सुख का है एक उपाय यही।
पूर्णानंदमय आतम अनुभव, सुख का एक उपाय यही ।। टेक ।।
करने का अवकाश न जिसमें, पूर्ण प्रभु सुखधाम है।
स्वाश्रय पूर्वक स्वयं होय सुख, वस्तु व्यवस्था सहज यही ।। 1 ।।
इन्द्रिय सुख तो दुखमूल है, अतीन्द्रिय सुख की वांछा।
आकुलतामय दुःखरूप ही, जिनशासन में प्रभु कही।। 2।।
परमात्मा को सुखी बनाने का, ज्यों कभी विकल्प न हो।
विस्मय शाश्वत परमात्मा का, सहज रूप सुख दिखे नहीं।।३।।
जोड़े नाना सामग्री, भोगों में सुख पापी ढूंढे।
व्यवहारी भी रचे पुण्य में, पावे सुख का लेश नहीं।। ४।।
चिन्ते रत्नत्रय प्रगटे तो, जीवन सुखमय हो जावे।
पर्यय दृष्टि धरे मूढ़, सम्यक् रत्नत्रय लहे नहीं।। ५।।
रत्नत्रय सुख का कारण, अर्थात् नहीं सुख को करना।
रवि ज्यों सहज प्रकाश पुंज, त्यों सहजानंदमय जीव सही ।। ६ ।।
हो जब सम्यक् सहज प्रतीति, स्वयं स्वतः सुख दिख जाता।
स्वयं-स्वयं में थिरता होवे, सहजहि पावे मुक्तिमही ।। ७।।
दुर्विकल्प तज अब तो ‘आत्मन्’ सम्यक् भेद विज्ञान करो।
अंतर में ही अमृत झरता, तृप्त रहो गुरु सीख यही ।। ८।।
Artist: ब्र. रवीन्द्र जी ‘आत्मन्’
स्रोत: सहज पाठ संग्रह