सुभाषित-विंशतिका सार | Subhashit-Vinshatika Saar

सम्यग्ज्ञान ही रूप है, श्रेष्ठ गुप्त धन जान।
ज्ञान भोग यश सुख दे, गुरुओं का गुरु ज्ञान।। 1।।

ज्ञान है बन्धु विदेश में, परम देव है ज्ञान।
राजाओं से पूज्य है, ज्ञान रहित पशु मान।। 2।।

है परोक्ष दर्शक तथा, नाशक संशय द्वन्द्व ।
सबका लोचन शास्त्र है, नहिं जिसके वह अंध ।। 3 ।।

नारिकेल सम जगत् में, सज्जन को तू जान ।
बाहर मृदु भीतर कठिन, दुर्जन बेर समान।। 4।।

अरे अनादर अन्य का, क्रोध दुर्वचन मान।
हठता लक्षण मूर्ख का, मान मान तू मान।। 5।।

सदा देख कर पग धरे, पिये सदा जल छान।
मन पवित्र आचरण कर, श्रुत सम्मत वच आन।। 6 ।।

करे न मैत्री दुष्ट संग, प्रीति भी न करेय।
उष्ण कोयला जलाता, ठंडा कृष्ण करेय।। 7।।

त्यागशीलता चतुरता, भय-लज्जा जिस माँहि ।
अरु यात्रा रुचि हो नहीं, कीजे संगति नांहि ।। 8।।

शुचि उदारता शौर्य अरु, सुख-दुःख में हो समान।
सच्चा प्रेमी चतुर हो, उसे मित्र तू मान।। ९।।

अजर अमर तू मानकर, साधे धन अरु ज्ञान।
मृत्यु केश पकड़े समझ, करे धर्म का ध्यान।। 10।।

मात-पिता, गुरु-स्वामी, सुत, भाई-सखा सु जान।
इन विरुद्ध नहिं आचरे, करे नहीं अपमान।। 11 ।।

ऐश्वर्य वाँछक पुरुष को, त्याज्य क्रोध भय मान।
निद्रा, तन्द्रा, अलसता, दीर्घ सूत्रता जान।। 12।।

कभी नहीं छोड़े पुरुष, सत्य क्षमा अरु दान।
अनसूया अरु धीरता अप्रमाद सुखखान।। 13।।

विद्या धन अरु शिल्प का, होय न तब तक ज्ञान।
जब तक मानव नहिं करे, देशाटन अभिराम।। 14।।

तुच्छ बुद्धि इस जगत् में, मेरा-तेरा ठान।
जो उदार चित पुरुष है, पृथ्वी कुटुम्ब समान।। 15 ।।

बचपन में विद्या नहीं, यौवन में धन नाहिं।
वृद्धपने में पुण्य नहीं, मरते क्या वे कराहिं ।। 16।।

कर का भूषण दान है, कंठ का भूषण साँच।
कर्ण का भूषण श्रुत-श्रवण, अन्य को डालो आँच ।। 17 ।।

उद्यम, साहस, धैर्य बुधि, शक्ति पराक्रम जान।
जहाँ वर्तते हैं तहाँ, देव सहाई आन।। 18।।

धैर्य विपद में हो क्षमा, ऐश्वर्य के सद्भाव।
विक्रम होवे युद्ध में, सभा में वचन प्रभाव।। 19।।

शास्त्र श्रवण का हो व्यसन, यश के करता काज।
प्रकृति सज्जन पुरुष की, होती ये ही आज।। 20।।

सत्पुरुषों जैसा बने, अथवा पशु समान।
प्रतिदिन अपने चरित की, करत रहे पहिचान।। 21।।


Artist: ब्र. रवीन्द्र जी ‘आत्मन्’
स्रोत: सहज पाठ संग्रह