श्री वीर स्वामी के कुछ वर्ष बाद,
मुनीन्द्र जु धरसेनाचार्य हुए।
आत्मज्ञानी तथा आत्मध्यानी महा,
अष्टांग निमित्त के ज्ञाता वे थे।। 1।।
अपने ज्ञान से जाना उन्होंने सही,
बुद्धि होगी अल्प जीवों की बाद में।
फिर ये श्रुतज्ञान आगे को कैसे चले,
ऐसी चिन्ता हुई उनको उस ही समय।।2।।
बस इसी बुद्धि करुणा से प्रेरित हुए,
और भेजा समाचार महिमा नगर।
दो मुनीश्वर मुझे ऐसे भेजो तुरत,
जो होवें तीक्ष्ण बुद्धि के घर।। 3।।
जिस दिन मुनि युग्म आने ही वाले थे वहाँ,
श्री धरसेन ने स्वप्न देखा सही।
उनके चरणों में बैलों की जोड़ी पड़ी,
देवता श्रुत के जयवंत निकला ये स्वर।।4।।
बस सुबह ही मुनीश्वर वहाँ आ गये,
फिर भी आचार्य ने उनको परखा सही।
दोनों को ही सफल देखा आचार्य ने,
होकर हर्षित सहज ज्ञान गुरु ने दिया।।5।।
बस उसी ज्ञान से जैन आगम रचा,
श्री पुष्पदंत अरु भूतबलि स्वामी ने।
छह खण्डों में रचना थी उसकी हुई,
आज चतुर्विध संघ ने पूजन किया।। 6।।
बस इसी से चला ये महापर्व है,
श्रुत परम्परा इस दिन लिखित हो गया।
बहुत बहुमान से इसको नित ही पढ़ें।
इनके अध्ययन से आत्मज्ञान करें ।। 7।।
Artist: ब्र. रवीन्द्र जी ‘आत्मन्’
स्रोत: सहज पाठ संग्रह