सिद्ध पद की भावना | Siddh Pad ki Bhavana

तर्ज : शांत चित्त हो निर्विकल्प हो…

कब माया जाल विकल्प तजूँ, अविनाशी निज पद को ध्याऊँ।
मन-वचन-काय है भिन्न सदा, मुझसे यह बात हिये लाऊँ।। 1।।

सुख की परिभाषा सत्य गहूँ, सुख हेतु नहीं पर पद चाहूँ।
नहिं इष्ट वियोग में क्लेश करूँ, संयोग स्वयं ही ठुकराऊँ।। 2।।

धन-वैभव तो दुःख रूप, महा-आकुलता जनक कहाता है।
इनके फन्दे में फँसा जीव, निश्चिंत नहीं हो पाता है।। 3।।

है महामूढ़ दृष्टि यह भी, काया में तन्मय होता है।
जब यथाजात पद को धारे, तब ही अविचल सुख होता है।। 4।।

काया से होवे नग्न तथा, भावों से सदा दिगम्बर हो।
दश बाह्य परिग्रह तजे हुए, भीतर न राग का अम्बर हो।। 5।।

मन में आत्मा का ध्यान सदा, वाणी स्वरूप को कहती हो।
उपसर्गों में भी समता हो, परिणति निज में ही रहती हो।। 6।।

पंच महाव्रत समिति-गुप्तियों का, कब सम्यक् पालन हो।
पंच इन्द्रियाँ वश में होवें, नग्न रूप थिर धारण हो।। 7।।

षट्-आवश्यक नित्य पलें, एक बार खड़े ही हो भोजन।
केश लौंच निद्रा सीमित, मंजन मज्जन का भी त्यागन।। 8।।

शुद्धोपयोग मुनिधर्म सही, अट्ठाईस गुण व्यवहार कहे।
इनके विकल्प से रहित परिणति, निज स्वभाव में लीन रहे।। 9।।

पृथकत्व वितर्क ध्यान द्वारा, चारित्र मोहनीय भी विनशे।
एकत्व ध्यान अविचल द्वारा, निज अनंत चतुष्टय रूप लसे।। 10।।

फिर सूक्ष्म योग से रहित अयोगी, दशा धन्य सहजहि होगी।
काया अरु कर्म सभी छूटें, ध्रुव सिद्ध दशा क्षण में होगी।। 11।।

लोकाग्र शिखर पर सिद्ध शिला, तनुवात वलय में वास रहे।
फिर कभी न भव में आना हो, सादि अनंत तक अचल रहें।। 12।।


Artist: ब्र. रवीन्द्र जी ‘आत्मन्’
स्रोत: सहज पाठ संग्रह