स्वाध्याय का स्वरूप और प्रयोजन
-डॉ. वीरसागर जैन
महाकवि पण्डित दौलतराम कासलीवाल के अनुसार
जिनागम के प्रचार-प्रसार में महाकवि पण्डित दौलतराम कासलीवाल का योगदान अत्यधिक महत्त्वपूर्ण है। आदिपुराण, पद्मपुराण, हरिवंशपुराण, परमात्मप्रकाश आदि विशालकाय ग्रन्थों की सरल-सुबोध भाषावचनिकाएँ लिखकर और विवेक-विलास, अध्यात्म-बारहखड़ी, जीवन्धर-चरित आदि अनेक अनूठे मौलिक ग्रन्थ तैयार कर उन्होंने सम्पूर्ण जनता पर अनुपम उपकार किया है। उनका जन्म विक्रम संवत् 1749 में आषाढ़ कृष्णा चतुर्दशी को जयपुर (राजस्थान) जिले के बसवा नामक ग्राम में हुआ था। उनका साहित्य-रचना-काल वि० सं० 1777 से 1829 है। लगभग 52 वर्ष की इस अवधि में उन्होंने निरन्तर साहित्य-साधना में जुटे रहकर 19,000 श्लोक-प्रमाण गद्य-रचना की, विपुल पद्य रचना इसके अतिरिक्त है। कहने की आवश्यकता नहीं कि यह उनका असाधारण प्रदेय है। उनके समकालीन जैन-लेखकों में पण्डित टोडरमल, पण्डित जयचन्द छाबड़ा, पण्डित दीपचन्द कासलीवाल और महाकवि भूधरदास के नाम विशेष उल्लेखनीय हैं।
पण्डित दौलतराम कासलीवाल की अनेक अनूठी मौलिक रचनाओं में एक है- ‘क्रियाकोष’। इसकी रचना महाकवि ने उदयपुर में भाद्रपद शुक्ला द्वादशी वि० सं० 1795 को पूर्ण की थी। यह कुल 2525 (387 + 2138) छन्दों में बद्ध एक आचार-प्रधान बड़ी रचना है, जिसमें जिनशास्त्रों में वर्णित 53 क्रियाओं का निश्चय-व्यवहार की संधिपूर्वक बहुत सूक्ष्म, स्पष्ट, सरल और आगमानुकूल विवेचन किया गया है। 8 मूलगुण, 12 व्रत, 12 तप, 1 सम्यक्त्व, 11 प्रतिमाएँ, 4 दान, 1 जलगालनविधि, 1 रात्रिभोजनत्याग और 3 रत्नत्रय - ये जिनशास्त्रों में वर्णित 53 क्रियाएँ हैं।
प्रस्तुत निबन्ध मे हमें उक्त ‘क्रियाकोष’ के आधार से 29वीं क्रिया स्वाध्याय के स्वरूप और प्रयोजन पर प्रकाश डालना अभीष्ट है।
स्वाध्याय द्विविधि हैः- निश्चयस्वाध्याय और व्यवहारस्वाध्याय। आत्म-स्वरूप को देखना निश्चयस्वाध्याय है और जिनेन्द्र-कथित आगम-अध्यात्मरूप सिद्धान्तों को भक्तिपूर्वक पढ़ना व्यवहारस्वाध्याय है। ये दोनों स्वाध्याय मुनि और श्रावक दोनों के ही यथायोग्य होते हैं:-
“लखिवौ आतम भाव कौ, सो स्वाध्याय बखानि।
मुनि श्रावक दोऊनि कौ, यह परमाथ जानि।।502।।”
“आगम अध्यातममई, जिनवर कौ सिद्धान्त।
ताहि भक्ति करि जो पढ़े, सो स्वाध्याय सुकान्त।।483।।”
व्यवहारस्वाध्याय के मुख्यतः पाँच भेद हैं:- वाँचना, पृच्छना, अनुप्रेक्षा, आम्नाय और धर्मोपदेश। ग्रन्थों को पढ़ना वाँचना है, उनके बारे में विधिपूर्वक पूछना पृच्छना है, स्पष्ट प्रतीति के लिए उनका बार-बार विचार करना अनुप्रेक्षा है, जान लेना (याद करना/पाठ करना) आम्नाय है, आगमानुकूल धर्मकथन करना धर्मोपदेश है:-
"भेद पंच स्वाध्याय के, उपाध्याय भाषेहिं ।
जे धारैं ते शांतधी, आतमरस चाखेहिं।
कही वाचना पृच्छना, अनुप्रेक्षा गुरुदेव ।
आमनाय फुनि धर्म कौ, उपदेशौ बहुभेव ।।487।।
ग्रंथ वाचवौ वाचना, पृछना पूछन रीति ।
बारंबार विचारिवौ, अनुप्रेक्षा परतीति ।।488।।
आमनाय कौ जानिवौ, जिनमारग की वीर।
धर्मकथन करिवौ सदा, कहै धर्मधर धीर ।।48।। "
ध्यान रहे, व्यवहार स्वाध्याय भी जिनेन्द्र-कथित आगाम-अध्यात्म रूप वीतरागी सिद्धान्तों के अध्ययन का ही नाम है, राग-द्वेष पोषक अशास्त्रों का नहीं। राग-द्वेष-पोषक अथवा युद्धकथा-कामकथा आदि के निरूपक ग्रन्थों का अध्ययन करते हैं, उन्हें धर्म की प्राप्ति नहीं होती :-
राग-द्वेषकरि परिणम्यूं, करै असूत्र अभ्यास ।
