स्वानुभव पत्रावली | Swanubhav Patravali

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स्वानुभव पत्रावली

अहो भाग्य !
( लौकिक व्यवहार का लोकोत्तररूप )
अपने विचारों तथा जीवन की घटनाओं को दूरवर्ती परिचित व्यक्ति के पास भेजने के लिये पत्र लेखन अतिप्राचीन विधा है। कबूतरों के माध्यम से संदेश भेजने के आख्यान हमारे प्राचीन साहित्य में भी मिलते हैं।

प्राय: संयोग-वियोग अथवा दैनिक घटनाओं के आदान-प्रदान हेतु पत्र लेखन का उपयोग किया जाता है, परन्तु आत्महित की प्रेरणा, तत्त्व-चिंतन, सैद्धांतिक विश्लेषण एवं आध्यात्मिक अनुभूतियों के आदान-प्रदान हेतु पत्र लिखने के उदाहरण भी मिलते हैं।

आचार्यकल्प पण्डित टोडरमलजी द्वारा मुल्ताननगर के साधर्मियों को लिखा गया पत्र ‘रहस्यपूर्ण चिट्ठी’ बनकर आज भी जिज्ञासुओं की शंकाओं का समाधान कर रहा है। आध्यात्मिक सत्पुरुष पूज्य गुरुदेवश्री कानजी स्वामी द्वारा ‘रहस्यपूर्ण चिट्ठी’ पर प्रवचन करना- अध्यात्म जगत में इस चिट्ठी की महत्ता का प्रतीक है।

यद्यपि किसी व्यक्ति या समूह विशेष की विशिष्ट मान्यताओं और परिस्थितियों के लक्ष्य से पत्र लिखे जाते हैं, अतः वे सार्वजनिक और सार्वकालिक साहित्य नहीं बन सकते, तथापि जीवन की समस्याओं का आध्यात्मिक समाधान शाश्वत साहित्य का रूप लिये बिना नहीं रहता।

ऐसे पत्र लिखने वाले चिन्तक यह कल्पना भी नहीं कर पाते कि भविष्य में उन्हें सम्पादित/संकलित करके प्रकाशित किया जाएगा; परन्तु उन्हें पाने वाले पुण्यशाली साधर्मीजन उन पत्रों में व्यक्त विचारों को विशेष उपलब्धि समझते हुए उन्हें प्रकाशित करना चाहते हैं, ताकि समग्र अध्यात्मरसिक् समुदाय उनका लाभ ले सकें। इस भावना से प्रेरित होकर अनेक आध्यात्मिक चिन्तकों के पत्रों के संकलन प्रकाशित हो चुके हैं।

श्री ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’ द्वारा रचित आध्यात्मिक रचनाओं और उनके प्रवचनों से अध्यात्मरसिक समाज गौरवान्वित और लाभान्वित हो रहा है। उनके निमित्त से प्रवाहित अध्यात्म-गंगा ने पूज्य गुरुदेवश्री के निमित्त से हुई अभूतपूर्व आध्यात्मिक क्रान्ति को नवजीवन प्रदान किया है।

आदरणीय पण्डितजी द्वारा रचित आध्यात्मिक पूजन, स्तवन, सम्बोधन एवं कथा साहित्य से तो समस्त जैन समाज परिचित हैं ही, परन्तु उनके गहन-चिन्तन से प्रस्फुटित पत्र अभी तक गुप्त गुफा में ही छुपे हुए थे, जिन्हें प्रकाश में लाने की काललब्धि अब पक गई है, अतः यह संकलन प्रकाशित हो रहा है।

माननीय पं. ज्ञानचन्दजी सोनागिर के सौजन्य से मुझे इन पत्रों में समाहित अमृत के रसास्वादन का अवसर मिला, जिसे मैं अपना विशेष सौभाग्य समझता हुआ, उनके प्रति आभार व्यक्त करता हूँ।

इन पत्रों में प्रवाहित अध्यात्म रस का अनुभव मात्र इन्हें पढ़ने से नहीं, अपितु इनका बारम्बार मनन-चिन्तन घोलन से अनुभव होगा। अतः सभी साधर्मीजन इनके निमित्त से साधकभाव प्रगट करके साध्य की ओर अग्रसर हों- यही भावना व्यक्त करते हुए विराम लेता हूँ।

पं. अभयकुमार जैन शास्त्री
जैनदर्शनाचार्य, एम.काम., देवलाली


क्र. विषय पृष्ठ संख्या
1. ज्ञायक तो ज्ञायक ही है 11
2. उपादान-निमित्त का स्वरूप 12
3. शुद्धात्मा ही सच्चा गुरु है 14
4. स्वानुभव ही जीवन है 19
5. दुर्लभ अवसर की सफलता कब? 21
6. स्वदृष्टि से निर्दोष, परदृष्टि से दोष 22
7. विकल्प मात्र अनर्थकारी है 24
8. सम्यक् तत्वाभ्यास ही योग्य है 25
9. पुरुषार्थ की सही दिशा 32
10. चैतन्य का चमत्कार देखो 33
11. स्वभाव की आराधना का फल 35
12. असंग की भावना श्रेयस्कर है 36
13. चैतन्य प्रभु की शरण 38
14. परमार्थ ज्ञानाभ्यास क्या है? 40
15. अतीन्द्रिय ज्ञान ही ज्ञान है 41
16. आराधना का घात न हो 44
17. आज का साधर्मी तो भावी भगवान है 48
18. संयम रत्न की सुरक्षा करो 52
19. निर्ग्रंथ पद की भावना 58
20. अंतरंग में आत्मानुशासन, बाह्य में जिनशासन 64
21. व्यवहार से परमार्थ का पोषण कैसे होता है? 66
22. आराधना ही परमार्थ प्रभावना है 70
23. शास्त्र अभ्यास का फल 74
24. अद्भुत मंत्र ‘शुद्धचिद्रूपोऽहं’ 77
25. पंचकल्याणक का प्रयोजन 86
26. बहिरत्मा-अन्तरात्मा-परमात्मा 91
27. सच्चा स्वार्थी कौन? 94
28. जाननहार ही जानने में आता है 97
29. आत्मानुभव की प्रेरणा 101
30. किसे समझना है, किससे समझना है? 102
31. दिशा और दशा बदलती है सम्यक् विचार से 104
32. किसके प्रति और कैसा हो ज्ञान का समर्पण 106
33. कौन है सच्चा इष्ट 110
34. समस्त द्रव्य स्वस्थ ही हैं 120
35. स्वभाव में तर्क नहीं 126
36. द्रव्य-दृष्टि ही सुख की जननी है 140
37. अहो! धन्य है परम शुद्धात्म तत्त्व 146
38. बाहर में परमात्मा, अन्तर में आत्मा देखो 149
39. बाह्यदृष्टि से अशान्ति एवं अन्तर्दृष्टि से परमशान्ति 151
40. अनंतकाल स्वरूपानुभव में ही बीते 153
41. अनंतशक्ति सम्पन्न ज्ञानमात्र “मैं” हूँ 160
42. पर चिन्ता से दुख, स्वात्म चिंतन से सुख 165
43. सभी परभाव समान रूप से उपेक्षणीय है 167
44. पर से सम्बन्ध की मान्यता दुःखों का बीज है 169
45. स्वभाव का बल ही सच्चा उपाय है 171
46. शंकायें बाहर से, समाधान अंदर से 180
47. अहो! मुक्तिमार्ग वीरों का मार्ग है 187
48. छुटकारे का मार्ग तो अंतर में है 188
49. मनुष्य पर्याय की सार्थकता 190
50. अभाव में से भाव की उत्पत्ति नहीं 192
51. मेरे में अव्यवस्था नहीं 193
52. सत् को संख्या की आवश्यकता नहीं 195
53. जिनशासन में स्वच्छंदता की गुंजाईश नहीं 199
54. इष्ट-अनिष्ट की कल्पना ही मिथ्या है 202
55. स्वानुभव के बिना स्वस्थ कहाँ? 204
56. कर्तृत्व बुद्धि ज्ञानीजनों को नहीं होती 205
57. षट्कारक का भेद मुझमें नहीं 206
58. स्वाश्रय से मुक्तिमार्ग सहज है 208
59. ज्ञान की शोभा स्वयं को जानने में है 210
60. गृहीत-अगृहीत मिथ्यात्व क्या? 213
61. बाह्य प्रभावना में अंतरंग प्रभावना की मुख्यता हो 215
62. अकर्ता स्वभाव की उपेक्षा अपराध है 217
63. अशुभ-शुभभाव स्वभाव के घातक ही हैं 220
64. ज्ञान ही सर्व समाधान कारक है 225
65. प्रत्येक सत् स्वयं में परिपूर्ण है 228
66. सत् स्वयं ही सुन्दर है 231
67. मेरी शोभा मेरे से ही है 233
68. तत्त्वाराधना में शिथिल नहीं होना 237
69. मैं ही ज्ञेय, ज्ञान और ज्ञाता हूँ 239
70. ज्ञान में निज की महिमा स्वीकार हो 242
71. ज्ञानी के सर्वजीवों के प्रति मैत्री है 244
72. मेरा स्वभाव तो निरपेक्ष है 247
73. यह लोकोत्तर, व्यवहारातीत मार्ग है 248
74. ज्ञायक भाव का अवलम्बन होने पर क्या होता है? 250
75. विषयासक्ति व भेदविज्ञान एक साथ नहीं 252
76. कल्याण के लिये अंतरंग पवित्रता अनिवार्य 255
77. इसको अपना ही विश्वास नहीं 259
78. स्व-कल्याण में जगत का कल्याण 261
79. विकल्पों की पूर्ति से कोई सुखी नहीं 263
80. मैं किसी को कोई मेरे लिये शरण नहीं 268
81. उपाधियों से दूर रहकर तत्त्वाभ्यास करें 270
82. ज्ञायक की प्रसिद्धि करने वाला ही ज्ञान है 272
83. ज्ञायक स्वभाव को भूलने पर अपराध हुये 277
84. अनंतज्ञानी आत्मसाधना में तत्पर रहते है 278
85. धर्म परिभाषा नहीं प्रयोग है 282
86. पर-पदार्थों के परिणमन के लिये जीव शक्तिहीन है 283
87. जगत की सब व्यवस्था व्यवस्थित है 285
88. तत्त्वज्ञान का फल तो अनंत शान्ति है 286
89. जैनधर्म तो पराश्रय छोड़ने रूप है 287
90. धर्म धारण करने की वस्तु है 289
91. निर्बन्ध की ओर जाना ही पुरुषार्थ है 293
92. पुण्य का आराधक, आत्मा का विराधक है 296
93. जिनवाणी ही एकमात्र अवलम्बन है 297
94. स्वभावदृष्टि वाला निर्भय, निश्चिंत रहता है 299
95. क्रमबद्ध पर्याय की सच्ची प्रतीति किसे? 301
96. अनादिनाथ के आश्रय से आदिनाथ बनें 304
97. पुरुषार्थ नहीं, कर्तृत्व का निषेध 305
98. पर्याय की चिन्ता व्यर्थ ही है 308
99. आत्महित के मार्ग में अग्रसर होना 310
100. अपनी भावना विशुद्ध रखो 314
101. होड़ फैशन-भोगों में नहीं आत्माराधना में करो 317

