शुभोपयोग प्रशंसनीय है, उपादेय नहीं
-डॉ. वीरसागर जैन
आत्मा का उपयोग तीन प्रकार का है- अशुभोपयोग, शुभोपयोग और शुद्धोपयोग । अशुभोपयोग सर्वथा हेय है और शुद्धोपयोग सर्वथा उपादेय है। शुभोपयोग दोनों के मध्य में स्थित है, अतः उसे अशुभोपयोग की अपेक्षा उपादेय कहा जाता है और शुद्धोपयोग की अपेक्षा हेय कहा जाता है। प्रश्न है कि शुभोपयोग वास्तव में कैसा है- हेय या उपादेय?
उत्तर- शास्त्रों में शुभोपयोग को बन्ध का कारण बताकर भी परम्परा से शुद्धोपयोग का कारण कहा गया है, अतः उसे सर्वथा हेय कहना भी गलत है और सर्वथा उपादेय कहना भी गलत है। दोनों ही अपेक्षाओं को सही-सही समझना आवश्यक है, तभी हम इस सम्बन्ध में शास्त्रानुकूल प्रवृत्ति कर सकते हैं, अन्यथा नहीं। अन्यथा तो इस विषय में भटक जाने की भारी संभावना है, बहुत लोग भटक चुके हैं।
शुभोपयोग को उपादेय निम्नलिखित कारणों से कहा जाता है-
- वह हमें अशुभोपयोग से बचाता है जो घोर दुःखों का कारण है।
- शुभ निमित्तों में बनाए रखता है, ताकि शुद्धोपयोग का अवसर बना रहे।
- वह शुद्धोपयोग का परम्परा कारण होता है | कोई भी जीव अशुभोपयोग से सीधे शुद्धोपयोग में नहीं जा सकता है | सभी जीवों को सदा शुभोपयोगपूर्वक ही शुद्धोपयोग होता है।
- शुभोपयोग से मात्र बन्ध ही नहीं होता, अशुभकर्मों का क्षय (निर्जरा) भी होता है¹, अतः उसमें विशुद्धता गर्भित कही गई है। उसे विशुद्ध परिणाम भी कहा गया है।
शुभोपयोग को हेय निम्नलिखित कारणों से कहा जाता है-
- वह भी अशुद्धोपयोग का ही भेद है, अतः अशुद्धोपयोग ही है, विकारी भाव ही है, आकुलतामय ही है, निराकुलतामय नहीं है।
- जिसप्रकार लोहे की बेड़ी की भाँति सोने की बेड़ी भी बांधती ही है, उसी प्रकार अशुभोपयोग की भांति शुभोपयोग भी बन्ध का ही कारण है, मोक्ष का कारण नहीं है।
- शुभोपयोग शुभोपयोग के लिए नहीं है, शुद्धोपयोग के लिए है। शुभोपयोग बीच में आने वाला पड़ाव मात्र है, वह जीवन का लक्ष्य/उद्देश्य साध्य नहीं है। साध्य तो एकमात्र शुद्धोपयोग ही हो सकता है। जो व्यक्ति शुभोपयोग को अपना साध्य मानते हैं, वे अपद में ही सन्तुष्ट हो जाने से ‘प्रमादी’ एवं ‘मन्दोद्यमी’ कहे गए हैं और शुभोपयोग में आकर भी उससे ऊपर उठकर शुद्धोपयोग को प्रकट न कर पाने के कारण नपुंसक भी कहे गये हैं।² जो जीव शुभोपयोग के लिए ही शुभोपयोग करते हैं, वे शुद्धोपयोग तो कर ही नहीं पाते, उनका शुभोपयोग भी अच्छी गुणवत्ता वाला नहीं हो पाता। उसीप्रकार, जिसप्रकार कि घास के लिए ही खेती करने वाले के खेत में उतना अच्छा घास पैदा नहीं होता, जितना कि अन्न के लिए खेती की जाए तो सहज ही अच्छा घास होता है।
शुभोपयोग की अभिलाषा प्रकारान्तर से अशुभोपयोग की ही अभिलाषा है, संसार की ही अभिलाषा है, मोक्ष की नहीं, अतः शुभोपयोग के अभिलाषी को मिथ्यादृष्टि भी कहा गया है। ध्यान रहे, शुभोपयोगी को मिथ्यादृष्टि नहीं कहा गया है, अपितु शुभोपयोग के अभिलाषी को मिथ्यादृष्टि कहा गया है। जो जीव शुभोपयोग के लिए ही शुभोपयोग करते हैं, वे वास्तव में संसाराभिलाषी होने से मिथ्यादृष्टि ही हैं।
तात्पर्य यह है कि हमें यदि मुक्ति चाहिए, सच्चा सुख चाहिए तो अपने जीवन का लक्ष्य एकमात्र शुद्धोपयोग को ही बनाना चाहिए, वही हमें निराकुलतामय आत्मसुख प्रदान कर सकता है, अशुभोपयोग और शुभोपयोग - ये दोनों तो आकुलतामय होने से हमें सच्चा सुख प्रदान नहीं कर सकते।
