तर्ज : श्री जिनवर का मंगल शासन …
धन्य-धन्य सर्वज्ञ प्रभु का, दर्शनीय है जिनशासन।
तीनलोक में अनुपम जानो, स्वानुभूतिमय जिनशासन।। टेक।।
जिनशासन में बाह्य क्रियाओं का व्यवहार बताया है।
व्यसन-पाप-अन्याय-अनीति का दुर्भाव छुड़ाया है ।।
किन्तु बाहरी सदाचरण को ही न समझना जिनशासन।। 1।।
देव-शास्त्र-गुरु-धर्म-तत्त्व का भी विवेक सिखलाया है।
नय-प्रमाण युक्ति से निज-पर भेद-विज्ञान कराया है।।
शुभ विकल्प हैं किन्तु अरे ये समझ न लेना जिनशासन।। 2।।
श्रावक अरु मुनिव्रत धर्मी के यथायोग्य देखे जाते।
परीषह-उपसर्ग विजय संयम तप सहजपने पाये जाते।।
किन्तु अरे यह बाह्य दशा है भिन्न अंतरंग जिनशासन।। 3।।
अबद्धस्पष्ट- अनन्य-नियत अविशेष-असंयुक्त स्व ज्ञायक।
ज्ञेयों से निरपेक्ष अहो अनुभव में आवे बस ज्ञायक।।
हूँ जाननहार अहो मंगलमय स्वानुभूति ही जिनशासन।। 4।।
स्वानुभूतिमय सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चरित्र शिवपथ जानो।
अतः आत्मन् प्रथम ज्ञान में भासित ज्ञायक पहिचानो।।
ज्ञायक दृष्टि से ही निश्चय प्रगट होयगा जिनशासन।। 5।।
अरे मुमुक्षु ! अब भी अटक न जाना बाह्य विकल्पों में।
भव कितने खोये तुमने मिथ्या संकल्प-विकल्पों में ।।
चूक न जाना महाभाग्य से पाया तुमने जिनशासन।। 6।।
Artist: ब्र. रवीन्द्र जी ‘आत्मन्’
स्रोत: सहज पाठ संग्रह
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