इसी पुस्तक से -

हम तो उन प्रभु के अनुयायी हैं, जो पर की ओर देखते ही नहीं। उन गुरुओं के भक्त हैं, जो पर सहाय की वांछा से रहित हैं। उस जिनवाणी माँ के सपूत हैं, जो स्वावलम्बन सिखाती है। (पृष्ठ संख्या-14)

‘यह पर्याय कैसे मिली और कैसे छूटेगी?’-इन दुर्विकल्पों में न उलझकर, ‘यह पर्याय है, सो मैं नहीं’- ऐसे भेदविज्ञान पूर्वक ज्ञानानुभूति करना ही श्रेयस्कर है। (पृष्ठ संख्या-30)

अहो! निज की महिमा से अधिक, किसी की महिमा आवे, तब तक मिथ्यात्व है। जब तक परमात्मा और अपने में कोई अन्तर दिखे तब तक पर्यायदृष्टि है; जो अतीन्द्रिय आनन्द में बाधक है। (पृष्ठ संख्या-107)

ज्ञान का विषय आज तक संयोग, पर्यायें एवं भेदादिक ही बने हैं। अब ज्ञान का ज्ञेय अखण्ड रूप से स्व तत्त्व को बनाना ही, कल्याण का उपाय है। (पृष्ठ संख्या-110)

अहो! समय वही सार है, जो समयसार की आराधना में लगे। वांचन, चिन्तन, लेखन, ज्ञान, ध्यान आदि भी वही सफल है, जिनका विषय एकमात्र ध्रुव ज्ञायक तत्त्व है। (पृष्ठ संख्या-113)

याद रखो! बाह्य में होड़ लगाने से आत्मोत्थान नहीं, अपितु आत्मपतन ही होगा। होड़ फैशन तथा भोगों में नहीं, अपितु आराधना में ही लगाना। (पृष्ठ संख्या-320)


1

।। शुद्ध चिद्रूपोऽहं।।
धर्मानुरागी साधर्मीजन,
सविनय निष्काम यथायोग्य…।
अहो ! निर्बन्ध स्वरूप की आराधना के मार्ग में, जब पर के साथ, ज्ञेय-ज्ञायक सम्बन्ध भी परमार्थ से नहीं है, तब बोध्य-बोधक सम्बन्ध के लिये अवकाश कहाँ? ज्ञायक तो, ज्ञायक ही है। निरपेक्ष, स्वयं में ही परिपूर्ण, आनंदमय, प्रभुता सम्पन्न…।

आपका पत्र आया, कार्यक्रम क्या लिखूँ? विकल्प मात्र अकिंचिल्कर है, परिणमन तो अत्यंत स्वाधीन है।

भाई! कार्यक्रम बनाना नहीं है, अपितु सहजपने बने हुये कार्यक्रम को, सहजपने स्वीकार कर, ज्ञाता ही रहना है।

अहो आत्मन्! भावना तो होती है, सभी जीव, निज परम पावन तत्त्व की आराधना करते हुये, निज पद को पावें, परन्तु जिनशासन की प्रभावना हेतु जैसी गम्भीर गुरुता चाहिये उसका व्यक्त पर्याय में अभाव देखकर, शांत रहना ही श्रेयस्कर लगता है।

अतः बहिरलंक्षी विकल्पों को त्यागकर, स्वानुभव एवं स्वरूप मग्नता का अभ्यास ही श्रेष्ठ है।

पत्रों में विशेषण या प्रशंसा न लिखा करें। सभी साधर्मीजनों को जय जिनेन्द्र।
(मऊ से महरोनी, दिनांक 17-04-1990)


2

।। शुद्ध चिद्रूपाय नमः।।
धर्मानुरागी बन्धुजन,
निष्काम यथायोग्य।
आप सबका उत्साहपूर्ण आग्रह होने पर भी कार्यक्रम न बन सका, सो खेद नहीं करना और न निराश होना। धर्माराधन तो अत्यंत निरपेक्ष भाव से ही होता है।
अतः भवितव्य का विचार कर, समतापूर्वक तत्त्वाभ्यास में उद्यमी रहना। विचार करना कि जब प्रशस्त राग भी निस्सार है, आकुलतामय है, तो अप्रशस्त राग सुखमय कैसे होगा? जब साधर्मीजन ही शरणभूत नहीं हैं, तो लौकिक जन कैसे शरणभूत होंगे?वास्तव में सर्व ओर से दृष्टि हटाकर, अन्तर्मुख होना ही श्रेयस्कर है।
अहो! पंचेन्द्रिय भोगों से युक्त, गृहस्थ मार्ग में तो, सुख की कल्पना ही दावानल के समान भयावह है।

धन्य हैं वे ज्ञानी! जिन्होंने इस जंजाल को स्वीकार ही नहीं किया। समस्त जीवन तत्त्व की आराधना में समर्पित कर, निजपद को पा लिया। हमें भी समस्त दुर्विकल्पों को छोड़कर, आनंद एवं उल्लास पूर्वक, स्व के बल पर, निवृत्ति के मार्ग में अग्रसर होना ही श्रेयस्कर है।

भाई! उपादान की योग्यता के अनुसार, निमित्त भी सहज ही बनते जायेंगे और फिर हमें निमित्तों की अपेक्षा ही क्या? सम्यक्त्व से लेकर, सिद्धपद तक प्राप्त करने की पूर्ण सामर्थ्य स्वयं में है। परलक्ष्य से तो, संसार भ्रमण का कारण रूप विभाव होता है। स्वाभाविक परिणमन तो निरपेक्ष, स्वाधीन एवं सहज होता है।

अरे! संयोग नहीं है, तो हमें संयोगों की आवश्यकता ही क्या है? विकल्पों से बस हो।
ब्रह्मचर्य के मार्ग में, परलक्ष्य से विकल (व्याकुल) होने के लिये अवकाश ही कहाँ? नि:शंक हो, स्वरूप रमणता का पुरुषार्थ करें।

हम तो उन प्रभु के अनुयायी हैं, जो पर की ओर देखते ही नहीं। उन गुरुओं के भक्त हैं, जो पर सहाय की वांछा से रहित हैं। उस जिनवाणी माँ के सपूत हैं, जो स्वावलम्बन सिखाती है। (जसवंतनगर से रानीपुर)


3

।। शुद्ध चिद्रूपोऽहं।।
भो आत्मन्!
स्वयं-स्वयं में तृप्त रहते हुए आनन्दमय ब्रह्मचर्य को आनंद पूर्वक धारण करें, क्योंकि चैतन्य विलास कोई अद्भुत, वचनातीत, अचिन्त्य, आनन्दमय है; पर से किंचित् भी अपेक्षा नहीं। विश्व का परिणमन चाहे जैसा होवे, मुझे क्या? मैं तो स्वयं में ही पूर्ण हूँ, स्वयं में ही संतुष्ट हूँ; अनंतकाल तक किसी की आवश्यकता ही नहीं है।

अरे! विकल्प तभी तक आते हैं, जब तक ज्ञान, ज्ञान में प्रतिष्ठित नहीं होता। ज्ञानमय निर्द्वन्द्व स्वरूप में मग्नता होने पर, राग-द्वेष का द्वन्द्व, स्वयंमेव शांत हो जाता है। इसके अतिरिक्त सुख-शांति का कोई अन्य उपाय ही नहीं है।

भो आत्मन्! पराश्रय पूर्वक होने वाली आकुलता, पराश्रय से कैसे दूर होगी? स्वरूप विश्रान्ति होने पर, इच्छाओं का सहज अभाव होता है, क्योंकि इच्छाओं की पूर्ति न तो किसी के हुई है, न होते दिखाई देती है और न होगी।

यदि एक बूंद की आशा में अटके रहे, तो भव कूप में पतन निश्चित है। स्वभाव सन्मुखता होने पर, सहज पूर्णता का अनुभव होता है। अनंत प्रभुता प्रत्यक्ष दिखाई देती है, कुछ करने का अवकाश ही नहीं दिखता।

अरे! आत्मध्यान के अतिरिक्त शेष सब घोर संसार का मूल है— ऐसे श्रद्धान पूर्वक कहीं भी सन्तुष्ट होना उचित नहीं, क्योंकि पढ़ना, सुनना, सत्समागम, वंदना, यात्रा, व्रत, उपवास, संयम, बाह्य निवृत्ति यथायोग्य होती है, तत्सम्बन्धी विकल्प भी होते हैं; परन्तु ज्ञानी को भेदविज्ञान रहता है कि ये सब आश्रव-बन्ध तत्त्व के अन्तर्गत आते हैं।

