शुद्धोपयोग भावना | Shuddhopyog Bhavana

प्रभुवर तुम्हें निर्ग्रन्थ लखकर, हो सहज ही भावना।
रहूँ मैं निर्ग्रन्थ स्वामिन् ! हो परिग्रह लेश ना।। 1।।

शान्त मन हो शान्तिमय, चिद्भाव का अनुभव रहे।
कृतकृत्य तृप्त रहूँ सहज, कर्तव्य किंचित् नहीं रहे।। 2।।

निस्पृह निःसंग रहूँ सदा, दुर्भाव उत्पन्न ही न हो।
ज्ञेय मात्र रहे सभी, अन्तर न द्वन्द्व न फन्द हो।। 3।।

ज्ञायक हूँ, ज्ञायक ही रहूँ, नहिं कुछ प्रयोजन शेष है।
संतुष्ट निज में ही हुआ, वाँछा हुई निःशेष है।। 4।।

भव भोग जगत् स्वरूप लख, सहजहिं उदासी हो गयी।
दीखे न कुछ भी सुख वहाँ प्रभु आश मिथ्या मिट गयी।। 5।।

सर्वस्व पाया स्वयं में, प्रभुता अहो प्रभु सम दिखी।
ज्ञान पाया, सुख पाया, सहज मुक्ति भी दिखी।। 6।।

अब न किंचित् भय रहा, निर्भय स्वतंत्र रहूँ सदा।
अरि-मित्र-महल-मसान माँही, रहे समता सर्वदा।। 7।।

शुद्धोपयोग अछिन्न वर्ते, कर्म सब नाशें सहज।
छूटे सहज आवागमन, परमात्म पद प्रगटे सहज।। 8।।

बहुमान से पूरित हृदय, प्रभु भक्ति उमगे सहज ही।
होवे सहज आराधना, प्रभु नमन भी हो सहज ही।। 9।।


Artist: ब्र. रवीन्द्र जी ‘आत्मन्’
स्रोत: सहज पाठ संग्रह