समीचीन है । ईश्वर जगत् का कर्ता-धर्ता है -यह कथन न्यायदर्शन की अपेक्षा समीचीन है । गधे के सिर पर सींग हैं -यह कथन किसी चित्र की अपेक्षा समीचीन है । मैं देश का प्रधानमंत्री हूँ -यह कथन किसी स्वप्न या नाटक की अपेक्षा समीचीन है ।

प्रश्न- बात तो आपकी सही है, परन्तु ऐसा सब घटित करने से आखिर क्या लाभ है ?

उत्तर- ऐसा घटित करने से हमें वस्तु का पूर्ण स्वरूप समझ में आता है और एक पक्ष का दुराग्रह दूर होता है । हम अनादि काल से एक ही पक्ष को पूर्ण स्वरूप मानकर अज्ञान का सेवन कर रहे हैं, वह सब ठीक होता है । तथा आग्रह या दुराग्रह, जो तत्त्वज्ञान की सबसे बड़ी बाधा है, विषतुल्य है, वह दूर होता है । प्रत्येक कथन अपनी समीचीन अपेक्षा से समझ में आता है । यही कारण है कि स्याद्वाद को अपेक्षावाद भी कहते हैं ।

प्रश्न- स्याद्वाद को नयवाद भी तो कहते हैं ?

उत्तर- हाँ, स्याद्वाद, नयवाद, सापेक्षवाद, अपेक्षावाद आदि सब इसी के नाम हैं । नयवाद तो बहुत ही अच्छा नाम है । इससे बात शीघ्र स्पष्ट होती है कि हर कथन का अपना विशेष नय होता है, हमें उस कथन को उसी नय से समझना चाहिए, तभी वह समीचीन है, अन्यथा नहीं । नय अनन्त होते हैं शब्द-अर्थ-ज्ञान के भेद-प्रभेद की व्यापक दृष्टि से, सत्याभिलाषी को इनका भलीभांति ज्ञान अवश्य करना चाहिए, ताकि हर कथन का सही नय (अपेक्षा) समझा जा सके । जैसे कि अग्नि शीतल है -यह कथन स्वप्न नय की अपेक्षा समीचीन है । माता त्रिशला के स्वप्न की अग्नि उष्ण नहीं थी, शीतल ही थी, यदि उष्ण होती तो माता जल जाती । इसी प्रकार माता त्रिशला का मुख चन्द्रमा है -यह कथन उपमा नय से समीचीन है । इसी प्रकार हिमालय और गंगा मेरे हाथ में हैं, यह कल्पवृक्ष मांगने पर भी कुछ नहीं देता है -ये कथन चित्रनय की अपेक्षा समीचीन है । इसी प्रकार सर्वत्र कथन की समीचीन अपेक्षा समझनी चाहिए -यही स्याद्वाद का मूल सन्देश है ।

नयवाद के सम्बन्ध में ‘नयचक्र’ में एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण गाथा आई है-

णत्थि णएहिं विहूणं सुत्तमत्थोव्व जिणवरमदम्हि ।
तो णयवादे णिउणा मुणिणो सिद्धंतिया होंति ॥

अर्थ- नयों के बिना जिनवर-मत में कुछ भी सूत्र या अर्थ नहीं कहा गया है, अतः नयवाद में निपुण मुनि ही सिद्धान्त के ज्ञाता होते हैं ।

प्रश्न- स्याद्वाद को सप्तभंगवाद भी कहते हैं ?

उत्तर- हाँ, स्याद्वाद को सप्तभंगवाद भी कहते हैं, सप्तभंगवाद स्याद्वाद का पूर्ण विस्तार है । स्याद्वाद में संक्षेप में केवल दो विरोधी धर्मों को दर्शाना पर्याप्त रहता है, किन्तु उसे ही यदि कोई विस्तार से कहना-समझना चाहे तो वही सप्तभंगवाद है ।

प्रश्न- कृपया सप्तभंगवाद को थोड़ा स्पष्ट कीजिए ?

