सुख-साधन | Sukh-Saadhan

तर्ज : आत्मन् अपनी वैभव गाथा…

अब तक नहीं जाना हमने, सम्यक्त्व धर्म का मूल है।
इसको नहीं अपनाया अब तक, यही हमारी भूल है।। 1 ।।

इसके अभाव में डोले जग में, जप-तप बहुत किया है।
उसको धर्म मान करके, मिथ्यात्व को पुष्ट किया है।। 2 ।।

पुण्य किया है पाप छोड़कर, पुण्य छोड़कर पापा।
धर्म को अब तक नहीं जाना, और नहीं जाना है आपा।। 3 ।।

आपे से बाहर रह करके, अपनी सुधि विसराई।
निज की श्रद्धा-ज्ञान नहीं, परिणति अशुद्ध ही आई।। 4।।

मीठी औषधि भी चाहत है, रोग से मुक्ति चाहे।
कड़वी औषधि फैंक दई, और पेड़े को खा जाए।। 5।।

इस प्रकार यह रोग बढ़त है, अन्त नहीं आता है।
मोक्षमार्ग से च्युत रहता, संसार में दुःख पाता है।। 6।।

रोग से मुक्ति पाने को, कड़वी औषधि खानी होगी।
जिनदेव-गुरु-जिनवाणी की, सच्ची श्रद्धा लानी होगी।। 7 ।।

पुण्य-पाप को त्याग आत्म में, आगे ही बढ़ना होगा।
निर्विकल्पता वीतरागता से ही सच्चा सुख होगा।। ८।।

यदि सत्य हमारा निश्चय है तो मोक्ष हमारा कूल है।
इसको नहीं अपनाया अब तक, यही हमारी भूल है।। ९।।


Artist: ब्र. रवीन्द्र जी ‘आत्मन्’
स्रोत: सहज पाठ संग्रह

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