इसीप्रकार सम्यग्दर्शन, ज्ञान, आंशिक शुद्धता, वृद्धिंगत होने पर भी उनके प्रति ज्ञानी को सहज उपेक्षा ही वर्तती है। कहीं भी अटक नहीं होती।

अरे! दशा की अपेक्षा भी पूर्ण शुद्धता रूप मुक्ति दशा ही साध्य है, परन्तु ध्येय वह भी नहीं, ध्येय तो निज परिपूर्ण सहज परमात्मा ही है।

वास्तव में पर का वियोग दुःख का कारण नहीं, स्वरूप का विस्मरण, दुःख का कारण कहो तो कहो। पर के वियोग को दुःख का कारण मानना तो कारण विपर्यय है।

यदि पर के वियोग को दुःख का कारण मानें, तो उसका संयोग मिलाने की आकुलता ही मिलेगी और संयोग मिलना तो अपने अधीन है नहीं, तब दुःख दूर करने में पराधीनता ही रही, परन्तु स्वरूप की विराधना को दुःख का कारण मानने पर, स्वरूप की ओर दृष्टि एवं पुरुषार्थ होने से सहज दुःख दूर हो जाता है।

भाई! कौन किसका उपकार करे? समस्त परिणमन स्व-योग्यतानुसार ही होता है। एक परिणमन में अन्य का अभाव है— ऐसा परमार्थ स्वरूप विचार करने पर ही, पर की ओर से होने वाले विकल्प टूटते हैं।

अहो! सम्यक्ज्ञान, सुख आदि की प्राप्ति तो स्वाश्रय पूर्वक, स्व-योग्यता से ही होती है—ऐसा जानकर ज्ञानी को तो स्वरूप मग्नता का ही उद्यम वर्तता है अथवा यह भी कथन मात्र व्यवहार है। स्वरूप की महिमा ही प्रतिसमय वर्तती है। अत: संयोगों और पर्यायों की अनित्यता को सहजपने स्वीकार करते हुए, नित्य निरंजन, चित्स्वरूप की शरण लेना ही श्रेयस्कर है, क्योंकि एक शुद्धात्मा का ही हमसे कभी वियोग नहीं होगा, अत: उसके आश्रय से, कभी दुःख का प्रसंग भी नहीं बनेगा, इसलिए निरन्तर स्वानुभव के उद्यमी रहें। स्वानुभव होने पर स्वरूप मग्नता का ही उद्यम श्रेयस्कर है, यही जिन-आज्ञा है। इसका पालन हो, इससे भिन्न कुछ भी कहने का भाब मुझे स्वप्न में भी नहीं है।

अहो! परमार्थ से तो गुरु-शिष्य विकल्प होता ही नहीं। सद्भूत व्यवहार से शुद्धात्मा ही गुरु है। असद्भूत व्यवहार से गुरु निर्ग्रन्थ ही होते हैं। अतः मेरे प्रति गुरु जैसा व्यवहार मुझे अच्छा नहीं लगता। मात्र साधर्मी जैसा व्यवहार रखें। हम सब एक ही मार्ग के पथिक हैं। मात्र शुद्धात्मा ही हमारा श्रद्धेय है, ध्येय है, स्वज्ञेय है। शुद्धात्मा की विराधना न हो, आराधना निरन्तर वृद्धिंगत होती हुई, पूर्णता को प्राप्त होवे- ऐसे विकल्प भी हेय हैं, तब अन्य विकल्पों की क्या कथा?

निज शुद्धात्मा का ही सेवन करें, यही सेवा कार्य है। आत्मा के आनंद का अनुभव करते हुये सदा आनन्दित रहें। मेरा तो किसी के लिये कोई आदेश कभी नहीं है, यही सलाह है सबके लिये कि स्वरूपदृष्टि पूर्वक बाह्य प्रवृत्ति भी आगम के अनुकूल हो, रागादि या प्रमाद का पोषण करने वाली नहीं होना चाहिये। जिसप्रकार अंतरंग निर्मलता बढ़ती रहे, वही योग्य है। स्वलक्ष्य पूर्वक तत्त्वाभ्यास में सावधान रहते हुये, स्वानुभव का उद्यम करें।
(अमायन से बानपुर, दिनांक 30-03-1987)


4

।। शुद्ध चिद्रूपोऽहं।।
धर्मानुरागी साधर्मीजन,
आनन्दमय तत्त्व की आनंदपूर्वक आराधना करें, क्योंकि स्वानुभव ही जीवन है तथा स्वभाव का विस्मरण तो मरण ही है, इसीलिये मिथ्यादृष्टि को चलता फिरता मुर्दा कहा है।

अरे! बाह्य वैभव की आसक्ति में निरन्तर पाप करता हुआ, यह जीव एक क्षण में उसे छोड़कर, उस पाप का फल भोगने के लिये, नरकादि कुगतियों में चला जाता है। यदि वह एक बार भी आत्मीक वैभव की ओर देखे तो निहाल हो जावे। अनंतकाल के लिये कृतकृत्य हो जावे।

अहो! अतीन्द्रिय ज्ञान ही ज्ञान है। अतीन्द्रिय सुख ही सुख है। अतीन्द्रिय आत्मीक वैभव ही वैभव है। अतीन्द्रिय प्रभुता ही प्रभुता है। अपने अतीन्द्रिय स्वभाव का अनुभव करते हुये आनंदित रहने में सहज ही धर्मध्यान होता है। बाह्य इन्द्रियजनित विषय, वैभव, शरीर, प्रतिष्ठा आदि में झूठी इष्टपने की कल्पना करके सुख मानने से तो रौद्रध्यान ही होता है।

भाई! तृप्ति तो स्वरूप में ही सम्भव है। पर में तो तृष्णा ही मिलेगी। पराश्रित जीव तो न कभी तृप्त हुआ और न होगा। सचमुच पराश्रय से जीवन की कल्पना ही मिथ्या है।

स्वभाव से ही सुखमय आत्मा को सुख के लिये किसी अन्य की आवश्यकता बिल्कुल नहीं।

अहो! संयोग का एक दिन वियोग होगा, यह तो स्थूल कथन है। वास्तव में तो संयोग के काल में ही संयोग का आत्मा में अत्यंताभाव है।

विशेष क्या? निरन्तर स्वलक्ष्य पूर्वक तत्त्वाभ्यास में सावधान रहते हुये, स्वानुभव का उद्यम रखना।
(अमायन, दिनांक 09-04-1987)


5

।। श्री वीतरागाय नमः।।
धर्मानुरागी साधर्मीजन,
निष्काम यथायोग्य।
आपका भावनापूर्ण पत्र आज ही प्राप्त हुआ। आप भावना को सफल करने के लिये, अन्तर्मुखी उग्र पुरुषार्थ करें। तत्त्वाभ्यास निरन्तर करते रहें।

हे भाई! संयोगों की भिन्नता का सम्यक्ज्ञान भी स्वभाव के लक्ष्य से होता है। अतः सर्वप्रथम यह श्रद्धान करें कि मैं सर्व परद्रव्यों एवं परभावों से भिन्न, ज्ञानमात्र ज्ञायक हूँ। स्वयं में परिपूर्ण हूँ। मैं स्वभाव से ही आनंदमय हूँ। न तो पर में से सुख आना सम्भव ही है और न मुझे आवश्यकता ही है।

अहो! अपनी प्रभुत्व शक्ति से, मैं शाश्वत प्रभु हूँ। बाह्य वैभव से मेरी प्रभुता नहीं है। बाह्य वैभव के प्रति प्रीति ही वास्तव में अनंत दुःख का ही कारण है। बार-बार विचारना।

अति दुर्लभ यह अवसर, स्वयं में, समर्पण होने पर ही सफल होगा। जब तक संयोगों के प्रति समर्पण भाव रहेगा, तब तक निरन्तर आकुलता ही रहेगी।
अतः सदैव परिवार आदि सम्बन्धी मोह छोड़कर, अपने परम इष्ट वीतराग देव-शास्त्र-गुरु की सम्यक् प्रतीति सहित उनके द्वारा दर्शाये मार्ग का अनुसरण करें।


6

।। श्री वर्द्धमानाय नमः।।
धर्मानुरागी आत्मन्,
निष्काम यथायोग्य।
शुद्धात्मा का आश्रय करने पर, समस्त दोषों का परिहार सहज ही होता है, क्योंकि शुद्धात्मा परम निर्दोष तत्त्व है। परदृष्टि तो स्वयं दोषरूप है तथा सब दोषों को ही उत्पन्न करने वाली है। अतः स्व-पर भेदविज्ञान मूलक आत्मानुभूति ही, समस्त धर्म का मूल है तथा भेदविज्ञान ही निरन्तर भाने योग्य है। यह प्रेरणा जीवन में सार्थक हो अर्थात् भेदविज्ञान के अभ्यास द्वारा हम शीघ्र अपने साध्य को प्राप्त होवे, यही भावना है।

आपके कई पत्र आये, परन्तु पत्रोत्तर देने का योग नहीं बना। आप किसी प्रकार की उपेक्षा नहीं समझना और न ही खेद खिन्न होना।

कार्य का नियामक कारण तत्समय की योग्यता ही है; विकल्प तो उसमें अकिंचित्कर ही हैं। अतः बाह्य व्यवस्था सम्बन्धी समस्त विकल्पों को, भवितव्य का विचार कर निरर्थक ही समझना तथा निरन्तर आराधना में, उत्साह पूर्वक समर्पित होना ही श्रेयस्कर है।

अरे! दुर्लभ जीवन का एक-एक क्षण, एक मात्र स्वयं के लिये लगे, दूसरा कुछ करने योग्य दिखे ही नहीं, तब आकुलता के लिये अवकाश ही नहीं है। सहज आनंद ही आनंद है। सभी साधर्मीजनों को यथायोग्य।
(अमायन से महरोनी, दिनांक 10-10-1992)