उत्तर- यह तो बहुत विस्तृत विषय है, जिस पर कभी स्वतन्त्र रूप से चर्चा करेंगे, किन्तु अभी इसे एक सरल उदाहरण के माध्यम से स्पष्ट करते हैं । जैसे कि मान लीजिए एक लड़के-लड़की की सगाई हो गई है और आप उनसे पूछ रहे हैं कि क्या आप पति-पत्नी हैं । तो वे इस प्रश्न का उत्तर सात प्रकार से ऐसे दे सकते हैं-

  1. हाँ, हम पति-पत्नी हैं ।
  2. नहीं, अभी हम पति-पत्नी नहीं हैं ।
  3. हाँ भी और नहीं भी, हम पति-पत्नी हैं भी और नहीं भी हैं।
  4. एकदम सत्य स्थिति तो अवक्तव्य है ।
  5. हम पति-पत्नी हैं -यह बात भी अवक्तव्य है ।
  6. हम पति-पत्नी नहीं हैं -यह बात भी अवक्तव्य है ।
  7. हम पति-पत्नी हैं और नहीं भी -यह बात भी अवक्तव्य है ।

इसी प्रकार सर्वत्र घटित करना चाहिए । यहाँ तो हमने सगाई हो चुके जोड़े पर ही घटित करके दिखाया है, पर विवाहित जोड़े पर भी ऐसा ही घटित किया जा सकता है और जिनकी सगाई नहीं हुई उन पर भी ऐसा ही घटित किया जा सकता है । यही स्याद्वाद या सप्तभंगवाद का सौन्दर्य है । सप्तभंगवाद की परिभाषा ही यह है कि- एक ही वस्तु में विधि-निषेध की कल्पना को सप्तभंगवाद कहते हैं । यथा- “एकस्मिन् वस्तुनि प्रश्नवशाद् दृष्टेनेष्टेन च प्रमाणेनाविरुद्धा विधिप्रतिषेधकल्पना सप्तभंगी ।” -आचार्य अकलंक, तत्त्वार्थराजवार्तिक १/६/५

प्रश्न- क्या स्याद्वाद को ही अनेकान्तवाद भी कहते हैं ?

उत्तर- नहीं, स्याद्वाद और अनेकान्त में बड़ा अंतर है । अनेकान्त वाच्य है और स्याद्वाद वाचक । अथवा अनेकान्त द्योत्य है और स्याद्वाद द्योतक । अनेकान्त वस्तु का नाम है और स्याद्वाद उसके कथन करने की शैली का नाम है, जैसा कि आचार्य अकलंकदेव ने भी कहा है- “अनेकान्तात्मार्थकथनं स्याद्वादः ।” -लघीयस्त्रय, 62

इस प्रकार वास्तव में प्रत्येक वस्तु को अनन्तधर्मात्मक मानने का नाम अनेकान्तवाद है । किन्तु स्थूल अपेक्षा से, अथवा ‘अनेकान्त को बोलना अनेकान्तवाद है’ -इस अर्थ की अपेक्षा से अनेक लोग स्याद्वाद को ही अनेकान्तवाद भी कहते हैं, जो गलत नहीं है ।

प्रश्न- ‘स्यात्’ पद लगाने से ‘शायद’ का अर्थ निकलकर संशय उत्पन्न करता है ?

उत्तर- नहीं, यह तो आपका भाषासम्बन्धी अज्ञान हुआ, क्योंकि ‘स्यात्’ पद यहाँ विधिलिंग लकार का रूप नहीं है, अपितु निपात है, जिसका अर्थ होता है- कथंचित्, एक अपेक्षा से; अतः यह संशय उत्पन्न नहीं करता, अपितु एक अपेक्षा विशेष का निर्धारण करता है ।

प्रश्न- कुछ लोग कहते हैं कि स्याद्वाद तो छल है ?

उत्तर- नहीं, स्याद्वाद छलरूप भी नहीं है, क्योंकि छल तो वहाँ होता है जहाँ वक्ता के अभिप्राय से भिन्न अर्थ की कल्पना करके वचन-विघात किया जाए । उदाहरणार्थ कोई कहे- ‘नवकम्बलोऽयं देवदत्तः’ अर्थात् इस देवदत्त के पास नया कम्बल है, तब कोई श्रोता ‘नव’ शब्द का अर्थ ‘नौ’ की संख्या करके कहे कि इस देवदत्त के पास नौ कम्बल कहाँ हैं, एक ही तो है । इसे छल कहते हैं, किन्तु स्याद्वाद ऐसा छलरूप नहीं है, क्योंकि इसमें तो सुनिश्चित मुख्य-गौण-विवक्षा से सम्भव अनेक धर्मों का सुनिर्णीत रूप से प्रतिपादन किया जाता है । - तत्त्वार्थवार्तिक,

प्रश्न- कहते हैं कि स्याद्वाद से हर बात सही हो जाती है तो क्या जैन दर्शन के अनुसार कोई भी बात गलत नहीं होती है ?

