स्वसमय और परसमय
-डॉ. वीरसागर जैन
‘स्वसमय’ और ‘परसमय’ की चर्चा शास्त्रों में मुख्यतः ‘स्वमत’ और ‘परमत’ के अर्थ में होती रही है। यथा-
- ‘तात्कालिकस्वसमयपरसमयपारगो।’ -धवला, 1/1/48
- ‘अगाहिद-ससमयसब्भावो परसमयसंकहाहि वाउलिदचित्तो।’ -धवला 1/1/106
- ‘सपरसमयविदण्डू।’ -आचार्यभक्ति
- ‘विज्ञायते ययैव स्वसमयपरसमयसद्भावः ।’ -अष्टसहस्री
- ‘एकांतवाददूषितपरसमयानपि च नाकांक्षेत् ।’ -पुरुषार्थसिद्ध्युपाय, 24
- ‘स्वपरसमयविशेषज्ञाः ।’
- ‘परसमयविदूरित ।’ -सिद्धचक्रविधान
किन्तु अध्यात्मशिरोमणि आचार्य कुन्दकुन्द ने इस दार्शनिक विषय को भी आध्यात्मिक रूप में प्रस्तुत करके अध्यात्म-जगत् को एक नया एवं महत्त्वपूर्ण चिन्तन प्रदान कर दिया।
यद्यपि ‘समय’ शब्द के काल, अवसर, समझौता, अधिकार, रूढ़ि, कवि-विश्वास, युद्ध, मत, विधि, अनुबंध, नियुक्ति, निर्देश, शपथ, संकेत, सीमा, सिद्धान्त, समृद्धि, उपसंहार आदि अनेक अर्थ होते हैं। (-आप्टे, संस्कृत-हिंदी-कोश) किन्तु आचार्य कुन्दकुन्द ‘समय’ का अर्थ बारम्बार ‘आत्मा’ कर रहे थे, अतः ‘स्वसमय’ और ‘परसमय’ शब्दों को भी उन्होंने ‘आत्मा’ पर ही घटित करके उनका एक बड़ा ही महत्त्वपूर्ण और शिक्षाप्रद अर्थ किया, जो मोक्षमार्ग के साधकों को निरंतर ‘स्वसमय’ बनने की गहरी प्रेरणा देने लगा। आचार्य कुन्दकुन्द का यह अर्थ उनका अपना मौलिक योगदान बनकर अध्यात्मजगत् में इतना अधिक चर्चित हुआ कि चारों ओर अद्भुत क्रांति हो गई, सभी मोक्षार्थी निरन्तर स्वसमय बनने की भावना भाने लगे।
स्वसमय और परसमय की चर्चा आचार्य कुन्दकुन्द ने सर्वप्रथम समयसार, गाथा 2 में प्रस्तुत की, जो इसप्रकार है-
"जीवो चरित्तदंसणणाणद्विदो तं हि ससमयं जाण ।
पोग्गलकम्मपदेसद्विदं च तं जाण परसमयं ॥”
अर्थ- जो जीव चारित्र-दर्शन-ज्ञान में स्थित है उसे स्वसमय जानो और जो पुद्गलकर्म-प्रदेशों में स्थित है उसे परसमय जानो।
आचार्य कुन्दकुन्द के टीकाकारों ने इस गाथा का अर्थ खोलते हुए स्वसमय और परसमय के अनेकानेक स्तर गुणस्थानानुसार उपस्थित कर दिए, जो बहुत ही रोचक रहे और उससे इस स्वसमय-परसमय के विषय को और भी अधिक स्पष्टता एवं गम्भीरता प्राप्त हुई। यथा-
- मिथ्यादृष्टि जीव परसमय है और सम्यग्दृष्टि जीव स्वसमय है।
- सम्यग्दृष्टि जीव भी अविरत हो तो परसमय है और व्रती हो तो स्वसमय है।
- सम्यग्दृष्टि जीव व्रती होने पर भी यदि गृहस्थ है तो परसमय है और गृहत्यागी हो तो स्वसमय।
- मुनिराज ही स्वसमय हैं और उनसे नीचे की दशा वाले सब परसमय हैं।
- मुनिराज भी जब आत्मलीन हों तभी स्वसमय हैं और शेष समय में परसमय हैं।
- श्रेणी पर आरूढ़ मुनिराज ही स्वसमय हैं और उससे पहले परसमय हैं।
