स्व-पर विवेक बिना इस जग में, सुख किंचित् नहीं पाओगे।
निज शुद्धातम के भान बिना, भव-भव भरमें भरमाओगे ।। 1 ।।
प्रगट जुदे धन धाम कुटुम्बादिक से नहीं तेरा नाता।
सुर धनु जल तरंग सम अस्थिर, व्यर्थ मोहवश अकुलाता ।। 2 ।।
अशुचि कृतघ्नी मूर्तिक जड़मय, अरे सम्भाले क्या प्राणी।
माटी की ये बनी है काया, माटी में ही मिल जानी।। 3।।
न्यारी लीला जड़ कर्मों की, नाना रंग दिखाते हैं।
निज-निज स्थिति पूरी करके, तुरत अलग हो जाते हैं।। 4।।
मोहादिक जो भाव कर्म तेरी ही मलिन अवस्थायें ।
परलक्षी दुःखमय अध्रुव, पुद्गलमय ज्ञानी दरशायें ।। 5।।
दूर रहें ये, शुद्ध परिणति का भी लक्ष्य करना।
‘आत्मन्’ भेद विकल्पों से भी न्यारी ध्रुव दृष्टि धरना।। 6।।
परम ज्ञेय-श्रद्धेय-ध्येय है, शाश्वत कारण परमात्मा।
आश्रय करने योग्य यही, चिन्मय ज्ञायक स्व शुद्धात्मा।। 7।।
Artist: ब्र. रवीन्द्र जी ‘आत्मन्’
स्रोत: सहज पाठ संग्रह