सिरि भूवलय (आचार्य कुमुदेन्दु) | Siri Bhoovalaya (Acharya Kumudendu)

सिरि भूवलय

रचयिता: दिगम्बर जैनाचार्य श्री कुमुदेन्दु (पुस्तक के अनुसार लगभग ई. सन् 813-814, राष्ट्रकूट सम्राट अमोघवर्ष के राजगुरु)
संशोधक: स्व. पं. यल्लप्पा शास्त्री (बेंगलौर), जिनके पास यह ग्रन्थ सुरक्षित था
प्रकाशक: श्री भूवलय प्रकाशन समिति (जैन मित्र मंडल), धर्मपुरा, देहली
संस्करण: पौष शुक्ला 1, वि.सं. 2014, वीर निर्वाण सं. 2484
पीडीएफ: 258 पृष्ठ

परिचय (सार)

सिरि भूवलय अक्षरों में नहीं, अंकों में लिखा ग्रन्थ है। प्रकाशकीय वक्तव्य के अनुसार यह 64 अंकों में है, जिनसे कन्नड़ भाषा के ह्रस्व, दीर्घ आदि अक्षर बनते हैं। अंक 27 × 27 कोठों के चक्र (चक्रबन्ध) में भरे हैं; हर अंक का एक संकेत अक्षर है, और चक्र को अलग-अलग क्रम से पढ़ने पर पद्य निकलते हैं। पुस्तक के अनुसार कुमुदेन्दु आचार्य ने इसे “सर्व भाषामय कर्नाटक काव्य” कहा है, और प्रकाशक इसमें 18 महाभाषाएँ और 700 लघु भाषाएँ गर्भित बताते हैं।

पुस्तक में क्या है:

  • समर्पण, प्रकाशकीय वक्तव्य और समिति का परिचय: ग्रन्थ कैसे पं. यल्लप्पा शास्त्री से आचार्य देशभूषणजी तक पहुँचा और 1957 में देहली से छपा। प्रकाशक लिखते हैं कि राष्ट्रपति डा. राजेन्द्रप्रसाद ने इसे संसार का आठवां आश्चर्य कहा और इसका कुछ भाग माइक्रोफिल्म कराकर राष्ट्रीय संग्रहालय में रखा गया।
  • श्रीभूवलय-परिचय: कुमुदेन्दु आचार्य और उनका समय, उनकी बताई गुरु परम्परा, भाषा और लिपि, भूवलय की परम्परा का इतिहास, गणित काव्य, छंद और बंधों के नाम, मूल ग्रन्थ और उसकी उपलब्धि, अध्यायवार परिचय, और चक्रबन्ध पढ़ने का क्रम।
  • मूल: “अ” अंक का चक्र और अध्याय 1 से 14। हर अध्याय से पहले उसके अंक-चक्र हैं, फिर उनसे निकले पद्य और हिन्दी में अर्थ-विवेचन।
  • अंत में “श्रुतावतार खंड दूसरा” के अंक-चक्र।

अध्याय (पुस्तक के अन्दर के शीर्षकों से):

क्र. अध्याय पीडीएफ पृष्ठ
1 प्रथम (“अ” अध्याय, मंगल प्राभृत) 23
2 दूसरा 43
3 तीसरा 69
4 चौथा 77
5 पांचवां 99
6 छठा 111
7 सातवां 131
8 आठवां 143
9 नौवां 154
10 दसवां 173
11 ग्यारहवां 187
12 बारहवां 198
13 तेरहवां 215
14 चौदहवां 238

ध्यान दें: मूल पाठ अंक-चक्रों के रूप में है, इसलिए उसे यहाँ अलग से टाइप नहीं किया गया; पूरा ग्रन्थ नीचे की पीडीएफ में है। काल-निर्णय और भाषाओं की संख्या पुस्तक के सम्पादकों के कथन हैं।

किसके लिए उपयोगी: जो जैन साहित्य की इस अनोखी अंक-पद्धति, कन्नड़ जैन परम्परा और कुमुदेन्दु आचार्य के बारे में पढ़ना चाहते हैं, और शोध करने वाले।

नीचे पूरी पुस्तक की पीडीएफ है।

स्रोत: Bhoovalaya.pdf

Bhoovalaya.pdf (33406 KB)

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