सूक्ति-सुधा | Sukti Sudha

सूक्ति-सुधा

-प्रो. वीरसागर जैन

सूक्ति या सुभाषित की महिमा का वर्णन नहीं किया जा सकता | कई बार तो एक ही सूक्ति पूरा जीवन बदल देती है | वैसे भी ज्ञानी पुरुष थोड़े में बहुत कहना ही उत्तम मानते हैं- ‘मितं च सारं च वचो हि वाग्मिता’ | संक्षिप्त कथन इसलिए भी अधिक प्रभावशाली सिद्ध होते हैं, क्योंकि उन्हें सहजता से कंठस्थ करके चिन्तन मन्थन की प्रक्रिया में प्रविष्ट कराया जा सकता है | सूक्तियों के प्रभाव का लम्बा इतिहास भी है | शिवभूति मुनि ने ‘तुषमाषभिन्नम्’ सूक्ति से ही केवलज्ञान प्राप्त किया था | सूक्तियां ही वास्तव में सच्चे एवं अमूल्य रत्न होते हैं | जीवन की शोभा इनको धारण करने से ही बढ़ती है | अतएव यहाँ कतिपय अमृत-समान सूक्तियां प्रस्तुत की जाती हैं । यथा-

  1. परिष्कार करो, बहिष्कार नहीं |
  2. प्रमाद छोड़ो, परिश्रम करो | प्रमाद विष है, परिश्रम अमृत |
  3. आत्मबलं बलं परबलं दुर्बलम् | ( ‘अपना हाथ जगन्नाथ’ )
  4. ‘महात्मा’ वह है जो न मुनि है, न महर्षि; न माइकल, न मुहम्मद |
  5. साधु वह है जिसके हृदय से शत्रु के प्रति भी शुभ कामना निकलती है |
  6. दार्शनिक वही है जो विरोधी को भी शांतिपूर्वक सुन सकता है |
  7. कहाँ रहना -यह महत्त्वपूर्ण नहीं है, कैसे रहना -यह महत्त्वपूर्ण है |
  8. हम गणतंत्र और जनतंत्र में ही नहीं, कणतंत्र में भी विश्वास रखते हैं ।
  9. योग व्यायाम नहीं, अपितु अध्यात्म का उच्च आयाम है ।
  10. योगी नहीं बन सको तो उपयोगी (धर्म, समाज, राष्ट्र के लिए) तो बनो |
  11. भजन बिना भोजन नहीं, स्वाध्याय बिना शयन नहीं |
  12. किसी का समय खराब करना भी बहुत बड़ी हिंसा है |
  13. हम अति मूढ़ हैं और जिनवचन अति गूढ़ हैं, अतएव गुरु की जरूरत है ।
  14. शिक्षक और गुरु में वही अंतर है जो टीचर और कोच में होता है |
  15. मुस्कुराहट का पुल बनाकर तो देखिए, दुःख का समुद्र भी हुआ तो सहज पार हो जायेगा|
  16. हमारा शरीर ही करोड़ों की मशीन से कम नहीं है, गन्ना डालो चीनी बना लेता है, व्यर्थ को फेंक देता है।
  17. दीपक तभी तक उपयोगी है, जब तक वस्तु न मिले | वस्तु मिलने के बाद दीपक भी हेय है |
  18. सच्चा परिवर्तन तो उपदेश से ही सम्भव है, आदेश से नहीं; दंड से भी नहीं |
  19. ज्ञानी वह है जो जन्मदिन पर भी जन्मरहित होने की भावना भाता है, मृत्यु के समय भी अमरता की भावना भाता है और गृहप्रवेश के दिन भी गृहत्याग का स्वप्न संजोता है |
  20. परद्रव्य को अपनी इच्छा से परिणमित करने की इच्छा आतंकवाद है, बलात्कार है |
  21. दुनिया में दो ही वाद हैं-अनेकांतवाद और आतंकवाद | जो अनेकांतवादी नहीं है वह नियम से आतंकवादी है |
