जैसे खाली बर्तन में, अग्नि से नहीं उफान।
दूध बिना आ सकता भाई, त्यों न क्रिया बिन ज्ञान।।1।।
तत्त्वज्ञान का दूध भरा हो, अरु विशुद्ध परिणाम।
संयम अंश प्रकट होता है, देव-गुरु बहुमान ।। 2।।
हीरा की कीमत तो केवल, जौहरी सकता जान।
मूरख उससे चिड़ी उड़ाता, उसको पत्थर मान।। 3।।
भक्ति अंश तभी जागे अरु उमगे तब बहुमान।
जब उसकी कीमत पहिचाने, होवे सम्यक् ज्ञान।। 4।।
तभी उठाकर उस हीरे को, रखे सुरक्षित जान।
निश-दिन उसकी रक्षा करता, देकर तन-धन जान।। 5।।
उसी तरह देव-शास्त्र-गुरु हैं, जग में रत्न महान्।
सम्यक् आत्म स्वभाव दिखाते, जिसमें सुख अम्लान ।। 6।।
जो कोई इनकी शरण में आया, दूर हुए सब कष्ट।
उसने ध्यान धारणा द्वारा, कर्म किए हैं नष्ट ।। 7।।
निज वैभव को निज में पाया, बना स्वयं भगवान्।
भव-भव का परिभ्रमण मिटाकर, पाई मुक्ति महान् ।। 8।।
अरे ! आज इस भरतक्षेत्र में, प्रकट नहीं हैं आप्त।
पुण्य हीनता से गुरु दुर्लभ, ज्ञानी भी नहीं प्राप्त।। 9।।
शास्त्र मिले हैं पर ज्ञानी के बिना न मिलता मर्म।
निमित्त और व्यवहार कथन में, भूले निश्चय धर्म ।। 10।।
ऐसे हीन काल में भी कुछ जागा पुण्य महान्।
तत्त्व रुचि कुछ हुई हृदय में, प्रकटा किंचित् ज्ञान ।। 11।।
जैसे जुगनू चमके नभ में, तैसे ज्ञानी जान।
क्षणिक समागम मिला आत्मन् ! शीघ्र करो कल्याण।। 12।।
तन-धन-भोग सु क्षणभंगुर हैं, शिथिल करें पुरुषार्थ ।
इनमें फँस कर ना परार्थ हो, और न सधता स्वार्थ ।। 13।।
यह उत्तम अवसर हीरा पा, उचित नहीं परमाद।
दूर करो अज्ञान- कषायें, पीवो आतम स्वाद।। 14।।
जग के सभी प्रलोभन तज दो, नहीं करो परवाह।
दुःख चाहे कितने ही आवें, नहीं खींचना आह।। 15।।
तीर्थंकर सम ही ठुकराना, वैभव भोग हे भ्रात ।
आँख बन्द तोते सम करके, पावो मुक्ति पाथ।। 16।।
अपना लोटा छान, पान करने से मिटती प्यास ।
जग की चिन्ता त्याग-त्याग तू, जग का ना विश्वास ।। 17 ।।
सबका होगा स्वयं परिणमन, तू नहिं ठेकेदार ।
मौन भाव धर तीर्थ साधु सा, पावो पद अविकार।। 18।।
Artist: ब्र. रवीन्द्र जी ‘आत्मन्’
स्रोत: सहज पाठ संग्रह