7

धर्मानुरागी आत्मार्थीजन,
निष्काम यथायोग्य ।

परिग्रह चेतन हो या अचेतन, दुःख का ही निमित्त है। परिग्रह से सुख की कल्पना मिथ्या है। सुख का तो एक ही यथानुभूत उपाय है- ज्ञानानन्दमय स्वभाव की आराधना। अन्य विकल्पों को तो मोहमय ही जानना चाहिये।

विचार करें तो विश्व में कहीं भी, विकल्प के लिये अवकाश ही कहाँ है? सदाकाल, असहाय, स्वाधीन परिणमन हो रहा है; अतएव विकल्पों के होने पर भी विकल्प निरर्थक ही हैं।

आचार्य श्री अमृतचन्द्र स्वामी ने परम सत्य ही कहा है कि ‘विकल्प मात्र अपने अनर्थ के लिये ही है।’

परभाव का पर में व्यापार न होने के कारण, विकल्पों की पर में क्या उपयोगिता? अतः मात्र अपने अनर्थ के बीजभूत दुर्विकल्पों से बस ही होओ।

तत्त्व भावना के बल से, स्वयं में, स्वयं ही तृप्ति एवं तुष्टि का पुरुषार्थ करें। स्वाश्रय से ही, स्वाधीन सुख की प्राप्ति, सहज संभव है। इसी लक्ष्य पूर्वक स्वाध्याय आदि करें, तभी कुछ सार्थकता है। सभी साधर्मीजनों को यथायोग्य।


8

।। शुद्ध चिद्रूपाय नमः।।
भो आत्मन्!
स्वयं, स्वयं में तृप्त रहो।
अहो! जिसे शुद्धात्म स्वरूप की महिमा एवं उसकी प्राप्ति की सहज विधि दर्शाने वाला पवित्र जिनागम और जिनशासन मिला, वह महा भाग्यवान है।

परमार्थतः तो सहज सुख स्वरूप भगवान् आत्मा एवं आत्मदृष्टि में इष्ट-अनिष्ट की कल्पना ही उत्पन्न नहीं होती। जैसे-यात्रा के कष्टों से छूटने का एकमात्र उपाय घर में ही संतुष्ट रहना है। वैसे ही आत्म तिरस्कारी विपरीत कल्पनाओं से उत्पन्न दुःख से छूटने का उपाय सम्यक् तत्त्वाभ्यास ही है।

वस्तुतः त्रिकाल, एकरूप शुद्धात्मा के लिये तो कोई दुःख का कारण न होने से, अनिष्ट भी नहीं और सुख का कारण न होने से इष्ट भी नहीं, परन्तु व्यवहार से भी मोह-रागादि परिणाम दुःखमय होने से अनिष्ट एवं सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र रूप परिणाम सुख के कारण होने से इष्ट कहे जाते हैं।

अहो! जीव मुक्त हुए हैं, हो रहे हैं और होंगे, वह सब भेदज्ञान का ही फल है। भेदविज्ञान पूर्वक ही, स्वरूप में मग्नता रूप सम्यक्चारित्र भी सहज ही होता है और कर्मों के उपशमादि भी स्वयंमेव होते हैं।

अहो! संसार का स्वरूप ही ऐसा है कि उसका यथार्थतया विचार करें तो घबराहट हुये बिना न रहे, परन्तु उसी समय स्वभाव की ओर देखे तो, सहज तृप्ति एवं समाधान मिलता है एवं संसार से वास्तविक उदासीनता होती है।

अरे! स्वरूप के अतिरिक्त ऐसा कौन-सा स्थान है, जहाँ अनंतकाल स्थिर रह सकें? संयोग, संयोगी भावादि, वे स्वयं क्षणभंगुर हैं, परन्तु संयोगों के लक्ष्यपूर्वक उत्पन्न विपरीत विचारों के कारण होने वाली आकुलता, स्वभाव सन्मुख होकर, द्रव्य स्वभाव का विचार करने पर सहज ही विलय हो जाती है। जैसे- ‘मुझे छूटना है’- ऐसी आकुलता दूर करने का उपाय ‘सहज मुक्त हूँ’- ऐसा विचारकर सहज मुक्त स्वभाव का अनुभव करना ही है। संयोग एवं पर्यायों के कर्त्तृत्व से तो आकुलता में वृद्धि ही होगी। जैसे- नारकी जीव, नरक से निकलकर, सुखी होना चाहे तो आयु पूर्ण हुए बिना कैसे निकले?

संक्लेश परिणामों से अधिक दुःखी ही होगा, परन्तु अन्तर्मुख होकर मैं परमानंदमय ज्ञायक भाव हूँ, नारक पर्याय मैं नहीं, मैं तो अमूर्तिक हूँ, मुझमें शीत, उष्ण, दुर्गन्धादि कहाँ? मैं अपने ज्ञान से ज्ञान को जानता हूँ। अहो! मेरे जानने में ज्ञायक ही आ रहा है। मैं तो ज्ञायक ही हूँ, स्वयं में पूर्ण तृप्त प्रभु हूँ- इत्यादि विचार करता हुआ, इन निश्चयाश्रित विकल्पों से भी मुक्त हो, सहज आत्मा की अनुभूति को प्राप्त हुआ, सिद्ध प्रभु जैसे ही अतीन्द्रिय, स्वाधीन, आनन्द को ही वेदता है।

बेड़ियों से जकड़ी हुई सती चन्दनबाला ने भूखी-प्यासी तलघर में पड़े होने पर भी, आर्त्त ध्यान नहीं किया, अपितु सम्यक् तत्त्व विचार से, वहाँ भी आनंद का ही वेदन किया। शारीरिक दशा भले ही दुर्बल हो गई हो, परन्तु वहाँ भी धर्माराधना में सहज सावधान रही; फलतः स्वयं ही वहाँ से मुक्त हुई। उसकी अन्तर योग्यता थी, तो बाह्य में भी तीर्थंकर महावीर का सहज सुयोग मिल गया। अतः धैर्य पूर्वक स्वभाव की आराधना एवं संयोग की द्वेष रूप नहीं, अपितु सहज उपेक्षा ही योग्य है।

अहो! अपना पुरुषार्थ, अपने में ही चलता है, बाह्य में किंचित् भी नहीं। अतः परिस्थिति बदलने की आकुलता नहीं, अपितु मनःस्थिति बदलने के लिये, सम्यक् तत्त्वाभ्यास रखना योग्य है, क्योंकि संयोगादि तथा परलक्षी लौकिक ज्ञान तो दूर, आगम ज्ञान भी ग्यारह अंग नौ पूर्व का, इस जीव ने बहुत बार किया, परन्तु भेदविज्ञान पूर्वक, एकत्व-विभक्त आत्मा को नहीं अनुभवा, अतः मात्र मंदकषाय से ग्रैवेयक तो गया, परन्तु तृप्ति नहीं मिली।

अरे! ज्ञेय तो अनंत हैं, अतः ज्ञेयों को तो क्रमशः जाने, तो अनंतकाल में भी नहीं जान सकते और ज्ञायक को जानने से वंचित रहा, तो अनन्तकल दुःख में ही व्यतीत होगा।
अतः ज्ञेयलुब्धता को छोड़कर, ज्ञायक का ज्ञानकर, वहीं स्थिर होने का पुरुषार्थ करना योग्य है; नहीं तो हमारी दशा उस पथिक की तरह हो जायेगी, जो दिन भर शहर में घूमता रहा, परन्तु अपना विश्राम घर नहीं देखा, अतः रात्रि भर सर्दी में बाहर ही भटकना पड़ा। जैसे कहीं भी घूमें, परन्तु विश्राम तो निजघर में ही मिलता है, वैसे ही चाहे कुछ भी जान लेवे, परन्तु सुख तो निज को जानने पर ही मिलता है।

अहो! जैसे सहज जानने में आवे तो अलग बात है, परन्तु रुचि पूर्वक जैसे- शीलवती स्त्री को पर पुरुष को देखने का उत्साह नहीं होता, उसीप्रकार जिसे एक निज आत्मा के अतिरिक्त, समस्त पर-पदार्थों को जानने का उत्साह भी निवृत्त हो जाय, वही सम्यज्ञानी है। उसे ही सच्ची निवृत्ति हुई है।

यदि स्वभाव दृष्टि है, तो कहीं भी दुःख नहीं और स्वभाव दृष्टि के बिना कहीं भी सुख नहीं। अतः अपना सुख, जब अपने ही पास है, तो अपने से ही मिलेगा। अपने में ही मिलेगा। साक्षात् परमात्मा भी ‘‘सुख आत्मा में ही है’’- ऐसा संकेत ही करेंगे, जबकि जगत् के मोही जीव तो तुझे आत्मा के विस्मरण में ही निमित्त होंगे।

अहो! इच्छा ही दुःख का कारण है, तब पर को जानने की इच्छा, सुख का कारण कैसे हो सकती है? अरे! आत्मज्ञान के बिना, स्वयं में तृप्त हुये बिना अब इसको जानूँ… अब इसको जानूँ…-ऐसी तृष्णा उसीप्रकार बनी रहती है, जैसे- घर मिले बिना पथिक को एक गाड़ी से दूसरी गाड़ी पकड़ने की आकुलता।

विशेष क्या? ज्ञेय लुब्धता का परित्याग कर, स्वानुभव एवं स्वयं में स्थिरता का पुरुषार्थ ही श्रेयस्कर है। ‘यह पर्याय कैसे मिली और कैसे छूटेगी?’- इन दुर्विकल्पों में न उलझकर, ‘यह पर्याय है, सो मैं नहीं’- ऐसे भेदविज्ञान पूर्वक ज्ञानानुभूति करना ही श्रेयस्कर है।

