स्वाध्याय में गुणवत्ता की वृद्धि करें | Svadhyay Men Gunavatta Ki Vriddhi Karen

स्वाध्याय में गुणवत्ता की वृद्धि करें

-प्रो. वीरसागर जैन

‘स्वाध्याय’ की अद्भुत महिमा है | स्वाध्याय ही सारे मोक्षमार्ग का मूलाधार है, क्योंकि स्वाध्याय से ही सम्यग्ज्ञान की प्राप्ति होती है और फिर उस सम्यग्ज्ञान से सहज ही सम्यक् श्रद्धान और सम्यक् चारित्र होता है; अतः हमारा पुरुषार्थ तो एक स्वाध्याय द्वारा सम्यग्ज्ञान की प्राप्ति करना ही है | शास्त्रों में बारम्बार स्वाध्याय की महिमा बताकर उसकी प्रेरणा देनेवाले अनेकानेक मर्मस्पर्शी कथन उपलब्ध होते हैं, अतः हमें अपने जीवन में स्वाध्याय पर बहुत अधिक ध्यान देना चाहिए | न केवल ध्यान देना चाहिए, उसमें निरंतर गुणवत्ता (quality) की वृद्धि भी करनी चाहिए | स्वाध्याय में गुणवत्ता बढ़ाने के लिए हमको निम्नलिखित कार्य करना चाहिए -

  1. सर्वप्रथम तो हमें स्वाध्याय की उपयोगिता और महत्ता को भलीभांति समझना चाहिए, उसका बारम्बार बहुत गहराई से अनुभव करना चाहिए | इसके बिना स्वाध्याय में गुणवत्ता नहीं आती |

  2. इसके साथ ही समय की अल्पता, संयोगों की दुर्लभता और विषयों की असारता का भी गहराई से अनुभव करना चाहिए |

  3. इसके बाद शास्त्रों में पाठक/श्रोता के कुछ खास गुण-दोष कहे हैं। उनमें से गुणों का ग्रहण और दोषों का त्याग करना चाहिए | जैसे- गुण कहे हैं - “शुश्रूषा श्रवणं चैव ग्रहणं धारणं तथा | स्मृत्यूहापोहनिर्णीतिः श्रोतुरष्टगुणाः विदुः ||” और दोष कहे हैं - “आलस्यो मंदबुद्धिश्व सुखिनो व्याधिपीड़ितः | निद्रालुः कामुकश्चेति षडैते शास्त्रवर्जिताः ||"

  4. इसीप्रकार ज्ञान के आठ अंग कहे हैं - शब्दाचार, अर्थाचार,उभयाचार आदि, उनका पालन करना चाहिए और जो ज्ञानावरण के आस्रव के हेतु कहे हैं - प्रदोष, निह्नव, मात्सर्य आदि, उनसे बचना चाहिए ।

  5. इधर-उधर की हल्की किताबों को छोडकर प्राचीन मूल ग्रन्थों का अध्ययन विशेष करना चाहिए | वह भी एक बार नहीं, अनेक बार, बारंबार | ( ‘शतेनगुणिताssयाति…’)

  6. उनकी कुछ विशेष गाथाओं या श्लोकों को कंठस्थ करने का प्रयास करना चाहिए | खासकर लक्षणादि तो अवश्य ही कंठस्थ कर लेने चाहिए |

  7. उनकी मूल भाषा प्राकृत/संस्कृत का भी ज्ञान प्राप्त करना चाहिए, ताकि आचार्यों के अभिप्राय को मूल से समझा जा सके | अनुवाद में बहुत बार गलतियाँ हो जाती हैं |

  8. थोड़ा-सा व्याकरण एवं शब्दकोश का भी ज्ञान अवश्य प्राप्त करना चाहिए, क्योंकि सही अर्थ का बोध कराने में इनकी बहुत बड़ी भूमिका होती है | ‘शब्दब्रह्मणि निष्णातः परंब्रह्माधिगच्छति’ |

