स्वाभाविक कोमलता मार्दव, धर्मी का शुभ लक्षण मार्दव ।
पूज्य जगत में उत्तम मार्दव, प्रगटाओ तुम भी अब मार्दव ॥ टेक ॥
विनयवान सब दोष नशावे, विनयवान सब गुण प्रगटावे ।
विनयवान ही ज्ञानवान हो, ज्ञानवान तो विनयवान हो ॥ 1॥
दया नहीं हो अभिमानी के, व्रत-तप निष्फल अभिमानी के।
पत्थर में जल ज्यों न समावे, त्यों मानी न विशुद्धि पावे॥ 2॥
सिद्ध समान स्वयं को जानो, आप समान सभी को मानो ।
नहीं दीनता, नहीं अभिमान, जाग्रत रहे सदा ही ज्ञान ॥ 3॥
तुच्छ सभी को देखे मानी, तुच्छ सभी को दिखता मानी ।
विनयवान प्रीति यश पाये, निज-पर का सम्मान बढ़ावे ॥ 4 ॥
पर्यायों के दोष अध्रुव हैं, पंचम भाव सहज ही ध्रुव है ।
द्रव्यदृष्टि हो मंगलकारी, तत्त्वज्ञान हो मंगलकारी ॥ 5॥
निंदा-गर्दा निज दोषों में, माध्यस्थ हो पर दोषों में।
तब ही धर्म भावना बढ़ती, निज परिणति निज में ही लगती ॥ 6 ॥
रचयिता - बा० ब्र० पंडित श्री रवीन्द्र जी आत्मन्
सोर्स - जिन भक्ति सिंधु