सीख दीजिए ताहि को जाको सीख सुहाय | Sikh Dijie Tahi Ko Jako Sikh Suhay

सीख दीजिए ताहि को जाको सीख सुहाय

-डॉ. वीरसागर जैन

एक सूक्ति संसार की प्रायः सभी भाषाओं में यत्किचित् परिवर्तन के साथ उपलब्ध होती है, जिसका अभिप्राय है कि हमें अपात्र व्यक्ति को कभी कोई उपदेश/ शिक्षा नहीं देना चाहिए, अन्यथा लाभ की बजाय हानि हो जाती है। हिन्दी भाषा के निम्नलिखित दोहे से तो प्रायः हम सभी परिचित हैं ही-

“सीख दीजिए ताहि को, जाको सीख सुहाय।
सीख न दीजे वानरा, घर चिड़िया को जाय।।”

विश्व की प्राचीनतर भाषा प्राकृत में भी ठीक इसी अभिप्राय की दो गाथाएं इस प्रकार उपलब्ध होती हैं-

“वाणर ! पुरिसोसि तुमं, णिरत्थयं वहसि बाहुदंडाई ।
जो पायवस्स सिहरेण, करेसि कुडिं पडालिं वा ।।
णविसि मयं मयहरिया, णविसि मयं सोहिया व णिद्धावा ।
सुघरे अच्छसु विघरा, जा वहसि लोगतत्तीसु ।।"

अर्थ- वर्षा काल में शीत से कम्पायमान एक वानर को देखकर बया पक्षी ने उससे कहा- “हे वानर! पुरुष के समान हाथ- पैर वाले होकर भी तुम कोई कुटिया क्यों नहीं बना लेते ? व्यर्थ ही क्यों ठिठुर रहे हो ?” बया से यह उपदेश सुनकर उस वानर को क्रोध उत्पन्न हुआ और उसने उस बया पक्षी के घोसले को तिनका- तिनका कर हवा में उछाल दिया। फिर बोला- “हे सुघरे ! अब तू भी बिना घर के रह ।”

सभी भाषाओं में इस प्रकार की सूक्ति मिलने से यह स्पष्ट होता है कि यह हमारे पूर्वजों का एक सार्वभौमिक और सार्वकालिक चिन्तन (सनातन सत्य) रहा है तथा इसके पीछे उनका एक गहरा सन्देश हमारे लिए छुपा हुआ है, जिसे हमें जीवन में सदैव याद रखना चाहिए।

हम अक्सर किसी को भी कुछ शिक्षा देने लग जाते हैं, मानो हम ही संसार के सबसे बड़े गुरु हैं। सामने वाला उस उपदेश के लिए सर्वथा योग्य है या नहीं- यह विचार करना तो दूर; जिन बातों का अभी हमें स्वयं ही पूर्ण ज्ञान नहीं हुआ है, अथवा जिनको अभी हम स्वयं ही अपने जीवन में ठीक से नहीं उतार पाये हैं, हम उनका भी दूसरों को तुरन्त उपदेश देने लग जाते हैं। जबकि सर्वप्रथम अपने को सुधारने का ही सर्व शास्त्रों में स्पष्ट निर्देश है, जिसे किसी हिन्दी कवि ने बड़ी अच्छी तरह यूँ प्रकट किया है–

“अरे सुधारक जगत् के, चिन्ता मत कर यार।
तेरा मन ही जगत् है, पहले इसे सुधार।।”

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी अक्सर कहा करते थे कि जिस बात पर मैं स्वयं नहीं चलता, उसे दूसरे से भी नहीं कहता हूँ। यहाँ तक कि मैं तो बिना कुछ कहे ही शिक्षा देने को अधिक अच्छा समझता हूँ- ‘मेरा जीवन ही मेरा संदेश है ।’ जीवन से दी गई शिक्षा वाणी से दी गई शिक्षा की अपेक्षा अधिक असरकारी होती है।