सो पावै नहिं धर्म कों, करै न कर्म विनास ।।498।।
युद्धकथा कामादिका, कुकथा चावै मूढ़।
लोक-रिझावन कारणें, सो पद लहै न गूढ़ ।।499।।
त्रिकालज्ञ जिनेन्द्रदेव कहते हैं कि यह स्वाध्याय सर्व तपों में शीर्षस्थ है:-
“सुनों सुबुद्धि कान धरि, दसमो तप स्वाध्याय।
सर्व तपनि मैं है सिरै, भाषै त्रिभुवनराय ।।479।।”
स्वाध्याय, दुःखकारी सर्व विकल्पों का नाश करके निर्विकल्प दशा की प्राप्ति कराता है, स्वाध्याय का फल केवल परमार्थ की प्राप्ति है:-
“दुष्ट विकल्पनिकों भया, जो नासन समरत्थ।
सौ पावै स्वाध्याय कों, फल केवल परमत्थ।।481।।”
अतः जो केवल आत्मार्थ की भावना से शास्त्रों का अध्ययन करता है, किसी पूजा-प्रतिष्ठा आदि की चाह उससे नहीं रखता, वही तत्त्वज्ञान की प्राप्ति करता है:-
“केवल आतम अर्थ जो, करै सूत्र अभ्यास ।
अपनी पूजा नहिं चहै, पावै तत्त्व अध्यास ।।484।।”
जो व्यक्ति तत्त्व का भलीभाँति निर्णय करने के लिए शुद्ध स्वाध्याय करता है वह आत्मलीनता द्वारा आत्मवैभव को प्राप्त करता है:-
तत्त्व सुनिश्चै कारनें, करै शुद्ध स्वाध्याय।
सिद्धि करै निजऋद्धि कों, सो आतम लव लाय ।।482।।
जो व्यक्ति अपने कर्मकलंक को काटने के लिए निरन्तर धर्मबुद्धिपूर्वक शास्त्रों का अध्ययन करता है, वह अवश्य अष्ट कर्मों का नाश कर सिद्ध पद की प्राप्ति करता है:-
"अपने कर्मकलंक के, काटन कों श्रुतपाठ।
करै निरंतर धर्मधी, नासै कर्म जु आठ।।485।।
इसके विपरीत, जो व्यक्ति जगत् की अभिलाषा रखकर जिनशास्त्रों का अध्ययन करता है और अपने शास्त्रज्ञान का घमण्ड करता है, वह चतुर्गतिरूप संसार में ही भ्रमण करता है :-
"जो सेवै जिनसूत्रकों, जग अभिलाष धरेय।
गर्व धरै विद्यातनों, सो चउगति भरमेय ।।491।।
जो व्यक्ति मान-बडाई के लिए शास्त्रों का अध्ययन करता है वह मूर्ख है, उसे तत्त्वज्ञान की प्राप्ति नहीं होती, अपितु कर्म का ही बन्ध होता है:-
"मान बढ़ाई कारनें, जे श्रुति सेवें अंध।
ते नहिं पावैं तत्त्वकों, करें कर्म कौ बंध।।494।।
अहो! अमृत तो सर्वरोगनाशक और अजरामत्व प्रदान करनेवाला है, किन्तु जिसे अमृत भी विषरूप सिद्ध हो जाए, उसे अन्य क्या उपाय हो सकता है? कुछ नहीं। वह तो मरेगा ही। उसीप्रकार जिनशास्त्र तो मानादि सर्व कषायों का हरण करनेवाले हैं, किन्तु जो जीव उन्हीं के द्वारा मानकषाय का पोषण करते हैं, उनके लिए अन्य क्या उपाय हो सकता है? कुछ नहीं। वे तो संसार में भ्रमण करेंगे ही। देखियेः-
"जैनसूत्र मद मान हर, ताकरि गर्वित होय।
ताहि उपाय न दूसरौ, भ्रमैं जगत् मैं सोय ॥495।।
अमृत विषरूपी भयौ, जाकौ और इलाज।
कहौ, कहा जु बताइये, भाषै पंडितराज ।।496।।
अतः शास्त्रज्ञान से घमण्ड कभी नहीं करना चाहिए। जो लोग ऐसा सोचते हैं कि हम विपुल शास्त्रों के अध्येता हैं, बडे पंडित हैं, शास्त्रों के अर्थों को जानते हैं और देखो तो सही, लोग हमारी सेवा ही नहीं करते ; वे पण्डित नहीं हैं। पण्डित तो वस्तुतः वह होता है जो आत्मभाव में रमण करता है:-
"हम पंडित बहुश्रुत महा, जानैं सकल जु अर्थ।
हमहिं न सेवै मूढधी, देखो बड़ौ अनर्थ ॥492।।
इहै वासना जो धरै, सो नहिं पण्डित कोइ।
आतमभावे जो रमैं, सो बुध पाण्डित होइ ॥493।।
जो पण्डित या स्वाध्यायी आत्मज्ञान में प्रवीण है, स्व-पर के भेद को अच्छी तरह जानता है, वह सचमुच तीनों लोकों का स्वामी (ज्ञाता) है और शान्तरस में लीन रहने के कारण सदासुखी है:-
"जानै निज पर भेद जो, आतमज्ञान प्रवीन।
सो स्वामी सब लोक कौ, सदा सांतरसलीन ।।501।।