**अहो! संसार में जितने भी दुःख हैं, वह तत्त्व के अनादर का फल हैं और समस्त ज्ञानीजन, तत्त्व की आराधना करते हुये, वर्तमान में भी सुखी रहते हैं तथा अविनाशी मुक्ति सुख को भी शीघ्र पाते हैं।

अतः जगत् प्रशंसा करे या निंदा, जीवन रहे या जावे, अनुकूलता हो या प्रतिकूलता, हर हालत में तत्त्वाभ्यास पूर्वक यही सावधानी रखना है कि तत्त्व की किंचित् भी विराधना न हो।

समस्त सुख का जनक वैराग्य है और वैराग्य का मूल आत्मज्ञान है। जीवन में यथायोग्य, सदाचरण पूर्वक, तत्त्वाभ्यास करने में सतत् उद्यमी रहे।

आत्मा ही, आत्मा का गुरु है। जो तुझे चाहिये, वह तुझमें ही मिलेगा। ऐसा कुछ भी साध्य नहीं, जिसके लिये बाहर भटकना पड़े। अतः आत्मा ही प्रभावनीय है।

(अमायन, दिनांक 01-01-1987)


9

धर्मानुरागी आत्मन्,
शीघ्र, स्वयं स्वयं में, तृप्त हों।

तत्त्व की प्राप्ति तो स्वयं में, सदा ही सुलभ है। मात्र बहिर्दृष्टि से देखने के कारण ही, दुर्लभ प्रतीत होती है। तात्पर्य यह है कि तत्त्व की प्राप्ति जब सहज एवं सुलभ है—ऐसा लगे तभी समझना, पुरुषार्थ की दिशा सही है। रही संयोगों की दुर्लभता, सो सत्य तो यह है कि संयोग भी, अंतरंग (उपादान) की योग्यता होने पर, सहज ही मिल जाते हैं। उधर का विकल्प आ जाने पर भी व्यर्थ ही जानना। मुझे तो ऐसा ही भाव आता है कि सभी अन्तस्तत्त्व को पाकर, अंतर में ही समा जावें। विकल्पों से बस हो।
(राघोगढ़, दिनांक 10-06-1988)


10

।। शुद्ध चिद्रूपोऽहं।।
धर्मानुरागी बन्धुवर,
सहज तत्त्व का सहजपने अनुभव करें।

संयोग अनित्य हों तो भले हों, पर स्वभाव तो अनित्य नहीं है। अहो! नित्य शुद्ध, चिदानन्दमय सम्पदाओं की खान स्वरूप भगवान् आत्मा के रहते हुए, मुझे संयोग से क्या? संयोग के काल में भी, ज्ञान सुख की प्राप्ति तो, स्वभाव के आश्रय पूर्वक, निरपेक्षपने होती है। अहो! मेरे स्वरूप में, संयोग का सदाकाल वियोग (अभाव) है। संयोग शब्द ही भिन्नता का सूचक है।

भाई! निमित्त का चमत्कार (कर्त्तृत्व) देखना तो मोहदृष्टि है। वह तो वस्तु का, सहजपने होने वाला परिणमन मात्र है। देखने योग्य चैतन्य का चमत्कार ही है, जो सदा एकरूप है, परम आनन्दरूप है, अनुपम है। ज्ञानमात्र होते हुये भी अनेकान्तमय है, सहज है, स्वाधीन है। अधिक क्या कहें? वचनातीत है, अचिन्त्य है, बस है सो है, वह तो वही है।

देखो! भाग्यशाली वे नहीं, जिन्हें निमित्त मिले हैं, अपितु धन्य वे हैं, जिन्हें निमित्त की आवश्यकता ही प्रतीत नहीं होती तथा मिलने के काल में भी, स्वभाव की अपेक्षा पूर्वक, सहज उपेक्षा ही वर्तती है।

वस्तुतः आत्मा को, आत्मा ही उपादेय है, यही बात परम सत्य है। संयोगों की क्षणभंगुरता, यदि वास्तव में भासित होवे तो, नित्य स्वभाव के उग्र अवलम्बनपूर्वक, वैराग्य जाग्रत होता है। वह जीव- ‘संयोग मुझे छोड़े, उससे पहले ही मुझे संयोग को छोड़ देना श्रेयस्कर है’- ऐसा विचार करता हुआ ज्ञान आनन्दमय शुद्धात्मा की ओर अग्रसर होता है।

संयोगों में एकत्व पूर्वक संयोगों को जानना तो दुःख का कारणरूप अज्ञान ही है। स्वभाव के लक्ष्य पूर्वक संयोग का भिन्नपने ज्ञान होना ही सम्यग्ज्ञान है।
विशेष क्या? निरन्तर स्वानुभव का पुरुषार्थ रखना।
(अमायन से महरोनी, दिनांक 20-04-1987)


11
धर्मानुरागी साधर्मीजन,

भाई ! अपने प्रयोजन की सिद्धि का साधन भी अपने में ही है। संयोगों के लक्ष्य से राग होगा, चंचलता होगी, आकुलता ही होगी; जबकि शांति, स्थिरता, समता तो स्वाश्रय से ही होगी। अतः वस्तु का स्वरूप, सम्यक् प्रकार स्वीकार करके, सतत स्वयं में, सावधान रहने में ही पुरुषार्थ है। विकल्प हो जाना तो अस्थिरताजन्य दोष है, परन्तु बुद्धिपूर्वक विकल्प करना, उनकी पूर्ति के लिये आकुल-व्याकुल होना, विकल्पों की पूर्ति में हर्ष मानना मिथ्या है।

अहो ! छटपटाहट होना अलग बात है, पुरुषार्थ होना अलग बात है; इसलिए स्वभाव की सामर्थ्य का विचार कर, बारम्बार स्वभाव की भावना भाओ। स्वभाव की आराधना होने पर, छूटने योग्य कामादिक परभाव सहज ही छूट जाते हैं और प्रगट होने योग्य स्वभाविक ज्ञान, आनंद, वीतरागता, प्रभुताद ही सहज ही प्रगट हो जाते हैं।

अतः मात्र निवृत्ति की भावना ही नहीं, अपितु निवृत्ति के लिये निवृत्ति स्वरूप, शुद्ध चिद्रूप की भावना भाना श्रेयस्कर है। जैसे- अस्वस्थ व्यक्ति को, मात्र स्वास्थ्य लाभ का चिन्तन ही नहीं, अपितु स्वस्थ हूँ ऐसी भावना की सलाह दी जाती है, वैसे ही ज्ञानीजन हमें निरन्तर चित्स्वरूप की भावना एवं आराधना की प्रेरणा देते हैं।

विशेष क्या ? निरन्तर स्वभाव में सजग रहें।

(गोरमी से टीकमगढ़, दिनांक 10-03-1989)

12

धर्मानुरागी साधर्मीजन,

अरे ! सत्समागम में भी, कार्य तो अपनी योग्यतानुसार, स्वयं में ही होगा। शान्ति तो अन्तर में ही मिलेगी। ज्ञान तो, ज्ञान में से ही आयेगा, तब फिर विकल्प से क्या लाभ ? परमार्थतः वह विकल्प प्रतिक्रमण करने योग्य है। मात्र असंग की भावना श्रेयस्कर है। सत्संग का विकल्प, भूमिकानुसार आने पर भी, अकिंचित्कर है, आकुलता का ही कारण है।

अतः निरन्तर भेदविज्ञान पूर्वक, विकल्पमात्र का परिहार, अस्वीकार, उपेक्षा करते हुये, स्वयं में तृप्त रहने के लिये उद्यमी रहें। दूसरी बात यह है कि विकल्पों का अभाव करके, स्वाश्रय पूर्वक, सुखी होने के लिये, हम स्वाधीन है, परन्तु विकल्प की पूर्ति होना पराधीन है।

विकल्प होने पर भी, यदि भेदविज्ञान नहीं वर्तता है, पर से लाभ हानि, सुख-दुःख होता हुआ मालूम पड़ता हो तो. समझना कि अभिप्राय में मिथ्यावासना पड़ी है, जिससे राग की पूर्ति में सुख की कल्पना होती है। यद्यपि ज्ञानी को भी विकल्प हो जाते हैं, परन्तु भेदज्ञान वर्तने से, उसे वहाँ उपेक्षा रहती है।

अहो ! सर्वोत्कृष्ट महिमावंत शुद्धात्मा, स्वयं में ही परिपूर्ण, सहज, सदाकाल आनंदमय है। परभावों के लिये अवकाश ही कहाँ है? अनुभूति में ही, सर्व विकल्पों का, सम्यक् समाधान सहज होता है। अतः निरन्तर स्वानुभव के लिये उद्यमी रहें ।

13

।। श्री वीतरागाय नमः ।।

धर्मानुरागी, आत्मार्थीजन,

नित्यानंदमय शुद्धात्मा के आश्रय पूर्वक, सतत् आनंदित रहें।

अरे ! छूटने वाले संयोग एवं पर्यायों में से, ममत्व छूट जाने से, शरण की आवश्यकता ही भासित नहीं होती; क्योंकि अनादिनिधन, सदा ज्ञानानन्द से परिपूर्ण, प्रभुता सम्पन्न, ज्ञायक परमेश्वर, निजपने भासित होने से, सतत् भेदज्ञान से संयोगादि के वियोग के प्रति सहज उपेक्षा वर्तती है।

जगत में, अज्ञानीजनों को भी शरण की कल्पनायें मिथ्या सिद्ध होने पर, विशेषतः तीव्र असाता के उदय में अथवा मृत्यु के सन्मुख उपस्थित होने पर, अशरणपना भासित होता है, परन्तु पर्याय बुद्धि होने से, जब उन्हें बाह्य में कोई शरण नहीं दिखाई देता तो महा आकुलतामय संक्लिष्ट परिणाम होते हैं।

इसके विपरीत, ज्ञानी अन्तरात्माओं को, चैतन्यप्रभु की शरण प्राप्त होने से, आनंदमय ज्ञानधारा वर्तने से, बाह्य में शरण दिखाई न देने पर भी, किसी प्रकार की आकुलता नहीं होती।

