सूवा बत्तीसी | Suva Battisi
१. ता तर विषय भोग अन धरे, सुवटै जान्यो ये सुख खरे।
उतरे विषय सुखन के काज, बैठ नलिनपै विलसै राज ॥
२. बैठो लोभ नलिनपै जबै, विषय-स्वाद रस लटक्यो तबै।
लटकत तरें उलटि गये भाय, तरमुंडी ऊपर भये पाँव ॥
३. नलनी दृढ़ पकरे पुनि रहै, मुखतें वचन दीनता कहै।
कोउ न तहाँ छुड़ावनहार, नलिनी पकरे करहि पुकार ॥
४. पढ़त रहै गुरू के सब बैन, जे-जे हितकर रखिये ऐन ।
सुवटा वन में उड़ जिन जाहु, जाहु तो भूल चुगा जिन खाहु ॥
५. नलनी के जिन जइयो तीर, जाहु तो तहाँ न बैठहु वीर।
जो बैठो तो दृढ़ जिन गहो, जो दृढ़ गहो तो पकरि न रहो ॥
६. जो पकरो तो चुगा न खइयो, जो तु खाव तो उलट न जइयो।
जो उलटो तो तज भज धइयो, इतनी सीख हृदय में लहियो ॥
७. ऐसे वचन पढ़त पुन रहै, लोभ नलिन तज भज्यो न चहै।
आयो दुर्जन दुर्गति रूप, पकड़े सुवटा सुन्दर भूप ॥
८. डारे दुःख के जाल मंझार, सो दुख कहत न आवै पार।
भूख-प्यास बहु संकट सहै, परवस परयो महा दुख लहै ॥
९. सुवटा की सुधि-बुधि सब गई, यह तो बात और कछु भई।
आय पस्यो दुखसागर माहिं, अब इततैं कितको भज जाहिं ॥
१०. केतो काल गयो इह ठौर, सुवटै जिय में ठानी और।
यह दुख जाल कटै किह भांति, ऐसी मन में उपजी ख्याति ॥
११. रात-दिना प्रभु सुमरन करै, पाप-जाल काटन चित धेरै।
क्रम-क्रम कर काट्यो अघजाल, सुमरत फल भयो दीनदयाल ॥
१२. अब इततैं जो भजकै जाऊँ, तौ नलनी पर बैठ न खाऊँ।
पायो दाव भज्यो ततकाल, तज दुर्जन दुर्गति जंजाल ॥
१३. आयो उड़त बहुरि वन माँहि, बैठ्यो नरभवद्रुम की छाँहि ।
तित इक साधु महा मुनिराय, धर्म देशना देत सुभाय ॥
१४. यह संसार कर्मवन रूप, तामहिं चेतन सुआ अनूप।
पढ़त रहै गुरु वचन विशाल, तौहु न अपनी करै संभाल ॥
१५. लोभ नलिन पै बैठ्यो जाय, विषय स्वादरस लटक्यो आय।
पकरहि दुर्जन दुर्गति परै, तामें दुःख बहुते जिय भरै ॥
१६. सो दुख कहत नं आवै पार, जानत जिनवर ज्ञान मझार।
सुनतहि सुवटो चौंक्यो आप, यह तो मोह पस्यो सब पाप ॥
१७. ये दुख तौ सब मैं ही सहे, जो मुनिवर ने मुखतें कहे।
सुवटा सोचे हिये मँझार, ये गुरु साँचे तारनहार ॥
१८. मैं शठ फिस्यो करमवन माहिं, ऐसे गुरु कहुँ पाये नाहिं।
अब मोहि पुण्य उदै कछु भयो, साँचे गुरु को दर्शन लयो ॥
१९. गुरु की थुति कर बारम्बार, सुवटा सोचे हिये मँझार।
सुमरत आप पाप भज गयो, घट के पट खुल सम्यक् थयो ॥
२०. समकित होत लखी सब बात, यह मैं यह परद्रव्य विख्यात ।
चेतन के गुण निजमहिं धरे, पुद्गल रागादिक परिहरे ॥
२१. आप मगन अपने गुणमाहिं, जन्म-मरण भय जिनको नाहिं।
सिद्ध समान निहारत हिये, कर्मकलंक सबहि तज दिये ॥
२२. ध्यावत आप माहिं जगदीश, दुहुं पद एक विराजत ईश।
इहविधि सुवटो ध्यावत ध्यान, दिन-दिन प्रति प्रगटत कल्यान ॥
२३. अनुक्रम शिवपद जिय को भयो, सुख अनन्त विलसत नित नयो।
सत् संगति सबको सुख देय, जो कछु हिय में ज्ञान धरेय ॥
२४. केवलिपद आतम अनुभूत, घट-घट राजत ज्ञान संजूत ।
सुख अनन्त विलसे जिय सोय, जाके निजपद परगट होय ॥
२५. सुवा बत्तीसी सुनहु सुजान, निजपद प्रगटत परम निधान।
सुख अनन्त विलसहु ध्रुव नित्त, ‘भैया’ की विनती धर चित्त ॥
२६. सम्वत् सत्रह त्रैपन माहिं, आश्विन पहले पक्ष कहाहिं।
दशमी दशों दिशा परकाश, गुरु संगति तैं शिवसुखभास ॥
स्रोत — बृहद् आध्यात्मिक पाठ संग्रह · रचनाकार: भैया भगवतीदासजी
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