  9. इसी प्रकार अन्य दर्शनों (षड्दर्शनों) का ज्ञान भी बहुत जरूरी है | प्रायः सभी लक्षणादि के कथन अन्य दर्शनों की विवक्षा से ही किए जाते हैं। इस सम्बन्ध में मेरा अन्य लेख “अन्य दर्शनों के ज्ञान की आवश्यकता” पठनीय है | 10. न्यायशास्त्र का भी प्राथमिक परिचय अवश्य होना चाहिए। प्रमाण, नय, निक्षेप को समझे बिना युक्त भी अयुक्त और अयुक्त भी युक्त प्रतीत होता है। (-तिलोयपण्णत्ति1/82)

  10. भाषा, व्याकरण, दर्शन और न्याय के अतिरिक्त यदि हमें साहित्यशास्त्र का भी ज्ञान हो तो इससे भी हमारे स्वाध्याय में गुणवत्ता की बहुत वृद्धि होगी। साहित्यशास्त्र के ज्ञान बिना साहित्यिक ग्रन्थों का सही अर्थ नहीं समझा जा सकता। इस सम्बन्ध में मेरा अन्य लेख “अलंकारशास्त्र के ज्ञान की आवश्यकता” पठनीय है।

  11. अध्ययन के बाद अधीत विषय का युक्ति लगाकर गहरा चिन्तन-मनन भी अवश्य करना चाहिए, वही तो असली स्वाध्याय है। चिन्तन-मनन-मंथन से ही तो ‘सार’ हाथ लगता है। सुचिन्तित हो तो अक्षरमात्र श्रुतज्ञान ही केवलज्ञान देने में समर्थ है। वाचन से पाचन महान् है।

  12. स्वाध्याय करते समय अपने समस्त पूर्वाग्रह, दुराग्रहों को छोड़कर एकदम ईमानदारी से निष्पक्षतापूर्वक बात को समझने का प्रयास करना चाहिए। मन में कोई भय या आशा नहीं रखनी चाहिए।

  13. समझी हुई बात को किसी अन्य मित्रादिकों को समझाने का प्रयास भी करना चाहिए। अथवा उसे व्यवस्थित निबन्धादि के रूप में लिखने का प्रयास करना चाहिए। इससे भी हमारा ज्ञान बहुत निर्मल होता है।

  14. बड़े-बड़े विद्वानों के व्याख्यान सुनने चाहिए, उनकी सेवा करके उनका प्रसाद अर्जित करना चाहिए, उनकी संगति करके उनसे गहन तत्त्वचर्चा भी करनी चाहिए।

  15. विशुद्ध आत्मकल्याण की भावना से ही स्वाध्याय करना चाहिए। उसके पीछे अन्य कोई लोकैषणा (धन, मान आदि की इच्छा) नहीं रखनी चाहिए।

  16. शास्त्रों में द्रव्य-क्षेत्र-काल-भाव की शुद्धिपूर्वक स्वाध्याय की प्रेरणा दी गई है। हमें उस बात को भी ठीक से समझकर उसका भी पालन करना चाहिए।

  17. स्वाध्याय में नियमितता, एकाग्रता, विनम्रता, उत्साह आदि गुण भी अवश्य होने चाहिए। जिसप्रकार एक बूंद जल से गर्म लोहा ठंडा नहीं होता, किन्तु यदि वह एक-एक बूंद भी नियमित गिरती रहे तो वह ठंडा हो जाता है, उसीप्रकार अल्प स्वाध्याय भी यदि नियमित किया जाए तो मोहताप दूर हो जाता है।

  18. आरम्भ, परिग्रह, व्यापारादि कार्यों में अधिक नहीं उलझना चाहिए।

  19. इधर-उधर का फालतू/बेकार पढकर या देखकर अपने दिमाग में कूड़ा नहीं भरना चाहिए।

  20. पुनश्च, स्वाध्याय अनेक प्रकार से किया जाता है- कभी स्वयं पढकर, कभी दूसरे से सुनकर, कभी सभा में सुनकर, इत्यादि। सबके कुछ अलग विशेष गुण होते हैं, उनका भी पालन जरूरी है। जैसे- सभा में सुनना हो तो समय से पूर्व पहुंचना, आगे मुख्य स्थान पर बैठना (‘स्थानप्रधानेन बलप्रधानम्’) आदि से स्वाध्याय में बड़ी गुणवत्ता आती है।