- पूर्ण वीतराग अरिहंत देव ही स्वसमय हैं और उससे पहले तक सब जीव परसमय हैं।
- सर्व कर्म रहित सिद्ध भगवान् ही स्वसमय हैं और उससे पहले तक सब जीव परसमय हैं।
इसके और भी अनेक- संख्यात, असंख्यात, अनंत-स्तरभेद किये जा सकते हैं। -(धवला)
स्वसमय और परसमय की उक्त समस्त व्याख्याओं पर यदि गहराई से ध्यान दिया जाये तो एक विशेष बात यह भी स्पष्ट होती है कि स्वसमय और परसमय की यह स्थिति प्रायः दो आत्माओं पर घटित करके समझाई गई है, किन्तु कभी-कभी एक ही आत्मा पर स्वसमय और परसमय रूप दोनों अवस्थाएँ घटित कर दी गई हैं। जैसे कि व्याख्या-नम्बर 5 में एक ही आत्मा पर, मुनिराज पर ही घटित की गई है कि जब वे आत्मलीन हों तब स्वसमय हैं और शेष समय में परसमय हैं।
इसका अभिप्राय यह हुआ कि आत्मलीनता ही स्वसमयपना है और उससे बाहर अपने उपयोग को रखना ही परसमयपना है। दूसरे शब्दों में, स्वद्रव्य-रत जीव स्वसमय है और परद्रव्य-रत जीव परसमय है। (सदव्वादो सुग्गई परदव्वादो दुग्गई। -मोक्षपाहुड, 16)।
इसप्रकार यह स्वसमय-परसमय की चर्चा सदा ही सबको समस्त शुभाशुभ भावों से ऊपर उठकर आत्मलीन रहने की मंगल प्रेरणा देने वाली बन गई। साधक सोचने-समझने लगे कि जब हम शुद्धोपयोग में लीन हैं तभी हम अपने हैं, स्वसमय हैं, अन्यथा सर्व शुभाशुभ भावों के काल में तो हम अपने नहीं, पराये हैं, परसमय हैं। (धर्मः शुद्धोपयोगः स्यात्। -पंचाध्यायी)
स्वसमय और परसमय को कुछ लोग क्रमशः मिथ्यादृष्टि और सम्यग्दृष्टि का अथवा बहिरात्मा और अंतरात्मा का पर्यायवाची कह देते हैं, परन्तु ऐसा नहीं है, यह उससे आगे की एक विशेष बात है, जिसे आचार्य कुन्दकुन्द ने एक बहुत ही विशेष प्रयोजन से कहा है। परसमयपना त्यागने का अर्थ केवल सम्यग्दृष्टि बनना नहीं है, अपितु उससे भी आगे बढ़ना है, बढ़ते ही जाना है और तब तक बढ़ते जाना है, जब तक स्थायी रूप से आत्मलीनता न हो। कहीं भी नहीं अटकना है, किंचित् भी नहीं अटकना है, किसी सूक्ष्म से सूक्ष्म शुभोपयोग में भी नहीं अटकना है, पूर्ण निर्विकल्प ही होना है, वह भी किंचित् काल के लिए नहीं, अपितु हमेशा-हमेशा के लिए अपने उपयोग को अपने आत्मा में ही लीन कर देना है।
स्वसमय-परसमय की यह आध्यात्मिक चर्चा आचार्य कुन्दकुन्द के अन्य ग्रन्थों में भी प्राप्त होती है। ‘प्रवचनसार’ में गाथा-संख्या 93 में कहा गया है कि- पज्जयमूढा हि परसमया अर्थात् पर्यायमूढ़ जीव परसमय है। तथा गाथा-संख्या 94 में इस बात को पूरी तरह स्पष्ट करते हुए ऐसा कहा है कि जो जीव पर्यायों में लीन हैं वे परसमय हैं और जो आत्मस्वभाव में लीन हैं वे स्वसमय हैं। यथा-
“जे पज्जयेसु णिरदा जीवा परसमयिग त्ति णिद्दिट्टा।