अहो ! जिसे मौत है, उसको है, मुझको क्या? जिसे रोग है, उसको है, मुझको क्या? मुझे तो नहीं, फिर भय मुझको क्या? द्रव्यदृष्टि होने पर, वृत्ति भी स्वयमेव, चरणानुयोग के अनुसार होती है। न तो विपरीत होती है और न बोझारूप। फिर भी बुद्धिपूर्वक आकुलता भी न हो और प्रमाद भी न होवे, उस प्रकार निरन्तर, बाह्य से निवृत्ति पूर्वक, स्वरूप में प्रवृत्ति के लिये प्रयास रखे।

जगत की झूठी प्रशंसा, झूठी ही भासित हो और हमारा प्रयत्न, आनंदमय जीवन के लिये, चलता ही रहे-यही हितकर है। निरन्तर स्वानुभव के लिये उद्यमी रहें। निज में ही, पूर्ण स्थिरता की भावना रखें। जगत से गुप्त रहकर, स्वरूप में गुप्त रहने की भावना सहित…।

(जनवरी 1990)

14

धर्मानुरागी साधर्मीजन,

निष्काम यथायोग्य।

भाई ! बाह्य व्यवस्थायें तो पूर्व कर्मोदय के अनुसार सहज बनती हैं। उनके लक्ष्य से विकल्प करना, अपने समय, शक्ति एवं ज्ञान का दुरुपयोग करना ही है। हमें तो आत्महित के मार्ग में अग्रसर होना ही श्रेयस्कर है।

अहो ! अनन्तों भवों में व्यर्थ ही, कर्तृत्व के अहंकार वश, विकल्पों में ही अवसर खोया। आज तो सौभाग्य से, सर्वप्रकार से अवसर मिला है । यथार्थ तत्त्व के स्वरूप श्रवण का सुयोग भी बन गया है। अतः पुरुषार्थ पूर्वक, तत्त्व का सम्यक् निर्णय कर, स्वानुभव प्रगटकर, जीवन को सार्थक कर लें।

अरे! इच्छाओं की पूर्ति तो कभी सम्भव नहीं, अतः तत्त्वविचार पूर्वक, इच्छाओं के अभाव का प्रयत्न करें।

अतः निवृत्ति के मार्ग में, कोई कठिनता या उलझन नहीं है। तत्त्वाभ्यास होने पर, छूटने योग्य वैभाविक भाव, सहज ही छूटते जाते हैं; इसलिये प्रमाद को छोड़कर, अत्यंत भक्ति, विनय एवं महिमापूर्वक, ज्ञानाभ्यास अवश्य करें, परन्तु ध्यान रखें मात्र शास्त्र पढ़ना ही ज्ञानाभ्यास नहीं है, शास्त्र में कहे हुये तत्त्वों का सम्यक्पने विचारकर, तत्त्वनिर्णय, भेदज्ञान करके, स्वयं को ज्ञानमात्र, ज्ञायक रूप अनुभवना ही परमार्थ ज्ञानाभ्यास है।

ज्ञानी, आश्रवों से निवृत्त होता है। ज्ञान, सहज आनंदमय होता है। अतः ज्ञानी का जीवन अत्यंत निष्पाप, निरालंब, शांत, कृतकृत्य होता है। ऐसे ज्ञान का आराधन कर हम सभी परमसुखी होवें। (जसवंतनगर से रानीपुर)

15

धर्मानुरागी साधर्मीजन,

निष्काम यथायोग्य ।

‘एक ज्ञायक भाव ही मैं हूँ।’ - ऐसा मात्र कथन या विकल्प नहीं, अपितु ऐसा अनुभवन ही, आनंदरूप एवं अविनाशी आनंद का हेतु अर्थात् मुक्तिमार्ग है। अतः प्रतिक्षण यही अभ्यास रखें। स्वाध्यायादि, मात्र क्षयोपशम बढ़ाने या जगत में प्रतिष्ठा प्राप्त करने के हेतु नहीं होना चाहिये। निरन्तर भेदविज्ञान के अभ्यास से ज्ञान, ज्ञान में ही प्रतिष्ठित हो, यही लक्ष्य रखना, अन्यथा अटकने व भटकने के अनेक स्थान है।

अरे ! निर्मोही आत्मा से विमुख होने पर, मोह कभी मंद भी दिखाई दे, तो सन्तुष्ट होने की बात नहीं, अपितु मोह के निर्मूलन का उपाय हो । बाह्य निवृत्ति भी मात्र इसीलिये होना चाहिये, अन्यथा स्थूल ब्रह्मचर्य तो क्या, अनन्तबार मुनिव्रत धारण किया, चरणानुयोग के अनुसार, अतिचारों को टालते हुये पालन भी किया, परन्तु स्वयं को ब्रह्मरूप अनुभवन नहीं किया।

ज्ञानी होने के लिये, ज्ञेयों में उपयोग तो भ्रमाया, परन्तु स्वयं को ज्ञान स्वरूप नहीं अनुभवा। सुखी होने के लिये बाह्य में ग्रहण त्याग तो किया, परन्तु सहज सुख स्वरूप स्वयं को नहीं देखा, इसलिये इस अवसर में, प्रथम ही, अधिक से अधिक तत्त्व निर्णय में उपयोग लगावें, जिससे कर्तृत्व का भूत उतर जावे एवं सहज स्वरूप भासित होने लगे। परभावों से शून्य, स्वयं में ही परिपूर्ण, ज्ञान- आनन्द प्रभुता आदि अनन्त शक्ति से सम्पन्न प्रभु भाषित हो।

अरे ! संयोग अनित्य एवं अशरण ही हैं, उनमें सुख की कल्पना भी अत्यन्त भयप्रद है, दुर्ध्यान रूप है, अनेक दुःखों का बीज है, मिथ्या है- ऐसा सर्वज्ञ परमात्मा की वाणी में आया है। आगम में कहा है, युक्ति एवं स्वानुभव से सिद्ध है।

स्वयं को, जब तक ऐसा निर्णय न हो जावे, तब तक सम्यक्पने विचार करो। जब ऐसा भासित हो जावे तो नित्य शरणभूत अथवा जिसमें शरण का विकल्प ही नहीं है ऐसा सहज मंगल स्वरूप, सकल मंगलों के आधारभूत आत्मा की प्राप्ति के लिये, पुरुषार्थ भी स्वयं जाग्रत होगा।

अरे! जब तक संयोगों में सार दिखाई दे, तब तक मात्र आत्मा की चर्चा एवं चिन्तवन ऊपरी ही रह जाते हैं। अतीन्द्रिय ज्ञान ही, ज्ञान है और अतीन्द्रिय सुख ही सुख है, जो आत्मा के आश्रय से सहज प्राप्त होता है। इसके विपरीत इन्द्रिय ज्ञान एवं इन्द्रिय सुख, वास्तव में हेय ही हैं। मात्र आगामी काल में ही दुःख के कारण नहीं, वर्तमान में भी दुःखमय ही है- ऐसा सम्यक् प्रकार निर्णयकर, स्वरूप की आराधना में उद्यमी रहें तथा शीघ्र ही निज स्वरूप की साक्षात् प्राप्ति हो, यही भावना है।

(अमायन से टीकमगढ़, दिनांक 17-12-1991)

16

धर्मानुरागी साधर्मीजन,

निरपेक्ष तत्त्व की आराधना, जगत से निरपेक्ष होकर करो। स्वयं को, अन्तर्दृष्टि पूर्वक, स्वतंत्र अनुभव करो।

अरे ! अनुकूल संयोग जुटाकर, स्वतंत्रता की कल्पना मिथ्या है। जब जड़ पदार्थ भी, स्वतंत्रता पूर्वक परिणमते हैं, तब हम क्यों स्वयं विकल्पों में उलझें?

वस्तु स्वभाव से ही स्वतंत्र है। अतः जब-जब पराधीनता का विकल्प आये, तब वस्तु स्वभाव का विचार करें, तो वह विकल्प स्वयमेव टूट जायेंगे और स्वतंत्रता उन्हीं परिस्थितियों में ही भासने लगेगी।

अहो ! धन्य हैं वे योगीश्वर !! जिन्हें घोर उपसर्गों के काल में भी, कोई प्रतिकूलता या पराधीनता नहीं दिखाई देती है। उसे दूर करने के विकल्प से रहित, दूर होने की प्रतीक्षा से रहित, पर की ओर से अत्यंत उदासीन, स्वयं को निरन्तर मात्र ज्ञायकरूप अनुभव करते हुये, निरपेक्ष तृप्त वर्तते हैं। स्वयं को एकाकी देखना ही सहज है। एकत्व की दृष्टि बिना, बाह्य में एकान्त कहाँ ? सर्वत्र छह द्रव्य हैं।

स्थूलपने, कोलाहलादि की न्यूनता वाला निर्जन वन, तीर्थ आदि मिल भी जायें, तो बहिर्दृष्टि से वहाँ भी शान्ति कहाँ? देहादि का लक्ष्य रहा तो अभाव दिखाई देंगे, भय उत्पन्न होंगे, तब व्यवस्था के नाम पर, वे ही संयोग जुटाने के प्रयास में जुट जायेगा, जिन्हें छोड़कर आया है। यदि वे साधन जुट भी गये, तो तृष्णावश निरन्तर आकुलित रहेगा।

अरे! पुण्योदय प्रबल होने से, अनुकूल कार्य होते भी गये, तो अन्तरंग में मान कषाय पुष्ट करेगा। उन्हीं के लक्ष्य से, कृतकृत्य सा मानेगा। जनसमूह आकर्षित होगा, नाना प्रकार के आयोजन समारोहों में लगेगा। असफलता में क्रोध करेगा, सफलता में मुग्ध होगा। भगवन्तों की स्तुति भूलकर, स्वयं की ही स्तुति सुनकर, प्रसन्न होता रहेगा। बाह्य प्रभावना के नाम पर, आराधना का घात ही होगा। जिनदर्शन करके जिनसाक्षी में, आत्मनिरीक्षण पूर्वक, अन्तर में मग्न होने की भावना का अवसर न रहकर, दूसरों को दर्शन देने, आशीर्वाद देने, सम्बोधन देने में गौरव का अनुभव होने लगेगा।

