मैं निज में रम कर निज को पाना चाहूँगा ।
मुक्तिपुरी में जा करके, चैतन्य स्वरूप को पाऊंगा ।।
स्व-पर का भेद विज्ञान होना सबसे मूल कहा ।
भेद-विज्ञान होते ही सुख अनंत को पाऊंगा ।।
ज्ञान अनंत, दर्शन अनंत, अनंत वीर्य को पाकर के ।
अरिहंत अवस्था धारण कर सिद्धत्व दशा को पाऊंगा ।।
AJ
रचनाकार: शैलेंद्र जैन (Shailendra Jain), भोपाल
Instagram: @shailendraJain342