आदसहावम्मि ठिदा ते सगसमया मुणेदव्वा॥”
इसी प्रकार ‘पंचास्तिकायसंग्रह’ में भी गाथा 155 और 165 में स्वसमय-परसमय की यह चर्चा आध्यात्मिक दृष्टिकोण से आई है, जो मूलतः पठनीय है। गाथा 165 की टीका में आचार्य जयसेन स्वामी ने एक विशेष बात यह कही है कि जो जीव पुरुषार्थ करते हुए भी शुद्धात्मा में लीन नहीं हो पा रहे हैं वे सूक्ष्म परसमय हैं और जो समर्थ होते हुए भी शुद्धात्मा में लीन नहीं हो रहे हैं, किसी शुभोपयोग में ही अटके हैं, वे स्थूल परसमय हैं। यथा-
"कश्चित् पुरुषो निर्विकारशुद्धात्मभावनालक्षणे परमोपेक्षासंयमे स्थातुमीहते तत्राशक्तः सन् कामक्रोधाद्यशुद्ध-परिणामवंचनार्थ संसारस्थितिछेदनार्थ वा यदा पंचपरमेष्ठिषु गुणस्तवनभक्तिं करोति तदा सूक्ष्मपरसमयपरिणतः सन् सराग-सम्यग्दृष्टिर्भवति, यदि पुनः शुद्धात्मभावनासमर्थोपि तां त्यक्त्वा शुभोपयोगादेव मोक्षो भवतीत्येकान्तेन मन्यते तदा स्थूलपरसमयपरिणामेनाज्ञानी मिथ्यादृष्टिर्भवति।”
इस प्रकार यहाँ परसमय के भी सूक्ष्म और स्थूल- ये दो भेद किये गये- यह आचार्य जयसेन स्वामी का विशेष योगदान है। परसमय का ऐसा विभाजन सूक्ष्म विकल्प को भी तोड़कर शुद्धात्मा में लीन होने की बहुत मार्मिक प्रेरणा देता है। तथा यह भी कहता है कि जो अपनी आत्मा से जितना अधिक दूर है वह उतना ही बड़ा परसमय है और जो जितना-जितना पास आता जाता है, वह उतना-उतना स्वसमय बनता जाता है।
स्वसमय-परसमय की यह आध्यात्मिक चर्चा ‘रयणसार’ में भी गाथा-संख्या 141 में भी बहुत सुंदर रीति से आई है, जो मूलतः इस प्रकार है-
“बहिरंतरप्पभेदं परसमयं भण्णदे जिणिंदेहिं ।
परमप्पा सगसमयं तब्भेदं जाण गुणठाणे ॥”
अर्थ- जिनेन्द्र भगवान् ने बहिरात्मा व अंतरात्मा- इन दोनों भेदों को परसमय कहा है और परमात्मा को स्वसमय कहा है। इनके भेदों को गुणस्थानों के अनुसार जान लेना चाहिए।
यहाँ तब्भेदं जाण गुणठाणे पद विशेष ध्यान देने योग्य है। इसमें ऊपर कहे गये स्वसमय-परसमय के सभी स्तर-भेद गर्भित हो गये हैं। तब्भेदं जाण गुणठाणे का आशय है कि हर गुणस्थान अपने पूर्ववर्ती गुणस्थान की अपेक्षा स्वसमयपना है और उत्तरवर्ती गुणस्थान की अपेक्षा परसमयपना है जैसेकि पाँचवाँ गुणस्थान चौथे गुणस्थान की अपेक्षा स्वसमयपना है और छठे गुणस्थान की अपेक्षा परसमयपना है। इसीप्रकार सर्वत्र लगा लेना चाहिए।
यहाँ बहिरात्मा, अंतरात्मा और परमात्मा से जोडकर स्वसमय-परसमय की बात समझाने से यह भी स्पष्ट होता है कि जिसप्रकार बहिरात्मा, अंतरात्मा और परमात्मा - ये तीन आत्माएं नहीं हैं अपितु एक ही आत्मा के तीन स्तर हैं, उसीप्रकार स्वसमय और परसमय - ये दोनों भी दो आत्मा नहीं हैं अपितु एक ही आत्मा के दो स्तर हैं। इन्हें एक ही आत्मा पर घटित करके समझना चाहिए, पृथक्-पृथक् दो आत्माओं पर घटित करके नहीं, तभी हमें स्वसमय-परसमय की चर्चा का असली लाभ प्राप्त होगा।