इसलिये भेदविज्ञान को, मुक्ति का मूल कहा है और जब तक ज्ञान ज्ञान में प्रतिष्ठित न हो, तब तक निरन्तर भेदज्ञान ही भाने की प्रेरणा की है।

अहो ! व्यवहार से भी सुख का आधार धर्म है। धर्म का आधार ज्ञान है, ज्ञान का आधार आत्मा है। अतः सुखी रहने के लिये कुछ चाहिये नहीं, अपितु चाह का अभाव चाहिये और चाह का अभाव स्वभाव के आश्रय (रुचि एवं भावना) से सहजपने होता है।

भो आत्मन् ! अन्तर्दृष्टि से देखो, वर्तमान में ही कोई अभाव या अपूर्णता नहीं है। भगवंतों के दर्शन का फल ही, स्वयं में ही पूर्णता भासित होना है। अहो ! निर्विकल्प अनुभूति ही परम दर्शन है, जो परम तृप्ति रूप है, परमानंदमय है।

धन्य है शुद्धात्मा ! जिसके आश्रय से, असंग का विकल्प टूट जाता है और असंगता भासित हो जाती है। निवृत्ति का विकल्प टूट जाता है और निवृत्ति हो जाती है। निर्विकल्पता, मुक्ति आदि के विकल्प टूट जाते हैं और परम तृप्ति हो जाती है। स्वरूप में लाभ के लिये अवकाश नहीं । स्वरूप का लाभ होना ही परम लाभ है, जिसमें लाभ की आशा ही मर जाती है।

अहो ! सहज परिपूर्ण तत्त्व में, लाभ कैसे सम्भव है? स्थूल व्यवहार में भी पर से लाभ नहीं, अपितु परलक्ष्य से तो हानि ही होती है। सत्संगादि को भी लाभकारी कहने का तात्पर्य, मात्र यही समझना चाहिये कि शुद्धात्म स्वरूप की महिमा को देखकर, चित्त बाह्य से निवृत हो, स्वरूप सन्मुख हो, अन्यथा कोई विशेष लाभ नहीं।

विशेष क्या? भवितव्य को, सहज भाव से स्वीकार करते हुये, व्यवस्था सम्बन्धी चिन्ताओं से निर्मुक्त होकर, आराधना में ही चित्त लगाना श्रेयस्कर है।

जब न तो करने के लिये, विश्व में कहीं कुछ अवकाश ही दिखाई देता है, न पर में कुछ करने की शक्ति ही अपने में दिखाई देती है। फिर विकल्पों से लाभ ही क्या? अरे ! इन विकल्पों से बस हो ! बस हो !!

17

।। सहज तृप्त स्वरूपोऽहं ।।

ज्ञानी भावे भावना, यह संसार असार । यामें सुख किंचित् नहीं, निज ज्ञायक ही सार ।।

सारभूत ज्ञायक तत्त्व के लक्ष्य पूर्वक, सभी साधर्मीजन सुखी होवें ।

अहो ! सारभूत ज्ञायक तत्त्व अखिल विश्व में सर्वोपरि है। ज्ञानीजन, ऐसे सारभूत ज्ञायकतत्त्व का लक्ष्य करके, आनंद की तरंगों से तरंगित हो जाते हैं।

अहो ! आत्मानंद असीम है, अन्दर में भरपूर है। वे महापुरुष तीर्थंकर चक्रवर्ती भी इन तुच्छ पदों का ममत्व तोड़कर, आत्मनिधि को भोगने के लिये जंगल में गये।

अहो ! कितनी निधि होगी अन्दर में ? कैसा वैभव होगा? ये तो उन परमात्माओं के जीवन से ही समझने लायक है।

क्या मिला था उनको ? जिसकी अभिवृद्धि एवं पूर्णता के लिए सबसे विरक्त हो, आत्माराधन में लगे रहे। तीव्र गर्मी-सर्दी, उपसर्ग, परीषह आदि भी उन्हें आत्मस्थिरता से डिगा नहीं सके।

अहो ! यह मार्ग तो आनन्दमय है, सरसतामय है और निवृत्तिरूप है। सभी साधर्मीजनों में वात्सल्यता होना चाहिये। वात्सल्य से ही धर्म शोभायमान होता है, धर्म की प्रभावना होती है। एक मुक्ति मार्ग के पथिक साधर्मी को अन्य साधर्मी जनों से वात्सल्य होता ही है। साधर्मियों से मिलकर हृदय हर्षित होता है।

आज का साधर्मी तो, भावी भगवान है। दान के प्रसंग में भाव दीपिका जी ग्रंथ में आया है कि ‘साधर्मी के अर्थ, प्राण देने का प्रसंग बने, तो दे देना।’ भगवती आराधना ग्रंथ में भी आया है कि “अपने संयम की रक्षा आँख के समान करना और साधर्मी की सेवा एवं पोषण अपने शरीर के समान करना।” अरे ! ऐसा तो ज्ञानी का व्यवहार होता है, तब परमार्थ कैसा होगा? विचारें।

परमार्थ धर्मी को भी मत भूलना। अपना धर्मी कौन ? अनन्तगुणों का समूह, अपना निज शुद्धात्मा, वह अपना धर्मी है। सदा उसकी सेवा करना।

अहो ! इस आनन्दमय मार्ग में, अगर हमें शुष्कता लगती है, तो सरसता कहाँ लगेगी? भोगों का मार्ग तो सरासर पाप का, दुःख का मार्ग है।

अरे ! आत्मा अपने ही आत्मिक रस से, शांत रस से, परिपूर्ण परम सरस है, मात्र दृष्टि देने की देर है। स्वरूप दृष्टि बिना तो, पाप भी नहीं छूटते और आत्मदृष्टि पूर्वक, इस मार्ग में आने से तो, पुण्य भी सहज में ही छूटते जाते हैं और पुण्य पाप से रहित वीतरागी होकर, आत्मा परमात्मा बन जाता है।

अहो ! मोक्षमार्ग तो सचमुच, गुरू परम्परा का मार्ग है और विरक्त गुरू के मार्गदर्शन में ही, आविर्भूत होता है।

सौभाग्यवश ज्ञान वैराग्यवान गुणीजन मिलें तो, परम आदर भाव रखकर और हर्षपूर्वक मर्यादा सहित वर्तना ठीक है। अतः दोषों को गौण रखकर, गुण ग्रहण का भाव रखना योग्य है। किसी को भी आदर्श बनाने से पूर्व, काफी परीक्षा सहित निर्णय करना चाहिये।

आत्मार्थी कभी भावुक नहीं होता। वह परीक्षा प्रधानी, गम्भीर विचारक, आत्मगवेशी होता है। किसी से शीघ्र प्रभावित नहीं हो जाता। किसी से शीघ्र प्रभावित हो जाना भावुकता का लक्षण है। नीति में कहा है कि हर चमकने वाली वस्तु, सोना नहीं होती, इसलिये किसी से एकदम प्रभावित भी नहीं होना और किसी को प्रभावित करने की कोशिश भी नहीं करना।

मंगलमय निर्दोष तत्त्व का सदैव लक्ष रहे। निर्दोष तत्त्व के लक्ष्य पूर्वक ही प्रभावना हो।

हमारे जीवन की सफलता इसी में है कि हमारे जीवन में, स्वाध्याय के माध्यम से, निशंकता और निर्भारता आवे और हमारी परिणति, मंगलमय स्वानुभूति से शोभायमान हो ।

हम सबकी परिणति में ऐसी आनंदरूप स्वानुभूति प्रगट हो, ऐसी पवित्र मंगल भावना के साथ… ।
(अमायन, दिनांक 10-10-1992)

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।। नमः श्री वीतरागाय ।।

धर्मानुरागी आत्मन्,

‘आत्मा’ सर्वोत्कृष्ट परम पवित्र महाप्रभु है, क्योंकि वह सदाकाल एकरूप, सुखरूप, मुक्त, पवित्र, उत्कृष्ट, पूज्य एवं प्रशंसनीय है। इस आत्मा के आश्रय से पतितपने का उत्पाद रहित व्यय होता है और अक्षय पावनता का व्यय रहित उत्पाद होता है।

भो आत्मन् ! परिणामों का चंचलपना तो, पर का लक्ष्य करने से होता है, इसलिये मुक्तिमार्ग में पराश्रय बुद्धि का निषेध प्रथम से ही किया है। अतः यदि तुझे सुखी होना है, तो पर को मत देख । बाह्य व्यवस्था को भवितव्य के भरोसे छोड़ दे। आत्मा की आराधना के मार्ग में, सातिशय पुण्य भी सहज रूप से होने पर, बाह्य अनुकूलतायें भी, सहज ही मिल जाती हैं।

देखो ! तत्त्वविचार के बल से, औदयिक विकारी भाव सहज विलय को प्राप्त हो जाते हैं; निंदक प्रशंसक हो जाते हैं; देव भी सहायक हो जाते हैं; ज्ञानादिक भी सहज वृद्धिंगत हो जाते हैं। कदाचित् पूर्वबद्ध निधत्ति, निकाचित कर्मों का ही बंध हुआ होवे, तब तो मात्र आराधना के मार्ग में ही नहीं, अपितु प्रवृत्ति मार्ग में भी उदय आवेगा, तब कौन सहायक होगा ?

देखो ! गृहस्थ अवस्था में भी क्या श्रीपाल, कोटीभट, बलभद्र रामचन्दजी, सीताजी, अंजनाजी, मनोरमाजी आदि को प्रतिकूलतायें नहीं आई? तब कौन सहायक हुआ? विचार करो। संयोग का वियोग भी होता ही है, तब संयोग के आश्रय से सुख की कल्पना क्या अत्यंत मिथ्या नहीं है?