  22. चींटी बनकर चीनी खाओ, हाथी बनकर गन्ने का खेत मत उजाड़ो | 23. अज्ञानी का गुरु बनने की बजाय ज्ञानी का शिष्य बनना अच्छा है ।
  23. नग बनना हो तो सोने जैसे लोगों की संगति करो |
  24. गोशाला खाली रहे तो चलेगा, परन्तु सींग मारने वाली गाय नहीं होनी चाहिए |
  25. जिन्दगी छोटी है और जंजाल लम्बा, अतः जंजाल कम कर,ताकि सुखरूप जिन्दगी लम्बी लगे |
  26. अहंकार-ममकार की कार से उतरो, णमोकार की कार में सवार होओ |
  27. वाचन से पाचन महान् है|(शतेनगुणितायाति सहस्रेण तु तिष्ठति|सहस्राणां सहस्रेण प्रेत्य चेह च तिष्ठति|)
  28. जिसका करना चाहिए स्मरण, उसका कर रखा है विस्मरण; जिसका करना चाहिए विस्मरण, उसका करते हैं स्मरण; इसीलिए हो रहा है जन्म-मरण | (दो कान)
  29. व्यर्थ का विसर्जन, सार्थक का सृजन |
  30. जो अपने पूर्वजों का स्मरण नहीं करता, उसका मरण होता है ।
  31. जो न्यायपूर्वक कमाया गया हो, यत्नाचारपूर्वक बनाया गया हो, वात्सल्यपूर्वक खिलाया गया हो और अनासक्तिपूर्वक खाया गया हो, उसे शुद्ध भोजन (चौका) कहते हैं |
  32. जो अपकारी का भी उपकार चाहे वही साधु है ।
  33. सहज पके सो मीठा होय | (अरिहंत सहज है होना)
  34. भाषण गन्ने जैसा होना चाहिए, बांस जैसा नहीं |
  35. जिनकी बात में गहराई नहीं होती, वे उसे लम्बाई से पूरा करने की असफल चेष्टा करते हैं।
  36. इच्छा कम समझौता ज्यादा, सुख शांति का पक्का वादा |
  37. मेहँदी का रंग सात दिन में उतर जाता है, मेहनत का रंग सात जन्म में भी नहीं उतरता |
  38. गुरु के दर्शन मिलना भाग्य है, उनका उपदेश भी मिल जाए तो महाभाग्य है, किन्तु उनकी डांट मिल जाए तो अहोभाग्य है | ( लालनात् बहवो दोषा, ताडनात् बहवो गुणा | तस्मात् पुत्रञ्च शिष्यञ्च, ताडयेत् न तु लालयेत् || )
  39. अज्ञान से बड़ा कोई अंधकार नहीं है और ज्ञान से बड़ा कोई प्रकाश नहीं है ।
  40. अज्ञान से बड़ा कोई विष नहीं है और ज्ञान से बड़ा कोई अमृत नहीं है।
  41. अज्ञान से बड़ा कोई कष्ट नहीं है और ज्ञान से बड़ा कोई आनन्द नहीं है ।
  42. क्रोध पर ही क्रोध करो बोध हो-ताकि जीवन का शोध, |
  43. पढ़ाना भी पढ़ने का ही एक उत्तम प्रकार है | (Teaching is the best way of learning.)
  44. आठ वर्ष के व्यक्ति को बोलना सीखना चाहिए और साठ वर्ष के व्यक्ति को चुप रहना |
  45. जिन्दगी में जो शेष है उसे ही विशेष बना लो, वरना अवशेष ही शेष रह जाएगा |
  46. जानने को तीन लोक हैं, पर छोड़ने को तीन काम हैं- मोह, राग, द्वेष |
  47. भोजन को दवाई की तरह खाओ, वरना दवाइयाँ भोजन की तरह खानी पड़ेंगी |

पृथिव्यां त्रीणि रत्नानि, जलमन्नं सुभाषितम् | मूढैः पाषाणखंडेषु, रत्नसंज्ञा विधीयते ||