किन्तु आज हमारी स्थिति उससे विपरीत ही हो रही है। हम स्वयं को सुधारे बिना दूसरों को सुधरने का उपदेश दे-देकर ‘परोपदेशे पांडित्यम्’ की उक्ति को चरितार्थ कर रहे हैं। उसमें भी वह उस बात के लिए पात्र है या नहीं, उसे हमारी बात पसन्द भी आ रही है या नहीं- इसका भी हम ध्यान नहीं रखते और बार-बार उसे अपना उपदेश दे-देकर उत्तेजित होने के लिए मजबूर कर देते हैं। आज यही घर-घर में कलह का भी एक बड़ा कारण बना हुआ है।

हमें कभी भी, किसी को भी, कुछ भी कहने से पहले भलीभाँति विचार कर लेना आवश्यक होता है कि सामने वाला उस शिक्षा के योग्य भी है या नहीं, उसे हमारी बात अच्छी भी लगेगी या नहीं, हमारी यह बात सचमुच उसके हित में है या नहीं, क्या इसी समय और इसी तरीके से कहना उचित है, इत्यादि; अन्यथा मौन ही सर्वथा श्रेयस्कर होगा।

वचन बोलना कोई आसान काम नहीं है। जिस प्रकार हमें गाड़ी चलाना आता हो और हमारे पास उसका वैधानिक अधिकार (लाइसेंस) हो, तभी हम गाड़ी लेकर सड़क पर आते हैं, अन्यथा भयंकर दुर्घटनाएँ होती हैं; उसी प्रकार इस जबान को चलाना भी भलीभाँति सीखना आवश्यक है, तभी कुछ ठीक से बोला जा सकता है, अन्यथा इससे इतिहास में अनेक दुर्घटनाएँ हुई हैं, आज भी होती रहती हैं और भविष्य में भी होती रहेंगी।

जिस प्रकार हम अपने पर्स का एक-एक रुपया सोच-समझकर उचित स्थान पर खर्च करते हैं, उसी प्रकार हमें अपने मुख से एक-एक शब्द बहुत सोच-समझकर उचित स्थान, उचित समय एवं उचित व्यक्ति के ही सामने निकालना चाहिए; कहीं भी, कभी भी, किसी के भी सामने नहीं।

जिस प्रकार फल खट्टे और मीठे दोनों प्रकार के होते हैं, उसी प्रकार शब्द भी खट्टे और मीठे दोनों प्रकार के होते हैं और उनका वैसा ही कुप्रभाव और सुप्रभाव भी उनके श्रोता पर अवश्य पड़ता है। उदाहरणार्थ, किसी को ‘राम’ या ‘सीता’ आदि शब्दों से सम्बोधित करके देखिए और किसी को ‘रावण’ या मथरा’ आदि शब्दों से सम्बोधित करके देखिए। अन्तर आपको स्वयं पता चल जाएगा। अतः जिस प्रकार हम खट्टे फलों को न लेकर मीठे फलों को ही चुनते हैं, उसी प्रकार कटु शब्दों को छोड़कर मधुर वचनों का ही प्रयोग करना उचित है।

सारांश यही है कि हमारी वाणी अत्यधिक मूल्यवान् होती है, हमें उसका मूल्य समझना चाहिए और उसका यद्वा-तद्वा दुरुपयोग न करके सदा सदुपयोग ही करना चाहिए।

ऐसी वाणी बोलिए-

ऐसी वाणी बोलिए, मन का आपा खोय।
औरन को सीतल करे, आपहु सीतल होय।।

कोयल काको देत है, कागा कासों लेय।
मीठे वचन सुनाय के, जग अपनो कर लेय।

बोली बड़ी अमोल है, जो कोई बोले जानि।
हिये तराजू तोलके, फिर मुख बाहिर आनि।।

तुलसी मीठे वचन से, सुख उपजत चहुँ ओर।
वशीकरण इक मंत्र है, तजिए वचन कठोर।।