किन्तु एकमात्र शुद्धोपयोग को ही अपने जीवन का लक्ष्य बनाते हुए भी हमें शुभोपयोग की सर्वथा निन्दा नहीं करनी चाहिए, क्योंकि शास्त्रों में अनेक दृष्टियों से उसकी प्रशंसा भी की है। प्राथमिक अवस्था में जीवों को शुभोपयोग ही अशुभोपयोग से बचाता है और शुद्धोपयोग की ओर बढ़ने में सहायता प्रदान करता है। अतः बड़े-बड़े ज्ञानियों ने भी उस शुभोपयोग की मुक्त कण्ठ से प्रशंसा की है।
परन्तु यह अच्छी तरह ध्यान रखना चाहिए कि शुभोपयोग में लगने का उद्देश्य शुभोपयोग ही नहीं है, शुद्धोपयोग है, अतः शुभोपयोग का अवलम्बन लेते समय हमें हमेशा शुद्धोपयोग हेतु प्रयत्नशील होना चाहिए। अन्यथा हम आचार्यों का अभिप्राय ही नहीं समझ सकेंगे और अपने लक्ष्य (दुःखनिवृत्ति, सुखप्राप्ति अथवा मोक्ष) की प्राप्ति में भी सफल नहीं हो सकेंगे। तथा यदि शुभोपयोग के लिए ही शुभोपयोग की अभिलाषा की, तब तो हम संसाराभिलाषी और मिथ्यादृष्टि ही कहलाएंगे। जो जीव शुद्धोपयोग के लिए शुभोपयोग का अवलम्बन लेते हैं और शुद्धोपयोग नहीं कर पाते हैं, उन्हें ही जब हमारे आचार्यों ने ‘प्रमादी’ और ‘नपुंसक’ जैसे शब्दों से कहा है तो जो जीव शुभोपयोग के लिए ही शुभोपयोग को चाहते हैं वे तो मिथ्यादृष्टि और दीर्घ संसारी ही हैं।
शुभोपयोग की ऐसी स्थिति होने के कारण ही जिनवाणी का कुशल वक्ता प्रायः कभी भी सीधे तौर पर ऐसा भी नहीं कहता कि- शुभोपयोग सर्वथा बुरा है, हेय है, छोड़ दो, इसके चक्कर में मत पड़ो, ये तो घोर बन्ध का कारण है, इत्यादि। और ऐसा भी नहीं कहता कि- शुभोपयोग सर्वथा अच्छा है, उपादेय है, खूब करो, लगे रहो इसमें, इससे अनन्त सुख-शान्ति मिल जाएगी तुम्हें, इत्यादि।
अपितु इस प्रकार कहता है कि पाप को छोड़ दिया, शाबाश ! परन्तु अब पुण्यक्रियाओं में भी मत अटको, ये भी हमारा उद्देश्य नहीं है। हमें अभी और आगे चलना है, ये पुण्य-क्रिया तो पड़ाव मात्र हैं, गन्तव्य नहीं। तथा ये तो वस्तुतः साधनमात्र हैं, जिनकी सार्थकता/सफलता शुद्धोपयोगरूप साध्य को सिद्ध करने में ही निहित है।
तथा यदि किसी जीव के बहुत प्रेरणा देने पर भी शुद्धोपयोग होना अभी असंभव-सा ही जान पड़े तो उसे अकेले शुभोपयोग का भी उपदेश देता है, ताकि वह घोर अशुभोपयोग में न चला जाए और उसे शुद्धोपयोग का अवसर बना रहे।
किन्तु जो जीव शुद्धोपयोग कर सकता है फिर भी करता नहीं है अपितु शुभोपयोग में ही आसक्त रहता है उसे तो अनेक प्रकार से डाँटा ही जाता है, कठोरतापूर्वक शुभोपयोग की निन्दा ही सुनाई जाती है, ताकि वह वहाँ से निकलकर शुद्धोपयोग में जा सके। कीचड़ में धँसी हुई गाड़ी को निकालने के लिए बैलों को सामान्य से कुछ अधिक ही जोर लगाना पड़ता है।
सन्दर्भ-
१. सुहसुद्धपरिणामेहि कम्मक्खयाभावे तक्खयाणुववत्तीदो ।- जयधवला १. पृष्ठ ६
(अर्थ- यदि शुभ व शुद्ध परिणामों से कर्मक्षय न होता हो तो फिर कैसे भी कर्मक्षय हो ही नहीं सकता।)
२.आचार्य अमृतचन्द्र, समयसार-टीका, गाथा १५४
तीन प्रकार की परिणति
परनति सब जीवन की, तीन भाँति वरनी। एक पुण्य एक पाप, एक रागहरनी।।टेक॥
तामें शुभ अशुभ अंध, दोय करें कर्मबंध, वीतराग परनति ही, भवसमुद्र तरनी॥१॥
जावत शुद्धोपयोग, पावत नांही मनोग, तावत ही करन जोग, कही पुण्य करनी।।२।।
त्याग शुभ क्रिया कलाप, करो मत कदाच पाप, शुभ में ना मगन होय, शुद्धता विसरनी॥३॥
ऊँच ऊँच दशा धारि, चितप्रमाद को विडारि, ऊंचली दशा तैं मति, गिरो अधो धरनी॥४॥
‘भागचन्द’ या प्रकार, जीव लहै सुख अपार, याके निरधार, स्यादवाद को उचरनी।।५।।