उत्तर- होती है, जो बात जिस अपेक्षा से सत्य हो, उसे यदि उसी अपेक्षा से नहीं माना जाए और अन्य अपेक्षा से माना जाए तो वही गलत बात है । अथवा उस बात को उसी अपेक्षा से न मानकर सर्वथा माना जाए तो भी वह बात गलत है । जैसे कि- आत्मा नित्य है -यह बात द्रव्य अपेक्षा सत्य है, किन्तु यदि इस बात को कोई पर्याय अपेक्षा माने तो यही बात असत्य हो जाएगी । अथवा यदि इस बात को सर्वथा माने तो भी यह बात असत्य हो जाएगी । इसी प्रकार सर्वत्र घटित कर लेना चाहिए ।

वस्तु में अनन्त आयाम/अपेक्षाएँ हैं और कोई भी बात एक ही अपेक्षा से सत्य होती है । उसे यदि अन्य किसी भी अपेक्षा से या सर्व अपेक्षाओं से माना जाएगा तो वह बात असत्य होगी, गलत होगी । जैसे कि कौआ काला है -यह कथन वर्ण की अपेक्षा कहा है, उसे यदि स्पर्श, रस गन्ध आदि की अपेक्षा से माना जाएगा तो यह असत्य होगा । तथा वर्ण में भी पंखों के वर्ण की अपेक्षा उसे काला कहा है, उसे यदि उसके पित्त, अस्थि, रुधिर आदि की अपेक्षा काला माना जाएगा तो यह भी असत्य होगा । तथा यदि उसे सर्वथा काला माना जाएगा तो भी असत्य होगा । इस विषय का विशेष स्पष्टीकरण धवल, जयधवल, तत्त्वार्थवार्तिक आदि अनेक ग्रन्थों में आया है । यथा- ‘काकश्च काकात्मकः, न कृष्णात्मकः, तत्पित्तास्थिरुधिराणामपि कृष्णतापत्तेः ।’ -जयधवल, पुस्तक १, पृष्ठ २०६

एक और उदाहरण देखते हैं । किसी ने मुझसे कहा कि सम्मेदशिखर 700 किलोमीटर दूर है । उसने अपनी अपेक्षा से बताया था, हर व्यक्ति की अपेक्षा से नहीं । हर व्यक्ति की अपेक्षा से तो वह अलग-अलग अनन्त दूर-पास धर्मों वाला है । अतः उसे उस व्यक्ति की अपेक्षा ही 700 किलोमीटर दूर समझना सत्य है, शेष सब की अपेक्षा समझना असत्य है । सत्य एक ही है, असत्य अनेक हैं ।

प्रश्न- प्रमाण एवं प्रमाणाभास, नय एवं नयाभास आदि की तरह क्या स्याद्वाद भी दो तरह का है- स्याद्वाद और स्याद्वादाभास?

उत्तर- हाँ, जो स्याद्वाद नहीं है, पर स्याद्वाद जैसा लगता है या माना जाता है वह स्याद्वादाभास है। जैसे कि-

कोई व्यक्ति धर्मों को ठीक से न समझे और ऊटपटांग रीति से उन्हें वस्तु पर घटित करे तो वह स्याद्वादाभास होगा। अथवा अपेक्षा गलत लगाए तो भी स्याद्वादाभास होगा। जैसे कि कोई व्यक्ति कहे कि वस्तु पर्याय-अपेक्षा नित्य और द्रव्य-अपेक्षा अनित्य है तो वह भी स्याद्वादाभास होगा। अथवा धर्मयुगल सही न बनाए तो भी स्याद्वादाभास होगा जैसे कोई दुःख बनाकर कहे कि सिद्ध सुखी भी हैं और दुःखी भी तो यह स्याद्वादाभास होगा। इत्यादि अनेक प्रकार से समझा जा सकता है-

स्याद्वादलक्षणरहितः स्याद्वादवदवभासमानः स्याद्वादाभासः।