बाह्य अनुकूलतायें भी पुण्य से अधिक कहीं भी, सम्भव नहीं हैं और पुण्य प्रमाण अनुकूलतायें तो जंगल में भी मिलती हैं, परन्तु मूल बात तो यह है कि अनुकूलताओं में सुख की खोज ही मिथ्या है, क्योंकि अनुकूलताओं में सुख नहीं है, यह मात्र आगम में ही लिखा है, ऐसा नहीं है। प्रत्यक्ष भी देखा जाता है कि तत्त्वज्ञान के बिना भौतिक सुख-सुविधाओं से सम्पन्न देशों में, धनिक जीव भी महादुःखी है तथा संतोषी विवेकी जीव, बाह्य वैभव भोगों के अभाव में भी, सुखी देखे जाते हैं। जहाँ तक प्रतिष्ठा का प्रश्न है धनिकों से विद्वान त्यागियों की विशेष प्रतिष्ठा प्रत्यक्ष देखी जाती है।

भो आत्मन् ! आत्मा चार प्रकार की संज्ञाओं से रहित है। चार प्रकार की संज्ञाओं की पीड़ा, विषयों के अभाव में नहीं, अपितु स्वभाव को भूलकर होती है। अतः आहारादि में प्रवर्तन, अस्त्र शस्त्रों का संग्रह, भोगों में रमना, परिग्रह का संग्रह करना, संज्ञाओं की पीड़ा से बचने का सच्चा उपाय नहीं, अपितु तत्त्व विचार, सत्समागम पूर्वक आराधना करना ही सच्चा उपाय है।

अरे ! विषय भोग तो - (1) किंपाक फल के समान दूर से ही मात्र सुहावने से लगते हैं, खाने पर तो प्राणों के घातक ही हैं। (2) खारे जल के समान हैं, जिनसे तृष्णा ही बढ़ती है, तृप्ति नहीं। (3) अग्नि के ईंधन के समान है; जो चाहरूपी दाह को कभी शमित नहीं होने देते।

विशेष क्या? भोगीजनों की दशा, निष्पक्षरूप से स्वयं विचार कर देखो ! क्या दयनीय नहीं दिखाई देती ? मनुष्य और तिर्यञ्चों की दुर्दशायें तो प्रत्यक्ष ही हैं। यह विषयानुराग का फल नहीं तो क्या है?

अत्यंत क्षणिक औदयिक भावों की विचित्रता से घबड़ाकर, अविनाशी आनंद को प्रदान करने वाले, परम आनंदमय धर्म से विमुख होना, किसी प्रकार भी न उचित है और न श्रेयस्कर। जैसे कोई दरिद्री, अत्यंत कठिनता से प्राप्त रत्न को, ठगों की बातों में आकर, घबड़ाकर छोड़ देवे, वह मूढ़ ही होगा। अतः संयमरूपी रत्न तो सभी प्रकार सुरक्षा करने योग्य ही है।

हे भव्य ! यदि बाह्य में ही देखना है तो, उन भगवन्तों की ओर देखो, जो अन्तर्मग्न सौम्यमुद्रा से मानों मूक प्रेरणा कर रहे हैं कि जगत में कोई भी विषय, भोगने के योग्य तो है ही नहीं, अपितु स्वभाव से विमुख होकर, देखने योग्य भी नहीं है।

विचारो ! परिवर्तनों के चक्र में भ्रमते हुये तुम्हें कौन से संयोग नहीं मिले ? अतः उच्छिष्ट भोगी क्यों बनते हो? अन्तर में ही अमृत का ज्ञान सिन्धु उछल रहा है, देखो तो सही। तुम्हें स्वयं आनंदमयी प्रतीति उदित हो जायेगी। अतः तृप्ति, तुष्टि, विश्रान्ति स्वयं में ही है।

क्या कहें? इस अविद्या के कार्य को ? पूजा तो वीतराग की करता है और स्वयं सुखी होने के लिये राग की पूर्ति के झूठे उपाय करता है।

अहो ! बाह्य में साधन ढूंढने की व्यग्रता से, यह जीव व्यर्थ ही पराधीन होता है। यह आत्मा तो स्वयंभू प्रभु है। अर्थात् स्वयं ही बिना विषयों के अनन्तकाल एक अनंत स्वरूप परिणमित होता रहे। बिना ज्ञेयों की सहायता के ही अनंतदर्शन, ज्ञान, सुख परिणमित होता रहे। बिना बाह्य वैभव के ही अनंत प्रभुता रूप परिणमित होवे ऐसी अपने आत्मा की स्वाभाविक सामर्थ्य है।

देखो ! आत्मा की शरण को प्राप्त योगीश्वरों को, घोर परिषह और उपसर्ग भी किंचित् बाधा उत्पन्न नहीं कर सके। ये तो दूर ही रहो, चन्दनबाला, अनंतमती, सुदर्शन आदि श्रावक दशा में प्रवृत्तमान जीवों को भी कोई प्रलोभन या भय अपने मार्ग से विचलित नहीं कर सके। विश्व आज भी उनसे अपने को गौरवान्वित मानता है।

देखो ! लोक में तो कदाचित् कोई गिरे तो उसे बचाते हैं और हम हँस हँसकर भवसमुद्र में गिरते हैं।

विचारना ! यदि आराधन में हित भासे तो, दुर्विकल्पों को छोड़कर, साहस पूर्वक, उल्लास सहित, रत्नत्रय मार्ग में ही अग्रसर होना। स्वभाव के बल से, रागादिक को जीतना, सहज ही है। अतः निरन्तर तत्त्वाभ्यास के बल से, अपने लक्ष्य की ओर बढ़ें तथा शीघ्र अक्षय सुख पायें। (अमायन, दिनांक 19-10-1992)

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धर्मानुरागी साधर्मीजन,

अहो ! मुनि भगवंतों की समता अलौकिक ही है; निर्ग्रन्थ जीवन सचमुच ही अनुपम है। गृहस्थ दशा में, उसकी प्रतीति, भावना एवं एक देश आचरण होने पर भी, वैसा प्रचुर स्व-संवेदन सम्भव नहीं; इसलिये समस्त ज्ञानी, साक्षात् निर्ग्रन्थ पद की ही भावना भाते हुए, उग्र पुरुषार्थ पूर्वक, उसे अत्यंत हर्षोल्लास पूर्वक अंगीकार करते हैं।

आत्मन् ! साक्षात् मुक्तिमार्ग तो निर्ग्रन्थ मार्ग ही है। सर्व प्रपंचों से रहित, आडम्बरों से शून्य, निस्पृही, निरावलम्बी, स्वाधीन, सहजानन्दमय निर्ग्रन्थ जीवन प्रशंसनीय तो है ही, साथ ही शीघ्रातिशीघ्र अंगीकार करने योग्य है।

निर्ग्रन्थ दशा की महिमा, वचनों से कैसे कहें ? विचार मात्र से ही रोमांच हो आता है। पाने के लिये हृदय उसी प्रकार उमगने लगता है, जैसे- आकाश में उड़ते हुये तोतों के समूह को देखकर, पिंजड़े का तोता उछलने लगता है।

अहो ! मुनिदशा का लक्ष्य होते ही, उपयोग सहज ही, अन्तर में ढलने लगता है। जैसे- बाह्य में देव दर्शन का भाव होने पर, कदम सहज मन्दिरजी की ओर बढ़ने लगते हैं; बीच में कोई आ जावे तो बाधक भासित होता है। उसीप्रकार बाह्य में कुछ सुहाता नहीं। जगत प्रशंसा करे, नानाप्रकार की अनुकूलतायें हो, परन्तु चित्त में किंचित् हर्ष नहीं, अपितु सहज उदासीनता।

पंडितप्रवर श्री टोडरमलजी ने सत्य ही कहा है- 'अपना कार्य करने का हर्ष बहुत है, जैसे-सम्यक्त्व सन्मुख जीव को सम्यक्त्व पाने का हर्ष होता है, उससे भी अनंतगुना उल्लास, ज्ञानी को निर्ग्रन्थ मार्ग अंगीकार करने के प्रति होता है। वहाँ उपसर्गों एवं परिषहों की, कल्पना ही नहीं होती। ऐसा उत्साह जैसे-कोई डाकुओं की कैद से छूटकर घर की ओर आ रहा हो।

अहो ! मुनिराजों को उपसर्ग-परिषहादि जीतने के लिये परिश्रम नहीं करना पड़ता। अभेद अचल ज्ञान का वेदन होने से, उन्हें दूसरी वेदना होती ही नहीं।

निर्भय स्वभाव में मग्न, उन योगीश्वरों से, भय भी भयभीत होकर भाग जाते हैं। निरन्तर निर्विकल्प, निर्बन्ध स्वरूप में ही रतिवन्त साधुजनों को, कर्मबन्ध असत् भासित होते हैं। अतः उनके नाश की भी चिंता उत्पन्न नहीं होती।

धन्य है मुनिदशा ! मुनिराज तो मुनिराज जैसे ही है। सहज ज्ञायक, सहज तृप्त । जिनके दर्शन, गुण चिन्तन, उपदेश श्रवण आदि से, अंतरंग में विशुद्धता तो होती ही है, भेदविज्ञान भी सहज वर्तने लगता है।

जो धर्म की साक्षात् मूर्ति है, ऐसे स्वरूप की महिमा का विचार करना और हर्षित होना, कि जिसके आश्रय से मुनिदशा तो क्या? सिद्धदशा भी सहजपने विलसित होती है, ऐसा महामहिमावंत शुद्धात्मा मैं स्वयं ही हूँ।

अहो ! आज सौभाग्य से मुझे, मेरे अक्षय प्रभुतामय स्वरूप की प्राप्त

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