स्वसमय-परसमय की आध्यात्मिक अवधारणा आत्मसाधकों के लिए बहुत ही प्रयोजनभूत विषय है, जो हमें समस्त शुभाशुभ भावों से ऊपर उठकर निरंतर आत्मलीन रहने की पावन प्रेरणा देती है। स्वसमय-परसमय की चर्चा का गहरा संदेश यह है कि स्व स्व है, पर पर है। स्व ही सर्वप्रकार से उपादेय है, स्व ही श्रद्धेय है, स्व ही ध्येय है, स्व ही ज्ञेय है और पर सर्वप्रकार से हेय है। पर में हमारा मन कभी लग ही नहीं सकता। लोक में भी हम देखते हैं कि कोई भी वस्तु कितनी भी सुन्दर हो, महँगी हो; परन्तु यदि वह पर है तो उसमें हमारा मन नहीं लग पाता, वह हमें प्रसन्न नहीं कर पाती। तथा कोई वस्तु कितनी भी असुन्दर हो, सस्ती हो; पर यदि वह स्व है तो वह तो हमारा मन सहज ही उसमें मग्न हो जाता है। पराये महल से अपनी झोपड़ी हमें प्यारी लगती है। किसी देश की हम बहुत प्रशंसा करते हैं, किन्तु उसे ‘परदेश’ कहना ही बताता है कि हम उसे अच्छा नहीं मानते, प्यार नहीं करते। अपना तो अपना ही होता है। परपुरुष क्या कोई पुरुष होता है? परघर क्या कोई घर होता है? परस्त्री क्या कोई स्त्री होती है? इसीप्रकार परसमय क्या कोई समय होता है? नहीं, कदापि नहीं। आत्मा में भी हमारा उपयोग इसीलिये नहीं लगता कि उसे हमने पराया मान रखा है।
पर कहना सबसे बड़ी गाली भी है। एक शिष्य को उसके गुरुजी बहुत डांटते थे- तू मूर्ख है, निर्बुद्धि है, पापी है, गधा है, इत्यादि, किन्तु फिर भी वह बहुत दुखी नहीं होता था; किन्तु एक दिन गुरुजी ने उससे कहा कि तू मेरा शिष्य नहीं है, जा, मैं तुझे अपना शिष्य नहीं मानता। शिष्य अब महादुखी हो गया।
एक पुत्र को उसके पिता बहुत डांटते थे- तू मूर्ख है, निर्बुद्धि है, पापी है, गधा है, इत्यादि, किन्तु फिर भी वह बहुत दुखी नहीं होता था; किन्तु एक दिन पिता ने उससे कहा कि तू मेरा पुत्र नहीं है, जा, मैं तुझे अपना पुत्र ही नहीं मानता। पुत्र अब महादुखी हो गया।
एक पतिव्रता स्त्री को उसका पति बहुत डांटता था- तू ऐसी है, तू वैसी है, पगली है, इत्यादि, किन्तु फिर भी उस स्त्री को बहुत दुःख नहीं होता था; किन्तु एक दिन उसके पति ने कहा- तू मेरी नहीं है, जा, मैं तुझे अपनी नहीं मानता। स्त्री अब महादुखी हो गई।
आचार्य कुन्दकुन्ददेव भी कह रहे हैं कि जब तुम अपने स्वभाव में नहीं रहते हो, विभावों में रहते हो, तब तुम अपने नहीं रहते हो, पराये हो जाते हो, स्वसमय नहीं रहते हो, परसमय हो जाते हो। काश, हमें उनकी बात समझ में आए