भजन बिना भोजन नहीं। स्वाध्याय बिना शयन नहीं॥

स्वाध्याय की अद्भुत महिमा

  1. “तिलोक्कसारं पि सुदलाहं ।”- तिलोयपण्णत्ति, 637 (अर्थ-तीन लोक में श्रुतलाभ ही सार है।)

  2. कंठगदेहि वि पाणे साहुणा आगमो हु कादव्वो | -भगवती आराधना,151

  3. ‘अज्झयणमेवज्झाणं पंचेंदियणिग्गहं कसायं पि|तत्तो पंचमकाले पवयणसारब्भासमेव कुज्जाहो।’ -रयणसार, 90 (अर्थ- अध्ययन ही ध्यान है | उसीसे पंचेंद्रियों व कषायों का निग्रह होता है | अतः इस पंचम काल में ‘प्रवचनसार’ का ही अभ्यास करने योग्य है | )

  4. ‘जिणसत्थादो अट्ठे पच्चक्खादिहिं बुज्झदो णियमा|खीयदि मोहोवचओ तम्हा सत्थं समधिदव्वं ।’ -प्रवचनसार, 86 (जिनशास्त्रों से प्रत्यक्षादि प्रमाणों द्वारा पदार्थों का स्वरूप जानने वाले के नियम से मोह क्षय होता है, अतः समीचीन रूप से स्वाध्याय करना चाहिए|)

  5. ‘आगमचेट्ठा ततो जेट्ठा |’ -प्रवचनसार, 232 (आगम में प्रवृत्ति ही सर्वश्रेष्ठ कार्य है |)

  6. ‘स्वाध्यायः परमं तपः ।’ -(स्वाध्याय ही उत्कृष्ट तप है ।)

  7. ‘ण वि अत्थि ण वि य होहिदि सज्झायसमं तवोकम्मं ।’ - भगवती आराधना,107 (स्वाध्याय से बड़ा तप न है, न होगा|)

  8. ‘जिणवयणमोसहमिणं विसयसुहविरेयणं अमिदभूदं ।’ -दंसणपाहुड, 17 (जिनवचनरूपी औषध विषयसुख का विरेचन करने वाली अमृतभूत वस्तु है ।)

  9. ‘सूई जहा ससुत्ता णासदि सुत्ते सहा णो वि ।’ - सुत्तपाहुड, 3 (जिसप्रकार डोरा सहित हो तो सूई नहीं खोती, उसीप्रकार यदि हम सूत्र-सहित रहें तो नष्ट नहीं होते | )

  10. ‘विणएण सुदमधीदं …’ -मूलाचार (विनयपूर्वक किया गया स्वाध्याय विस्मृत हो तो भी अगले जन्म में श्रुतकेवली-केवली बना देता है | )

  11. न शीतलाश्चन्दनचन्द्र… -बृहत्स्वयंभूस्तोत्र, 46 (चन्दन, चन्द्र, गंगाजल, मोतीमाल आदि भी आत्मा को शीतलता नहीं दे सकते, एकमात्र जिनवचन ही दे सकते हैं|)

  12. ‘मनः प्रसाद्यं श्रुतैरमृतैः |’ - रत्नकरंड (मन को श्रुत रूपी अमृत से प्रसन्न रखना चाहिए|)

  13. शास्त्राभ्यासो जिनपतिनुतिः …- शांतिपाठ (हे भगवन् ! मैं नित्यप्रति स्वाध्याय करता रहूँ|)

  14. ‘श्रुतस्कन्धे धीमान् रमयतु मनोमर्कटममुम् |’ -आत्मानुशासन (मन बन्दर के समान है, इसे अमृतफलों से भरपूर श्रुतस्कन्ध पर लगा दो | )

  15. ‘जा वाणी के ज्ञान तें, सूझे लोकालोक |’ -जिनवाणी-स्तुति (जिनवाणी के ज्ञान से समस्त लोकालोक दिखाई देने लगता है|)